श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा)

? यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा – गंगासागर की ओर भाग-३ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

ख़ैर, यात्रा आरंभ हुई। दाहिनी तरफ़ नया कलकत्ता और बायें तरफ़ साल्ट लेक की घेराबंदी करके बसी बस्तियाँ और साथ में चलता मेट्रो ट्रैक। तक़रीबन बीस किलोमीटर चलने के बाद आख़िरी मेट्रो स्टेशन गढ़िया आया। वहाँ पर मेट्रो स्टेशन पर ड्राइव-इन करके थोड़ा सामान ख़रीदा। रास्ते पर चारों तरफ़ तृणमूल कांग्रेस के झंडे लहरा रहे हैं। पंचायत चुनाव का प्रचार पूरे शबाब पर है। कोलकाता से चलकर साल्ट लेक तक शहरी आबादी के बाद ग्रामीण आबादी मुस्लिम बहुल है। मुस्लिम लीग द्वारा 16 अगस्त 1946 को “डायरेक्ट एक्शन डे” घोषित करने के बाद कोलकाता से मुस्लिम आबादी दक्षिण बंगाल तरफ़ पलायन करने लगी तो दक्षिण में बसी हिंदू आबादी कोलकाता की तरफ़ शरण लेने भागी। इस तरह अगस्त 1947 तक इस प्रक्रिया में दक्षिण बंगाल के कॉक द्वीप तक मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र बस गया। उनकी जीविका का साधन हिंदुओं की गंगासागर यात्रा है। वर्तमान में सभी बंगाली नज़र आते हैं। इक्का दुक्का मुस्लिम परिधान में दिखते हैं।

अब हम डेल्टा के बीच में गंगा की धारा को देख रहे हैं। सुंदरवन डेल्टा में भूमि का ढाल अत्यंत कम होने के कारण यहाँ गंगा अत्यंत धीमी गति से प्रवाहित है। अपने साथ लाई मिट्टी को मुहाने पर जमा कर देती है, जिससे डेल्टा का आकार बढ़ता जाता है और नदी की कई धाराएँ तथा उपधाराएँ बन जाती हैं। समुद्र सिकुड़ता जा रहा है। इस प्रकार बनी हुई गंगा की प्रमुख शाखा नदियाँ जालंगी, इच्छामती, भैरव, विद्याधरी और कालिन्दी हैं। इन नदियों की धाराओं को पार करते चल रहे हैं। नदियों के वक्र गति से बहने के कारण दक्षिणी भाग में कई धनुषाकार झीलें बन गई हैं। ढाल उत्तर से दक्षिण है, अतः अधिकांश नदियाँ उत्तर से दक्षिण की ओर बहती हैं। ज्वार के समय इन नदियों में ज्वार का पानी भर जाने के कारण इन्हें ज्वारीय नदियाँ भी कहते हैं। डेल्टा के सुदूर दक्षिणी भाग में समुद्र का खारा पानी पहुँचने से यह भाग नमकीन एवं दलदली है। यहाँ आसानी से पनपने वाले मैंग्रोव जाति के पेड़ों की बहुतायत  है। मैंग्रोव वनों का पारिस्थिक महत्व है, क्योंकि यह तटों को स्थिरता प्रदान करते हैं और विभिन्न मछली और पक्षी जातियों को निवास व सुरक्षा प्रदान करते हैं। मैंग्रोव वन झुरमुट विश्व के उष्णकटिबन्धीय क्षेत्रों में मिलते हैं। मैंग्रोव शब्द दक्षिण अमेरिका की गुआरानी भाषा से व्युत्पन्न है। इन्ही मैंग्रोव वनों में फैली हरियाली से गुज़र रहे हैं। मेहनतकश अर्धनग्न बंगाली स्त्री-पुरुष बारिश के इंतज़ार में खेतों को तैयार करते हुए रवींद्र संगीत धुनों पर गुनगुना रहे हैं। हमने मोबाइल यूट्यूब फिल्मी गीत सेट किया है। हम बाहर से तप रही, पर अंदर से मुलायम ठंडी कार में बैठे, रोशन की धुन पर इंदीवर रचित मुकेश की आवाज़ में संजीव कुमार, मुकरी, ज़ाहिदा पर फ़िल्माया गीत सुन रहे हैं।

ओह रे ताल मिले नदी के जल में,

नदी मिले सागर में,

सागर मिले कौन से जल में,

कोई जाने ना …

 

