श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा)

? यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा – भाग-८ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

आज 18 जून 2023 को कलकत्ता घूमने का कार्यक्रम है। किसी भी शहर को देखने और घूमने के पहले उसकी स्थापना, विकास और वर्तमान दशा का चित्र दिमाग़ में होना चाहिए। तब आप पर्यटन का सही आनंद उठा सकते हैं, नहीं तो गाइड द्वारा परसी जाती अधकचरी जानकारी पर सिर हिलाते रहना विकल्प होता है। प्रायः प्रत्येक शहर में पर्यटन विकास निगम के बस द्वारा सिटी टूर होते हैं। सरसरी जानकारी हेतु सरकारी या निजी बस टूर ठीक रहते हैं। लेकिन यदि गंभीरता पूर्वक पर्यटन आपका लक्ष्य हो तो एक दिन में तीन या चार जगहों पर ठीक से घूमा जा सकता है। तदानुसार हमारा लक्ष्य जय काली कलकत्ता वाली माता का कालीघाट मंदिर के अलावा ब्रिटिश क़ालीन कलकत्ता देखना था। कलकत्ता की शुरुआती कहानी जॉब चारनाक के आसपास से ही आरम्भ होती है।

जॉब चारनाक सबसे पहले 1655 में ईस्ट इंडिया कम्पनी की क़ासिम बाज़ार कोठी में स्थानीय बोर्ड के चौथे सदस्य के रूप में भारत आए थे, वहाँ से  तबादला पर पटना चले गए, जहाँ उन्हें लीलावती मिली। पटना से पदोन्नत होकर सपरिवार मद्रास चले गए। 1690 में कम्पनी ने बंगाल की खाड़ी में कारोबारी जगह और कोठी के लिए ठौर ढूँढना शुरू किया। “द प्रिन्सेस” नामक जहाज़ से 24 अगस्त 1690 को रविवार को दिन के बारह बजे जॉब चारनाक सूतानाटी नामक जगह पर लंगर डाल कर उतरे। वहाँ बड़े स्तर पर सूती कपड़े का कारोबार होता था। ढाके की मलमल का कपड़ा नावों से लाया जाता था। ठीक वहीं, जहाँ आज कलकत्ता का बहु बाज़ार और स्यालदाह स्टेशन है। वहाँ गोलपत्ते से बने एक घर के बाजु में एक ऊँचा बरगद का पेड़ था। उसी पेड़ के सहारे बैठकर उन्होंने हुक्का खींचा, धुआँरे गोल गुच्छों को छोड़ते हुए तय किया कि यही जगह कम्पनी के कारोबारी ठिकाने के लिए ठीक रहेगी। वहाँ गंगा एक पहाड़ी रास्ते में आने से पश्चिम की तरफ़ घूमकर पहाड़ी को तीन तरफ़ दे घेर लेती है। सुरक्षा के लिहाज़ से ईस्ट इंडिया कंपनी का कार्यालय वहीं स्थापित कर लिया। बाद में वहीं गवर्नर जनरल का निवास और कार्यालय बना लिया।

कलकत्ता आधुनिक भारत में सबसे पहले बसने वाले शहरों में से एक है। 1690 में ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी “जाब चारनाक” ने अपने कंपनी के व्यापारियों के लिये एक बस्ती बसाई। 1698 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने एक स्थानीय जमींदार सावर्ण रायचौधुरी से तीन गाँव (सूतानुटि, कोलिकाता और गोबिंदपुर) के इजारा में ले लिए। अगले साल कंपनी ने इन तीन गाँवों का विकास कलकत्ता प्रेसिडेंसी के रूप में करना शुरू किया। कुछ इतिहासकार इस शहर की शुरुआत 1698 में फोर्ट विलियम की स्थापना से जोड़ कर देखते हैं। 1727 में इंग्लैंड के राजा जार्ज द्वतीय के आदेशानुसार यहाँ एक नागरिक न्यायालय की स्थापना की गई। कलकत्ता नगर निगम की स्थापना की गई और भारत के पहले मेयर का चुनाव हुआ। 1756 में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला ने कलकत्ता पर आक्रमण कर उसे अंग्रेजों से जीत लिया। उसने इसका नाम “अलीनगर” रखा। लेकिन साल भर के अंदर ही सिराजुद्दौला की पकड़ यहाँ ढीली पड़ गयी और लार्ड क्लाईव ने प्लासी की लड़ाई जीत कर 1757 में इस पर पुन: अधिकार कर लिया। 1772 में वारेन हेस्टिंग्स ने इसे ब्रिटिश शासकों की भारतीय राजधानी बना दिया।

