श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 297 ☆ प्रकृति…विकृति… ?

वर्तमान जीवन शैली में चलना, दौड़ना, व्यायाम  आदि शारीरिक स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य  हो चले हैं। मुझे भ्रमण प्रिय है। सामान्यतः प्रातः समय भ्रमण कर लेता हूँ तथापि अनेक बार ऐसी अपरिहार्यताएँ  होती हैं कि सुबह से रात तक काम के अलावा दूसरा कुछ करने की स्थिति नहीं बन पाती।

आज भी ऐसा ही एक दिन था। रात के लगभग 10:30 बज रहे थे। विचार किया कि भ्रमण का कोटा पूरा कर लूँ। तुलनात्मक रूप से कम भीड़-भाड़ और चौड़े फुटपाथ वाली एक सड़क पर निकल पड़ा। देखता हूँ कि जो लोग भ्रमण कर रहे हैं, उनमें भोजन कर पान खाने निकले कुछ दुकानदारों की टोली है, कुछ युगल हैं। एकाध परिवार हैं, शेष एकल पुरुष हैं। पूरे मार्ग पर भी एक भी अकेली स्त्री नहीं है।

चिंतन का चक्र आरंभ हुआ। स्त्रियों के साथ यह भेदभाव क्यों? जैसे देर रात भ्रमण की मेरी इच्छा हुई, अनेक स्त्रियों की भी होती होगी पर उनके कदम बँधे हैं।  भीतर से तर्क आया कि यह तो प्रकृतिगत है कि देर रात सुनसान रास्ते पर कोई महिला अकेली नहीं निकलेगी। भीतर ने ही तर्क से तर्क की काट भी तलाशी।

सत्य तो यह है कि शेर के डर से खरगोश दुबका रहे, यह तो प्रकृति है पर शेर के डर से शेरनी बाहर ना निकल सके, यह विकृति है। पृथ्वी पर अन्य किसी भी सजीव की एक ही प्रजाति में यह डर देखने को नहीं मिलता। स्त्री-पुरुष पूरक हैं। एक घटक को भय होगा तो पूरक मिलकर संपूर्णता कैसे प्राप्त करेंगे? दुखद यथार्थ है कि सामान्यतः हर स्त्री को अपने जीवन में अपनी कुछ इच्छाओं का गला घोंटना पड़ता है। इच्छाओं को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप पुरुष पर है और उसे ईमानदारी से इस आरोप को स्वीकार करना भी चाहिए।

मनुष्य ने अरण्य से निकल कर नगर बसाए। नगर के अपने नियम-कानून बनाए। तथ्य बताते हैं कि ये कानून स्त्रियों को संरक्षण देने में विफल रहे। लैंगिक समानता के विषय पर अरण्य, नागरी सभ्यता से बहुत आगे खड़े हैं। नीति कहती है कि जब मनुष्य के नियम प्रभावहीन होने लगें तो उसे अपौरुषेय की शरण में जाना चाहिए।

वेद अपौरुषेय हैं। अथर्ववेद का उद्घोष है कि  स्त्रियाँ शुद्ध स्वभाव वाली, पवित्र आचरण वाली, पूजनीय, सेवा योग्य, शुभ चरित्र वाली और विदुषी हैं। यजुर्वेद स्त्री, पुरुष दोनों में से किसी को भी शासक होने का समान अवसर प्रदान करते हुए अपेक्षा व्यक्त करता है कि राजा की भाँति रानी भी न्याय करनेवाली होनी चाहिए।

न्याय का अधिकार रखनेवाली के साथ होता  अन्याय समर्थनीय नहीं है। वेदों के दिशा-निर्देश और आचरण तत्व स्त्री-पुरुष दोनों पर लागू होते हैं। स्त्री को समानता और निर्भय वातावरण उपलब्ध कराना प्रत्येक पुरुष का कर्तव्य है। इस कर्तव्य को चर्चा तक सीमित न रखकर व्यवहार में उतारना ही बुद्धिमान मनुष्य प्रजाति से अपेक्षित है।…इति।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

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संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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