सूरज को धरती तरसे, धरती को चंद्रमा,

पानी में सीप जैसे, प्यासी हर आत्मा,

ओ मितवा रे… ऐ… ऐ… ऐ…,

बुंद छुपी किस बादल में,

कोई जाने ना …

बंगाल की खाड़ी में हुगली नदी के मुहाने से मेघना नदी के मुहाने (बांग्लादेश) तक 260 किमी विस्तृत व्यापक जंगली एवं लवणीय दलदली क्षेत्र गंगा डेल्टा का निचला हिस्सा है। यह 100-130 किमी में फैला अंतर्राष्ट्रीय सीमा इलाक़ा है। मुहानों के साथ बहती लहरों वाली नदियों और अनेक नहरों द्वारा कटी हुई खाड़ियों के साथ इस भूक्षेत्र में घने जंगलों से ढके दलदली द्वीप समूह हैं।

समुद्र तट मैंग्रोव वाले दलदलों में परिवर्तित होते है; दक्षिणी क्षेत्र विभिन्न जंगली जानवरों और घड़ियालों से भरा हुआ है और वस्तुतः निर्जन है। यह बंगाल के शेर का आख़िरी संरेक्षित क्षेत्र और बाघ संरक्षण परियोजना का स्थल है। कृषि योग्य उत्तरी क्षेत्र में चावल, गन्ना, लकड़ी और सुपारी की खेती होती है। सुंदरबन रॉयल बंगाल टाइगर के लिए विश्व प्रसिद्ध है। सुंदरबन, विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा, 10,200 वर्ग किमी में है जो भारत और बांग्लादेश में फैला है। भारतीय सीमा के भीतर आने वाले वन का हिस्सा सुंदरबन राष्ट्रीय उद्यान कहलाता है। यह पश्चिम बंगाल के दक्षिणी हिस्से में है। वहीं से हम गुज़र रहे हैं।

गंगा का डेल्टा चावल की खेती के लिए विख्यात है। यहाँ विश्व में सबसे अधिक कच्चे जूट का उत्पादन होता है। कटका अभयारण्य सुंदरवन के उन इलाकों में से है जहाँ का रास्ता छोटी-छोटी नहरों से होकर गुज़रता है। उन्हीं के एक हिस्से से होकर निकल रहे हैं। यहाँ बड़ी तादाद में सुंदरी पेड़ हैं जिनके नाम पर ही इन वनों का नाम सुंदरवन पड़ा है। इसके अलावा यहाँ पर देवा, केवड़ा, तर्मजा, आमलोपी और गोरान वृक्षों की प्रजातियाँ पाई जाती हैं। यहाँ के वनों की एक ख़ास बात यह है कि यहाँ वही पेड़ पनपते या बच सकते हैं, जो मीठे और खारे पानी के मिश्रण में जीवित रह सकते हों।

क़रीब चालीस किलोमीटर के बाद बारूईपुर से दाहिनी तरफ़ मुड़कर डेढ़ बजे कॉक द्वीप जेट्टी पर पहुँचे। कार के वातानुकूलित वातावरण में बैठे सघन हरियाली का आनंद लेते रहे। बाहर निकलते ही गर्मी के रौद्र रूप का सामना हुआ। पूरे कपड़े पसीने से तर हो गए। सर्वोच्च सिरे से निम्नतर अंगों तक झरनों के रूप में बहते पसीने को पोंछकर रूमाल निचोड़ लिया। एक बार, दो बार, तीन बार रूमाल निचोड़ कर उसे धोकर गीले रूमाल दे चेहरा पोंछा तब कुछ राहत मिली। कॉक द्वीप जेट्टी पर मालूम हुआ कि तीन बजे एक जेट्टी साढ़े तीन किलोमीटर दूरी तय करके सागर द्वीप ले जाएगी। चालीस मिनट का सफ़र होगा। फिर सागर जेट्टी से होटल तक तीस किलोमीटर जाना होगा। इंतज़ार में पसीना बहाते बैठे हैं। यदि नल-नील सी शक्ति होती तो रामेश्वरम का सा पुल बना देते। पता चला है कि भारत सरकार और बंगाल सरकार मिलकर पुल बनाने की योजना बना रहे हैं। योजना दीदी और फेंकू की तकरार में उलझी है।