कलकत्ता का व्यवस्थित विकास अंग्रेजों और अंग्रेज़ी शिक्षा के प्रसार से हुआ। वारेन हेस्टिंग (1818-23) ने सब्सिडीएरी अलाइयन्स के ज़रिए राजपूताना सहित छोटी-छोटी सैकड़ों रियासतों को ब्रिटिश एम्पायअर में मिला लिया। राजपूताना के राजा-महाराजा मुग़लों, मराठों, अफ़ग़ानो पिंडारियो से इतने ख़ौफ़ज़दा थे कि वे ख़ुद अंग्रेज़ों के पास चले आए। इसके अलावा 1817 में मराठों को हराने के बाद सिक्खों के अलावा कोई सैनिक शक्ति भारत में नहीं बची थी। अमहरेस्ट (1823-28) ने नागपुर, भरतपुर और बैरकपुर को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया और मलाया तक पर क़ब्ज़ा कर लिया था। विलियम बेंटिक (1828-35) ने सती प्रथा और ठगी समाप्त की और भारत को एक प्रशासनिक ढाँचा दिया। पहली बार कलकत्ता में बजट बनाकर काम शुरू किया। सबसे महत्वपूर्ण काम उसने आधुनिक शिक्षा प्रणाली की नीव रखी, ताकि प्रशासन चलाने हेतु कर्मचारी और अधिकारी पैदा किए जा सकें। परिणामस्वरूप वे अपना प्रशासनिक क्षेत्र बढ़ाते चले गए। आज हमारा लक्ष्य कोलकाता ब्रिटिश युगीन प्रमुख स्थानों का भ्रमण करना है।

राइटर्स बिल्डिंग

हमने कलकत्ता भ्रमण यात्रा राइटर्स बिल्डिंग से आरम्भ की। अंग्रेजों द्वारा भारत में निर्मित सबसे पहला प्रशासनिक भवन राइटर्स बिल्डिंग है। उन्हें  भारत में प्रशासनिक अमला बिठाने हेतु राइटर अर्थात् क्लर्क की ज़रूरत थी। इसीलिए कोलकाता में राइटर्स बिल्डिंग बनाई गई थी। इसकी आश्चर्यजनक वास्तुकला और डिजाइन औपनिवेशिक युग के इतिहास की गवाह है। राइटर्स बिल्डिंग का निर्माण 1777 में शुरू हुआ, जिसका उद्देश्य ईस्ट इंडिया कंपनी के कनिष्ठ नौकरों, या ‘लेखकों’ को बिठाना था। 1780 में बनाते समय इसे ‘अस्पताल’ बताया गया था। अगले कुछ दशकों में कई संरचनात्मक परिवर्तनों के बाद, फोर्ट विलियम कॉलेज ने वहाँ शिक्षा शिविर स्थापित कर 1830 तक हिंदी और फ़ारसी भाषाओं में भारतीय और अंग्रेज़ी लेखकों को यहाँ प्रशिक्षण दिया। इसमें 150 मीटर लंबी ग्रीको-रोमन शैली संरचना में 13 ब्लॉक हैं जिसमें दीवारों पर ग्रीक देवताओं ज्यूस, एटलस, हरक्युलिस इत्यादि की कई मूर्तियाँ और साथ ही रोमन देवी मिनर्वा की एक मूर्ति ध्यान आकर्षित करती है।

