श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपके “मनोज के दोहे”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # 181 – सजल – एक-एक कर बिछुड़े अपने ☆
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बेलन से रोटी बने, सदियों का औजार।
भूखे को भोजन मिले, किया बड़ा उपकार।।
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तन-निरोग मट्ठा करे, पिएँ सदा ही रोज।
नित प्रातः ही घूमिए, जी भर खाएँ भोज।।
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वर्षा ऋतु में ऊगती, हरियाली जब घास।
प्रकृति बिखेरे हरितिमा, स्वागत करती खास।।
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सत्ता की रबड़ी चखें, नेतागण बैचेन।
जनता स्वप्नों में जिए, तरसें उसके नैन।।
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जिसके हाथों लग गई, रूठी गुमी बटेर।
किस्मत उसकी खुल गई, कभी न लगती देर।।
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© मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
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