बंगाल धरा पर घूम रहे हों और बंगाली कवि चण्डीदास की याद ना आए। अमीर मीनाई की लिखी और जगजीत सिंह द्वारा गाई यह मशहूर गजल में रामी धोबन और चंडीदास का जिक्र है वे भारत की एक कम चर्चित ऐतिहासिक प्रेम कहानी के पात्र हैं।

गई जब रामी धोबन एक दिन दरिया नहाने को,

वहाँ  बैठा  था  चंडीदास  अफ़साना सुनाने को।

 

बसाना है अगर उल्फ़त का घर आहिस्ता आहिस्ता

कहा  उसने  के रामी  छोड़ दे  सारे ज़माने को।

बंगाली वैष्णव समाज में मान प्राप्त मध्ययुगीन चंडीदास राधाकृष्ण लीला साहित्य के बंगाली भाषा के आदि कवि हैं। बंगाल की धरती पर पैदा चैतन्य महाप्रभु से लेकर रवींद्रनाथ टैगोर जैसे महाकवि चंडीदास की मार्मिक गाथा से प्रेरित रहे हैं। चंडीदास ने अपनी आत्मा को प्रेम के अनंत सागर में विलीन कर दिया था। प्रेम ही उनके जीवन का सारतत्व, तपस्या और सिद्धि था। चंडीदास की पदावलियों में सर्वत्र ‘पिरीति’ अर्थात प्रीति की धुन सुनाई पड़ती है। चण्डीदास पर 1934 में बनी कुंदन लाल सहगल अभिनीत हिंदी फ़िल्म भी खूब चली थी। महान प्रेमी और बंगला महाकवि चंडीदास बहुत पहले समय में भी मानवता को जाति-धर्म से ऊपर मानने के हिमायती थे, उन्हीं के शब्दों में—

शुनो रे मानुष भाई

सबार उपरे मानुष सत्य

ताहार उपरे नाई।

हे मनुष्य भाई सुनो, सबके ऊपर मनुष्य सत्य है, इस सत्य से परे कोई नहीं।

सुंदरबन में पतझड़ नहीं होता। ज्येठ-वैशाख की गर्मी में भी सघन हरियाली। पानी के पोखर वर्ष के बारह महीने भरे रहते हैं। पानी पाँच फुट पर भरपूर निकल आता है। नारियल, केले और कटहल भरपूर निकलते रहते हैं। आम नीम पीपल के पेड़ नहीं होते।

चाय पीकर एक होटल में अड्डा जमाया है। होटल की मालकिन सीधे पल्लू की परम्परा गत बंगाली परिधान में काम में लगी थी। उसने लड़की को दुकान सौंपी और ज़मीन पर एक लेट गई। ऊपर पंखा पूरी गति से चल रहा था। उससे थोड़ी दूर पर बेंच पर बैग सिरहाने रख हम भी लेट गए । मोबाइल चार्जिंग पर लगाया। उस पर नज़र रखे लेटे रहे। ऊपर छत पर नज़र डाली तो जीवन में पहली बार साड़ियों की फ़ाल्स सीलिंग दिखी। बेलबूटेदार मनमोहक रंगों की साड़ियाँ टीन की छत से गर्मी को छनकर आने से थोड़ा रोक रही थीं। नौ ग़ज़ा बंगाली साड़ियों के बेलबूटों को गिनते दो घंटे गुज़ारे। चार बजे फेरी की टिकट मिलनी शुरू हुई। पवन भाई दो टिकट ख़रीद लाए।

कुछ मध्य प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के तीर्थयात्री भी आ गए। एक तरफ़ बंगाली महिलाएँ सपरिवार बैठी हैं। एक अधेड़ हरियाणवी बोला- जे बंगाल का काड़ा जादू क्या होवे है। कहीं देखने को मिलेगा क्या ?

चर्चा चल पड़ी। हम बहुत देर तक सुनते रहे। फिर कहा- देखो इस महिला दुकानदार का बच्चा अभी स्कूल से आया है। उसकी माँ ने उसके कपड़े बदल मुँह हाथ धुलवा कर उसे बड़ी थाली में मांस-भात परस दिया है। वह योगी की मुद्रा में बैठा ख़ाना खा रहा है। छोटी मछलियों के झोल में भात मींड कर गोला बना मुँह में भरता जा रहा हैं। यही इनका तीनों पहर रोज़ का ख़ाना है। मछली सरसों या राइस ब्रान तेल में पकाई जाती है। अब इसके और इसकी बहन के बाल देखो कितने सघन घने और निसंग काले हैं। इनकी देह से मादक मत्स्यगंध निकलती है। अब इनके चेहरे की बनावट देखिए, थोड़े छोटे से गोल चेहरे पर कोनों पर हल्की मुड़ी छोटी सी नाक और छोटे सुघड़ कान के पास से गहरी काली घटाएँ और जीभ को गोलाकार करके मिठास ज़ुबान, यही है काला जादू।