इमारत की स्मृति में कई राज दफ़्न हैं। उल्लेखनीय घटनाओं में अलीपुर जेल के कुख्यात महानिरीक्षक लेफ्टिनेंट कर्नल एन.एस.सिम्पसन की हत्या मुख्य है। कर्नल सिम्पसन भारतीय कैदियों के क्रूर उत्पीड़न के लिए कुख्यात था। तीन बंगाली क्रांतिकारियों – बेनॉय बसु, बादल गुप्ता और दिनेश गुप्ता – ने राइटर्स बिल्डिंग के अंदर जाने के लिए खुद को पश्चिमी भद्र पुरुषों के रूप में तैयार किया और कर्नल सिम्पसन को गोली मार दी। इन स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर बीबीडी बाग (बेनॉय-बादल-दिनेश) अब कोलकाता का केंद्रीय व्यावसायिक जिला (CBD अर्थात् सेंट्रल बिज़नेस डिस्ट्रिक्ट) है। वह बीबीडी बाग देखा, जहाँ भारत के शुरुआती क्रांतिकारियों की स्मृतियाँ संजोई गई हैं। 

कोलकाता के सबसे व्यस्त हिस्सों में से एक, बीबीडी बाग क्षेत्र कलकत्ता के अधिकांश दर्शनीय ऐतिहासिक स्मारकों का घर है। बेथ एल सिनेगॉग में शहर के ऐतिहासिक यहूदी मंदिर को देखें और कोलकाता के एकमात्र स्कॉटिश चर्च – चर्च की पड़ताली वास्तुकला पर आश्चर्य करें। यदि आप एक झटपट चाय या हल्का नाश्ता लेना चाहते हैं, तो नज़दीक ही आनंददायक काका चाय पर रुकें। यहाँ से अगला पड़ाव फोर्ट विलियम है।

फोर्ट विलियम

फोर्ट विलियम कोलकाता शहर में, हुगली नदी के पूर्वी तट पर स्थित है। जब अंग्रेजों ने भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के मार्फ़त बादशाहत क़ायम करने के बारे में सोचा तो उनकी सबसे सशक्त उपस्थिति हुगली नदी के किनारे थी। उन्होंने वहीं से आगे बढ़कर प्लासी में सिराजुद्दौला को हटाकर मीर क़ासिम को गद्दी पर बिठा बंगाल में पैर जमा लिये थे। हुगली के पूर्वी किनारे पर उन्होंने क़िला निर्मित करने के बारे में सोचा क्योंकि एक तरफ़ से हुगली नदी उनका सुरक्षा कवच थी। यदि भागना भी पड़े तो हुगली के पानी में जहाज तैयार रहते थे, बैठो और मद्रास या बॉम्बे की तरफ़ निकल लो। उन्होंने प्लासी की लड़ाई के साठ साल पहले क़िला बनाना शुरू कर दिया था। उस समय इंग्लैंड में विलियम तृतीय का शासन था। इसलिए वर्ष 1696 में निर्मित इस किले का नाम किंग विलियम तृतीय (1688-1702) के नाम पर फोर्ट विलियम रखा गया था। फोर्ट विलियम 70.9 एकड़ में फैली हुई एक शानदार संरचना है, जो पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों के लिए सैकड़ों मेहराबदार खिड़कियों से सुशोभित कोलकाता का प्रमुख आकर्षण केंद्र है। फोर्ट विलियम में कुछ खामियों को देखते हुए एक और नए अष्टकोणीय भवन का निर्माण किया गया था जिसमे एक आंतरिक गढ़ शामिल था, जहां कैदियों को रखा जाता था, यही वजह है कि इसे ‘कलकत्ता के ब्लैक होल’ के रूप में भी जाना जाता था। अब फोर्ट विलियम भारतीय सेना पूर्वी कमान के मुख्यालय के रूप में कार्य करता है।

 फोर्ट विलियम ईंट और मोर्टार से बनी एक भव्य अष्टकोणीय संरचना है। इसके तीन किनारे गंगा नदी अर्थात् हुगली से सुरक्षित हैं,  जबकि शेष में हरियाली से भरा एक सुंदर मैदान है। किले का डिज़ाइन एक तारे के पैटर्न का है। इसका निर्माण इस तरह से किया गया था कि इसे तोप से दागे गए गोलों से भी नष्ट नही किया जा सकता था। किले के अन्दर प्रवेश करने के लिए छह दरवाज़ों चौरंगी, प्लासी, कलकत्ता, वाटर गेट, सेंट जॉर्जेस और ट्रेजरी गेट का निर्माण किया गया। वाटर गेट से फ़ौजी मुहकमे की अनुमति से घूमने जा सकते हैं। घूमा और वापस निकल कर ईडन गार्डन तरफ़ मुड़ लिए।  

