श्री राकेश कुमार
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # 138 ☆ देश-परदेश – राष्ट्रीय घड़ी दिवस: 19 जून ☆ श्री राकेश कुमार ☆
घड़ी के उपयोग द्वारा, समय के सदुपयोग के लिए घड़ी का प्रचार प्रसार करने के लिए आज 19 जून को राष्ट्रीय घड़ी दिवस के रूप में चयन किया गया होगा।
सन 1950 तक तो लोग समय देखने के लिए घंटाघर जाते थे। ये सुविधा तो मात्र कुछ शहरों में हुआ करती थी। रेडियो भी समय की जानकारी प्राप्त करने का एक मुख्य स्रोत हुआ करता था। साठ का दशक आते आते घरों में घड़ी नामक यंत्र पैर पसारने लगा था। अमीरों के यहां पेंडुलम वाली घड़ी होती थी। एच एम टी ने लोगों को कलाई में घड़ी बांधना सिखाया था। चाबी से चलने वाली अलार्म घड़ी ने हमारे अनेकों सपनों को अधूरा रखने का कार्य बखूबी निभाया था।
हर कमरे में घड़ी, हर कलाई घड़ी, हर हाथ के मोबाइल में घड़ी पहुंच चुकी है। इस के बावजूद समय नहीं है, समय देखने का, हम अधिकतर सब जगह देरी से ही पहुंचते हैं।
क्या फ़ायदा ऐसी घड़ियों का जो समय का अनुशासन सिखाने में असफल रही हो। हवाई जहाज से यात्रा करने वाले औसतन 5% यात्री अपनी यात्रा नहीं कर पाते हैं। ट्रेन और बस के हालात इस से भी गए बीते हैं।
देरी से गंतव्य पर पहुंचने का ठीकरा अब ट्रैफिक जाम के माथे मढ़ना पुराना बहाना माना जाता है। स्वयं की अपनी इस लेट लतीफी की आदत को “राष्ट्रीय समय सूचक” ( I S D) तक कहने में हम सब अग्रणी रहते हैं।
ईश्वर ने पूरे विश्व में 24 घंटे का समय सब को दिया है। लोग फिर भी कह देते है, मरने का भी टाइम नहीं है। घड़ी के नाम से अब स्मार्ट वॉच भी आ गई है, लेकिन समय की पाबंदी को ना मानने वाले, जीवन में कभी भी स्मार्ट नहीं बन सकते हैं।
आप सबने भी इस फालतू का लेख पढ़ने में बहुत समय व्यर्थ कर दिया है, क्योंकि तय समय पर कार्य करने की खराब आदत अब क्या ठीक होगी।
© श्री राकेश कुमार
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