इस दुनिया में इंसानों ही नहीं बल्कि जीव मात्र पर काम का जादू सिर पर चढ़ कर बोलता है। शाक्तों में एक पंच-मकार पद्धति है। जो मांस अर्थात् मछली, मदिरा, मैथुन, मधु अर्थात् मिष्ठू और मुद्राएँ के रासरंग पर आधारित है। पूरा बंगाल वर्ष के बारह महीने मछली और मीठा खूब खाते हैं। मदिरा खुलेआम पीते हैं। नाच गाने की मुद्राओं में पारंगत हैं। महिलाओं की लंबी काली घटाएँ और इनके बदन सत्यवती की तरफ़ मत्स्यगंधा मादक ख़ुशबू बिखेरती हैं, उनकी बोली में एक मिठास है, यही काला जादू है। इसी काले जादू से लबरेज़ लघु उरोजनी सुपुष्ट नितंबिनी धीवर कन्या सत्यवती ने ऋषि पाराशर और राजा शान्तनु को बावला बना दिया और महाभारत युद्ध की नींव रख दी थी। और तो और सत्यवती ने ऋषि पाराशर से तीन शर्तें तक मनवा ली थीं कि उसका कौमार्य भंग नहीं होना चाहिए, उसकी गंध सुगंध में बदल जानी चाहिए, और वह व्यास जी को पैदा करने हेतु नौ महीने गर्भ धारण नहीं करेगी तुरंत बच्चा होना चाहिए। तब नदी के बीच द्वीप पर पाराशर-सत्यवती के समागम से द्वैपायन व्यास का त्वरित जन्म हुआ। महाभारत में शान्तनु-गंगा से भीष्म पितामह की उत्पत्ति भी जुड़ी है। उसके धर्मपिता निषाद ने भी राजा शान्तनु से मनमाफ़िक शर्तें मनवाई थीं। सत्यवती महाभारत की एक महत्वपूर्ण पात्र है। वह उपरिचर वसु द्वारा इंद्र की “अद्रिका” नाम की अप्सरा के गर्भ से उत्पन्न हुई थी। वह ब्रह्मा के शाप से मत्स्यभाव को प्राप्त हुई। उसका नाम बाद में सत्यवती हुआ। यह बातें चल रही थीं तभी नौका तक जाने की लाईन लगने लगी।

टिकट लेकर भीड़ में खड़े होना त्रासदाई है। सामने समुंदर पर वाष्पीकरण होने से हवा थमी है, वातावरण में बहुत उमस है। सिर पर धूप और देह में पसीने की धार बह रही है। एकाध घंटा खड़ा रहने पर आरसी गेट खुला लेकिन उसके आगे बढ़ने पर एक और गेट बंद था। पता चला कि गंगा सागर द्वीप से फेरी आने पर उसकी सवारियों उतरेंगी तब दूसरा गेट खुलेगा। एक घंटा और धूप में तपाई होती रही। पानी पीते और पसीना बहाते खड़े रहे। जब गेट खुला तो आगे खड़ी जनता ने भागकर नाव में कुर्सियाँ घेर लीं। जब तक हम पहुँचे तब तक नाव में घुसने की धक्का मुक्की हो रही थी। कुछ अनुनय से कुछ धकिया कर नाव में चढ़ तो गए लेकिन पैर रखने तक की जगह नहीं थी। नाव के चालक की डेक पर चढ़ गए। हमको चढ़ते देख एक हरियाणवी परिवार भी चढ़ आया। लंबे चौड़े हरियाणावासियों ने डेक पर जगह घेर ली। उनके परिवार का मुखिया डेक की सीढ़ियों पर आसन जमा कर विराजमान हो गया। उसके बगल में थोड़ी सी जगह थी। हम उड़ी जगह पर धंसकर बैठ गए। नाव चालीस मिनट में साढ़े तीन किलोमीटर की यात्रा करके गंगा सागर टापू पर पहुँची।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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