ईडन गार्डन स्टेडियम

फोर्ट विलियम के नज़दीक ही सड़क पार करके ईडन गार्डन स्टेडियम पहुँचे। ईडन गार्डन स्टेडियम उस समय आकार लेने लगा जब अभिजात्य अंग्रेज हुक्मरानों को क्रिकेट खेलने के लिए एक बड़े खेल मैदान की ज़रूरत महसूस होने लगी। आज के राज्य सचिवालय और कलकत्ता उच्च न्यायालय के पास स्थित ईडन गार्डन एक सुंदर, सुव्यवस्थित क्रिकेट स्टेडियम है। ईडन गार्डन के वर्तमान रास्ते विशाल महोगनी, आम और बरगद के पेड़ों से ढके हुए हैं, जो इसे प्राकृतिक चमत्कारों को देखने और आनंद लेने के लिए एक शांतिपूर्ण स्थान बनाते हैं। ईडन गार्डन स्टेडियम कई खेलों की मेजबानी करता है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण रूप से यह एक क्रिकेट स्टेडियम है जो नियमित रूप से वनडे, टेस्ट और टी 20 मैचों की मेजबानी करता है।

स्टेडियम का नाम स्वर्ग स्थित ईडन गार्डन्स से लिया गया है। जिस बगीचे में ईश्वर ने आदम-इव को इस आदेश से छोड़ा था कि वहाँ के पेड़ का फल नहीं ख़ाना। वहीं एक शैतान सर्प के रूप में रहता था। जिसने इव को भड़का कर आदम-इव को फल खिला दिया। तब उनमें उन्माद पैदा हुआ और इव गर्भवती हो गई। ओल्ड टेस्टामेंट अर्थात् पुरानी बाइबिल इसे पाप कर्म कहती है और आदम-इव सन्तान से उत्पन्न सारी संतान पाप की संतान होती हैं। जिनके उद्धार हेतु ईसा मसीह देह त्याग द्वारा मानवता का पाप अपने सिर लेकर सलीब पर टंगे थे। यह न्यू टेस्टामेंट याने नई बाइबिल कहती है।

‘ईडन गार्डन’ कोलकाता के सबसे पुराने पार्कों में से एक है, जो स्टेडियम से सटे हिस्से में 1841 में ‘ऑकलैंड सर्कस गार्डन’ नाम से बनाया गया था लेकिन बाद में इसके निर्माताओं ने बाइबल में गार्डन ऑफ़ ईडन से प्रेरित होकर इसे ‘ईडन गार्डन’ में बदल दिया। अंग्रेजों को तब यह पता नहीं था कि इसी गार्डन में फुटबाल खेलने वाला नरेंद्र नाथ दत्त कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में अंग्रेज़ी पढ़कर शिकागो में उन्हें पाप की संतान कहकर चुनौती देकर विवेकानंद कहलाएगा और आज़ाद हिंदुस्तान का एक आइकॉन होगा। इसी मैदान पर खेलने वाला सुभाष चंद्र बोस आज़ाद हिन्द फ़ौज खड़ी करके अंडमान निकोबार की राजधानी पोर्ट ब्लेयर में रॉस आइलैंड के सामने आज़ादी का पहला परचम लहराएगा। लार्ड मैकॉले सोच रहा था कि अंग्रेज़ी पढ़े लिखे काले हिंदुस्तानी रक्त और देह से भारतीय परंतु दिमाग़ से इनग्लिष्तानी होकर ब्रिटिश साम्राज्य की नींव मज़बूत करेंगे। उसे नहीं पता था कि नई पश्चिमी शिक्षा से प्रेरणा लेकर दिमाग़ से वेदांती हिंदुस्तानी युवा नई सभ्यता की नगरी शिकागो में उनकी चूलें हिला देंगा।   

आज जहाँ ईडन गार्डन है वह स्थान कलकत्ता के एक ज़मींदार बाबू राजचंद्र दास ने हुगली नदी के किनारे अपने सबसे बड़े बागानों में से एक अंग्रेजों को उपहार में दिया था। आयोजन स्थल पर पहला रिकॉर्डेड टेस्ट 1934 में इंग्लैंड और भारत के बीच, 1987 में भारत और पाकिस्तान के बीच पहला वन डे इंटरनेशनल और 2011 में भारत और इंग्लैंड के बीच पहला टी 20 अंतरराष्ट्रीय मैच आयोजित किया गया था। भारत और दक्षिण अफ्रीका की विशेषता वाला हीरो कप सेमीफाइनल पहला डे / नाइट मैच था। यह वर्तमान में आईपीएल टीम कोलकाता नाइट राइडर्स और क्षेत्रीय बंगाल क्रिकेट टीम का घरेलू मैदान है। जिसे 1864 में गवर्नर- जनरल ऑकलैंड द्वारा स्थापित किया गया था।  50 एकड़ में फैले इस क्रिकेट स्टेडियम में लगभग 66,349 लोगों के बैठने की क्षमता है और यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम है। जब हम स्टेडियम के गेट पर पहुँचे तो चौकीदार बोला आज बंद है। क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की बैठक चल रही है। उसने हमें गेट के थोड़ा भीतर झांकने भर दिया।

शुरुआत में ईड़न गार्डन में भारतीयों को प्रवेश अनुमत नहीं था। परंतु भारतीय सिपॉय फुटबॉल खूब खेलने लगे थे। उनमें पढ़ेलिखे हिंदुओं की संख्या अधिक थी। क्योंकि मुसलमान नेताओं ने नई पश्चिमी शिक्षा का शुरू में विरोध किया था। हिंदुस्तानियों के लिए फुटबॉल मैदान की माँग उठी तो ईड़न गार्डन के सामने ही मोहन बागान मैदान बनाया गया। मोहन बागान एथलेटिक क्लब 15 अगस्त 1889 को स्थापित किया गया था। इसे एशिया के सबसे पुराने फुटबॉल क्लब होने का गौरव भी प्राप्त है। यह फुटबॉल टीम अपनी स्थापना के बाद से ही सफल रही है। इसने भारत के सबसे सफल क्लबों में से एक के रूप में अपनी स्थिति को बनाए रखा है। इसने राष्ट्रीय महत्व की कई ट्राफियां जीती है जैसे- फेडरेशन कप, डूरंड कप, नेशनल फुटबॉल लीग और कोलकाता प्रीमियर डिवीजन। मोहन बागान किसी यूरोपीय टीम को हराने वाली पहली भारतीय टीम थी, जब उन्होने 1911 में ईस्ट यॉर्कशायर रेजीमेंट को हराया था।

अंग्रेजों की फ़ूट डालो राज करो की नीति के चलते मोहन बाग़ान के सामने ही मोहमडन स्पोर्टिंग क्लब स्थापित कर दिया गया। शुरू में खान बहादुर अमीनुल इस्लाम की पहल पर 1887 में जुबली क्लब नामक एक क्लब की स्थापना की गई, जिसे बाद में क्रिसेंट क्लब और फिर हमीदिया क्लब में बदल दिया गया। अमीनुल इस्लाम ने क्लब में सुधार किया और कलकत्ता में रहने वाले बंगाली मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने के लिए 1891 में इसका नाम मोहम्मडन स्पोर्टिंग क्लब रखा। क्लब ने अपनी नींव के बाद कई स्थानीय टूर्नामेंटों में भाग लिया, लेकिन 1902, 1906 और 1909 में कूच बिहार कप जीतने के बाद ही प्रकाश में आया। इस तरह हम तीन खेल के मैदान देख कर गंगा किनारे प्रिंसेस घाट की तरफ़ चल दिये।

 प्रिंसेप घाट

प्रिंसेप घाट ब्रिटिश राज के दौरान कलकत्ता में हुगली नदी के किनारे सन 1841 में निर्मित हुआ था। सन 1843 में प्रख्यात आंग्ल-भारतीय विद्वान और पुरातत्वविद जेम्स प्रिंसेप की स्मृति में डब्ल्यू फ़िट्ज़ेराल्ड ने गंगा किनारे एक पलैडियाई ओसारे (पोर्च) का निर्माण कर उसे प्रिंसेप घाट नाम दिया। हमने प्रिंसेप की सम्राट अशोक के इतिहास की खोज विषयक किताब पढ़ी थी। जेम्स प्रिंसेप मौर्य क़ालीन भारतीयों के इतिहास की खोज के हिसाब से एक महत्वपूर्ण पुरातत्व विद्वान थे। उन्होंने अशोक के प्रस्तर स्तंभ और लॉट को ना सिर्फ़ खोद निकाला था बल्कि वे उन पर अंकित ब्राह्मी लिपि को भी पढ़ने में सफल रहे। जिसके कारण हम मौर्य क़ालीन इतिहास को ब्योरेवार व्यवस्थित कर पाए। सम्राट अशोक की महानता को समझ सके।

जेम्स प्रिंसेप ईस्ट इण्डिया कम्पनी में एक अधिकारी के पद पर नियुक्त थे। उन्होंने 1838 में सर्वप्रथम ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों को पढ़ने में सफलता प्राप्त की। प्रिंसेप को यह जानकारी प्राप्त हुई कि अभिलेखों और सिक्कों पर पियदस्सी (प्रियदर्शी) अर्थात सुन्दर मुखाकृति वाले राजा अशोक का नाम लिखा गया है। कुछ अभिलेखों पर राजा का नाम सम्राट अशोक भी लिखा हुआ था।

प्रिंसेप घाट के नाम पर एक रेलवे स्टेशन का नाम भी रखा गया है। यह स्टेशन कोलकाता सर्कुलर रेलवे का हिस्सा है जिसका अनुरक्षण पूर्वी रेलवे द्वारा किया जाता है। रेल लाईन पार करके घाट पर जाना होता है जो कि बहुत जोखिम भरा है। टैक्सी से उतर, हम इन विचारों में खोए प्रिंसेप घाट के गेट की तरफ़ कदम बढ़ा रहे थे तभी अचानक एक लोकल ट्रेन के हॉर्न की आवाज पर ठिठक कर रुक गए। ट्रेन सामने से निकल कर थोड़ी दूर जाकर प्रिंसेप घाट स्टेशन पर खड़ी हो गई। तब पता चला कि ब्रिटिश युग में कलकत्ता में आजकल की मेट्रो की जगह सड़कों के बीच से धीरे-धीरे ट्रामवे पर ट्राम चला करती थी। अंग्रेज अधिकारी हाथ में छतरी और सिर पर टोप लगाए ट्राम के रोमांटिक यात्री हुआ करते थे। अब ट्राम तो बंद हो गई लेकिन एक चक्राकार सड़क को सर्कुलर ट्रैक बना उस पर लोकल ट्रेन दौड़ती है। हम उसी से टकराते बचे।

फोर्ट विलियम के वाटर गेट और सेंट जॉर्ज गेट के बीच स्थित प्रिंसेप के इस स्मारक में यूनानी और गोथिक शैली का प्रयोग किया गया है। निर्माण के प्रारंभिक वर्षों में, सभी शाही ब्रिटिश मुहासिरे जहाजों में चढ़ने और उतरने के लिए प्रिंसेप घाट का इस्तेमाल किया करते थे। गंगा इस घाट को घेरकर बहती है। इस समय दोनों किनारों तक लबालब भरी है। नौका विहार की सौदेबाज़ी होते दिख रही है।

प्रिंसेप घाट कोलकाता के सबसे पुराने मनोरंजन स्थलों में से एक है। सप्ताहांत में लोग शाम के समय यहाँ नदी में नौका विहार करने, नदी किनारे टहलने और यहाँ मिलते स्नैक का आनन्द उठाने के लिए आते हैं। शनिवार का दिन था, सप्ताहांत का जुनून सिर चढ़कर बोल रहा था। हमें कई प्रेमी युगल भड़कीले परिधानों में तोता-मैना की तरह चौंच लड़ाते दिखे। कुछ लड़कियाँ साथियों के साथ सिगरेट के छल्ले निकालती दिखीं। वहीं कुछ युगल जोड़े कोल्ड ड्रिंक में कुछ और मिला नशीला बनाकर झूम रहे थे।

यहाँ स्थित एक आइसक्रीम और फास्ट फूड स्टाल तो पिछले 40 से भी अधिक सालों से चल रहा है। प्रिंसेप घाट और बाबुघाट के बीच के 2 किलोमीटर लम्बे सौन्दर्यीकृत नदीतट का उद्घाटन 24 मई 2012 को किया गया। यहाँ पर रोशनी से जगमगाते सुंदर बगीचे, रास्ते, फव्वारे और पुनर्निर्मित घाट स्थित हैं। हिन्दी फिल्म परिणीता के एक गाने को यहाँ फिल्माया गया था।

यहाँ पास ही मैन-ओ-वार नाम की एक जेट्टी भी है जो कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट के अंतर्गत आती है और बंदरगाह द्वारा द्वितीय विश्व युद्ध में निभाई गयी इसकी भूमिका की याद दिलाती है। घाट को मुख्य रूप से भारतीय नौसेना द्वारा प्रयोग किया जाता है। यहाँ से दूर हावड़ा ब्रिज दिख रहा है, नज़दीक में भी एक नया सेतु बन गया है।

हावड़ा ब्रिज

टैक्सी में बैठकर जैसे-जैसे हावड़ा ब्रिज की तरफ़ बढ़ रहे थे, तब 1958 में बनी शक्ति सामंत की एक सस्पेंस थ्रिलर फ़िल्म हावड़ा ब्रिज की रील दिमाग़ में घूमने लगी। जिसका एक गीत कलकत्ता की अंधेरी सड़क पर ताँगा में फ़िल्माया गया था। बैकग्राउंड में लाल रंग के अक्षरों में कोकोकोला का बोर्ड चमक रहा है। जिसमें 47 साल के अशोक कुमार 25 साल की मधुबाला की शोख़ चंचल अदाओं पर फ़िदा होकर बड़ी ख़ूबसूरती से उसका स्कार्फ निकाल उसके हुस्न को दर्शकों के सामने बेपर्दा कर देते हैं। मधुबाला गा रही है “ये क्या कर डाला तूने ये दिल तेरा हो गया।” क्लार्क रोड से शुरू हुआ गीत हावड़ा ब्रिज के नीचे से गुज़रती नैया पर समाप्त होता है। उसी फ़िल्म के एक और गीत ने करोड़ों को मधुबाला का दीवाना बनाया था और अभी तक बना रहा है “आइये मेहरबाँ बैठिए जाने जाँ”, जिसमें अशोक कुमार की सिगरेट से निकलते छल्लों के बीच के.एन.सिंह की बोलती आँखों का रहस्य और गोल चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कान लिए धुमाल के सिगार से उठते धुएँ में फ़िल्म के कई रहस्य नुमाया हो रहे हैं। सीढ़ियों से उतरती मधुबाला की दिलकश अदाओं पर आशा भोंसले की मादक मुरकियों का जादू दर्शक को बांध रखने में कामयाब है। घर की बैठक में जब तक दर्शक होश में आता है तब तक उसकी गर्म कॉफ़ी कोल्ड कॉफी में तब्दील हो चुकी होती है। हावड़ा ब्रिज तब भी एक रोमांटिक पहचान हुआ करता था और आज भी रोमांस के लिए चाँदनी रात में हावड़ा ब्रिज के नीचे नौका विहार प्रेमियों की पहली पसंद है।

मौजूदा हावड़ा नगर का ज्ञात इतिहास हवड़ा जनपद में स्थित प्राचीन बंगाली राज्य भुरशुट से जुड़ा है।  जिसका शासन प्राचीन काल से 15वीं शताब्दी तक, हावड़ा जिला और हुगली ज़िला के क्षेत्र में फैला था। सन 1569-75 में भारत भ्रमण पर आए वेनिस के एक भ्रमणकर्ता सेज़र फ़ेडरीची ने अपने भारत दौरे की दैनिकी में 1578 ई में बुट्टोर (Buttor) नामक एक जगह का वर्णन किया था। उनके विवरण के अनुसार वह एक ऐसा स्थान था जहाँ बहुत बड़े जहाज भी यात्रा लंगर डाल सकते थे।

सन 1713 मैं औरंगज़ेब के पोते बादशाह फर्रुख़शियार के राजतिलक के मौक़े पर ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने मुग़ल दरबार में एक प्रतिनिधिमण्डल भेजा था, जिसका उद्देश्य हुगली नदी के पूर्व के 34 और पश्चिम के पाँच गाँव: सलकिया (Salica), हरिराह (Harirah अथवा हावड़ा), कसुंडी (Cassundea) बातोर (battar) और रामकृष्णपुर (Ramkrishnopoor) को मुगलों से लीज पर लेना था। शहंशाह ने केवल पूर्व के 34 गाँवों पर सन्धि की। कम्पनी के पुराने दस्तावेजों में इन गाँवों का उल्लेख है। आज ये सारे गाँव हावड़ा शहर के क्षेत्र और उपनगर हैं।

सन 1854 में हावड़ा जंक्शन रेलवे स्टेशन बना, और उसी के साथ शुरू हुआ हावड़ा नगर का औद्यौगिक विकास, जिसने शहर को कलकत्ता के एक आम से उपनगर को भारतवर्ष का एक महत्वपूर्ण औद्यौगिक केन्द्र बना दिया। धीरे-धीरे हावड़ा के क्षेत्र में कई प्रकार के छोटे, मध्य और भारी प्रौद्यौगिक उद्योग खुल गए। यह विकास दूसरे विश्व युद्ध तक जारी रहा जिसका नतीजा हुआ, नगर का हर दिशा में बहुमुखी विस्तार। इस प्रकार के औद्यौगिक विस्फोट का एक पहलू उत्तर प्रदेश और बिहार से अत्यन्त अप्रवासन और उस से पैदा हुआ नगर का अनियमित विस्तार भी था। अब हावड़ा एक भीड़ भरा नगर है।

जैसे बॉम्बे में सुबह भीड़ का रुख़ उत्तर पश्चिम से दक्षिण मुंबई की तरफ़ होता है, वैसे ही हुगली के पश्चिमी तरफ़ बसे हावड़ा वासियों को हावड़ा ब्रिज से कलकत्ता की ओर भागते देखा जा सकता है। शाम को यह रुख़ पलट जाता है। कोलकाता की एक पहचान हावड़ा ब्रिज आइकॉन हुगली नदी पर बना है, जो दुनिया के सबसे लंबे कैंटिलीवर पुलों में से एक है। हावड़ा ब्रिज को रवीन्द्र सेतु के रूप में भी जाना जाता है, जो हावड़ा और कोलकाता को जोड़ता है। हुगली नदी पर निर्मित हावड़ा ब्रिज लगभग 1500 फीट लम्बा और 71 फीट चौड़ा है। हावड़ा ब्रिज यातायात परिवहन के साथ-साथ, कोलकाता के सबसे प्रसिद्ध पर्यटक स्थलों में से एक है। जो अपनी अद्वितीय सुन्दरता के कारण कई हजारों पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। शाम और रात के समय हावड़ा ब्रिज की अविश्वसनीय सुन्दरता को देखा जा सकता है। तेज बारिश के साये में हावड़ा ब्रिज पर खड़े होकर बादलों से रिमझिम बरसती बूँदों और हुगली का रोमांस देखते ही बनता है।

हमने ड्राइवर से कहा हावड़ा ब्रिज का बंगाली में वर्णन करो। उसने कहा “ई ब्रिज हुगली नदी पर बनल चार गो पुल सभ में से एक हवे आ। कलकत्ता आ पच्छिम बंगाल के निशानी के रूप में जानल-मानल जाला। एकरे अलावा अउरी ब्रिज बाड़ें विद्यासागर सेतु, विवेकानंद सेतु, आ सभसे हाल में बनल निवेदिता सेतु। हावड़ा ब्रिज बंगाल के खाड़ी से आवे वाला तूफ़ान के सामना करत रोज करीबन एक लक्ख गाड़ी सभ के ट्रैफिक आ लगभग डेढ़ लक्ख पैदल आवाजाही सम्हारे ला। आ एकरा चलते ई दुनियाँ के सभसे ब्यस्त कैंटीलिवर ब्रिज हवे। बने के समय अपना किसिम के, दुनियाँ के तिसरा नंबर के रहल ई ब्रिज पूरा दुनिया में, अब अइसन छठवाँ सभसे बड़ ब्रिज हवे।” मीठी जुबान से मिष्ठु बोल कानों में घोलते विक्टोरिया तरफ़ रूख किया।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments