श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा)

? यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा – भाग-९ विक्टोरिया मेमोरियल एवं कालीघाट मंदिर ☆ श्री सुरेश पटवा ?

विक्टोरिया मेमोरियल

हावड़ा ब्रिज से गंगा पार करके हावड़ा पहुँचे  थे, और दूसरे सेतु से वापस कलकत्ता में ब्रिटिश काल का सबसे प्रसिद्ध भवन विक्टोरिया मेमोरियल देखने पहुँचे। विक्टोरिया मेमोरियल लॉर्ड कर्जन के दिमाग की उपज है। जो 1899 से 1905 तक भारत के वायसराय और गवर्नर जनरल रहे थे। उन्हें बंगाल के बँटवारे के साथ हिंदू मुसलमान बँटवारे के लिए भी जाना जाता है। यह भवन भारत में रानी विक्टोरिया के शासनकाल के पच्चीसवें रजत जयंती वर्ष की याद में बनाया गया था।

 ब्रिटेन के इतिहास में तीन सम्राज्ञियाँ हुई हैं और तीनों ही बहुत प्रसिद्ध रहीं। एलिज़ाबेथ प्रथम  1558 से 1603 तक इंग्लैंड की साम्राज्ञी रहीं। वे हिंदुस्तान के बादशाह अकबर की हुकूमत 1605 के समक़ालीन थीं। दोनों ने बड़े-बड़े साम्राज्य क़ायम किए थे। एलिज़ाबेथ प्रथम का खड़ा किया गया साम्राज्य 400 साल 1952 तक अक्षुण्य रहकर ग्रेट ब्रिटेन तक सिमट गया। अकबर के साम्राज्य को उसके पड़पोते औरंगज़ेब की धार्मिक उन्मादी नीतियों ने लगभग 100 सालों में ही 1707 में ढहने लगा था, जिसकी बुनियाद पर इंग्लैंड का कभी न सूर्य अस्त वाला साम्राज्य था 1857 में खड़ा होना शुरू हुआ था।     

दूसरी महान साम्राज्ञी विक्टोरिया मानी जाती हैं, जो 1837 से यूनाइटेड किंगडम की रानी थीं और 1876 से 1901 तक ब्रिटिश इंडिया की साम्राज्ञी बन गई थीं। इंग्लैंड के इतिहास में उनका शासन विक्टोरियन युग के रूप में जाना जाता है। उनका शासनकाल 63 साल से अधिक लंबा था। जो यूनाइटेड किंगडम में औद्योगिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक और सैन्य क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन का काल था, जब ब्रिटिश साम्राज्य में सूर्य ना डूबने की हैसियत हासिल की थी।

तीसरी एलिज़बेथ द्वितीय 1952 से 2022 में अपनी मृत्यु तक यूनाइटेड किंगडम और अन्य राष्ट्रमण्डल प्रजाभूमियों की महारानी थीं। वह अपने शासनकाल के शुरुआत में 32 विभिन्न सम्प्रभु राज्यों की रानी थीं। देश आज़ाद होते चले गए और अपनी मृत्यु तक 15 राष्ट्रों की नाममात्र सम्राज्ञी रह गई थीं। एक ने साम्राज्य खड़ा किया, दूसरी ने विस्तारित किया और तीसरी के समय ब्रिटिश साम्राज्य का सूर्य डूब गया। इस फ़ानी दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है।

लॉर्ड कर्जन साम्राज्ञी विक्टोरिया के शासन के दौरान भारत के प्रशासक थे। वे चाहते थे कि रानी को समर्पित स्मारक विशाल और अब तक भारत में निर्मित ताजमहल जैसे सभी स्मारकों से बड़ा और भव्य होना चाहिए। विक्टोरिया मेमोरियल बनने में उस समय पूरे 1 करोड़ 5 लाख रूपए का खर्च आया था। जो भारत के राजाओं और कारोबारियों से जुटाया गया था। किंग जॉर्ज पंचम और प्रिंस ऑफ व्हेल्स ने 1906 में स्मारक की आधारशिला रखी थी और स्मारक अंततः 1921 में आम जनता के लिए खोला गया था। इस बीच 1912 में ब्रिटिश भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली पहुँच गई थी। विक्टोरिया युग में रेल, दूरसंचार और डाक व्यवस्था का जाल बिछाया जा रहा था। जब 1853 में बॉम्बे से ठाणे रेल चलाई तब विक्टोरिया टर्मिनस पहला रेल स्टेशन और पेनिनसुला रेल कंपनी का भव्य मुख्यालय बनाया गया था। जो अब छत्रपति शिवाजी टर्मिनस के नाम से जाना जाता है। इन विचारों में खोए कलकत्ता के नज़ारे देखते चले जा रहे थे। पता ही न चला कब विक्टोरिया मेमोरियल आ गया।

विक्टोरिया मेमोरियल के मुख्य वास्तुकार रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ ब्रिटिश आर्किटेक्ट्स के अध्यक्ष विलियम एमर्सन थे। उन्होंने एक ही समय में मिस्र, वेनिस, मुगल और अन्य पारसी शैलियों से प्रेरणा लेते हुए स्मारक को इंडो-सरैसेनिक शैली में बनाया। यह 184 फीट ऊंची इमारत सफेद रंग के मकराना मार्बल पत्थर से बनाई गई थी, जिसे जोधपुर से लाया गया था। विशाल बगीचे 64 एकड़ में फैले हुए हैं। इसे डेविड पेन और लॉर्ड रेडडेल ने डिजाइन किया था। बाग का रखरखाव बागवानों की 21 सदस्यीय टीम करती है। उत्तर गेट की तरफ़ रानी विक्टोरिया की एक कांस्य प्रतिमा है। सर जॉर्ज फ्रैम्पटन का एक चिन्ह रानी को उनके सिंहासन पर बैठे हुए चित्रित करता है।

एक एडवर्ड लॉन है जहाँ पर्यटक परिसर के दक्षिणी भाग में स्मारक मेहराब के नीचे किंग एडवर्ड सप्तम की कांस्य प्रतिमा देख सकते हैं। इसे सर बर्ट्रम मैकनेल ने डिजाइन किया था। एक अन्य लॉन कर्ज़न लॉन में फ्रेडरिक विलियम पोमेरॉय द्वारा डिज़ाइन की गई कर्ज़न की मूर्ति है। गार्डन में कॉर्नवॉलिस, हेस्टिंग्स, क्लाइव, डलहौजी, बेंटिक, वेलेस्ली, रिपन, एंड्रयू, एच.एल. फ्रेजर और राजेंद्रनाथ मुखर्जी सहित कई अन्य प्रतिमाएं हैं।

रॉयल गैलरी, नेशनल लीडर्स गैलरी, मूर्तिकला गैलरी, पोर्ट्रेट गैलरी, सेंट्रल हॉल और कलकत्ता गैलरी सहित 25 से अधिक दीर्घाओं के साथ, विक्टोरिया मेमोरियल में दुर्लभ और प्राचीन पुस्तकों का एक समृद्ध संग्रह है। इनमें शेक्सपियर की सचित्र रचनाएं, अरेबियन नाइट्स और संगीत और नृत्य पर लिखी गई अन्य पुस्तकें शामिल हैं। स्मारक वास्तव में चित्रों, हथियारों, वस्त्रों, कलाकृतियों, टिकटों, आदि वस्तुओं का उत्कृष्ट और उल्लेखनीय संग्रह का खजाना है। इसके अलावा यहां द नेशनल लीडर्स गैलरी, पोर्ट्रेट गैलरी, सेंट्रल हॉल, मूर्तिकला गैलरी, आर्म्स एंड आर्मरी गैलरी भी घूम सकते हैं।

विक्टोरिया मेमोरियल में कलकत्ता गैलरी भारत की पहली सिटी गैलरी है। गैलरी स्थापित करने की पहल भारत के तत्कालीन शिक्षा मंत्री प्रो.एस. नुरुल हसन ने की थी, जिसका उद्देश्य दुनिया भर के बुद्धिजीवियों को स्मारक की ओर आकर्षित करना था। गैलरी में आर बी दत्ता द्वारा बिपिन बिहारी दत्ता, माइकल मधुसूदन दत्त, राम मोहन राय, कलकत्ता और हावड़ा के बीच पोंटून पुल (हावड़ा ब्रिज के रूप में लोकप्रिय), कार्ड प्लेयर भबानी चरण लाहा द्वारा देवेंद्रनाथ टैगोर, श्रीमती बेलनोस द्वारा पायकर या पैडलर्स, बेनी माधब भट्टाचार्जी द्वारा देवी काली की मशहूर पेंटिंग्स यहां देखी जा सकती हैं। यहां एक पियानो है जिसे 1829 में विक्टोरिया को उपहार में दिया गया था जब वह 10 साल की थी। हाल ही में पियानो को विक्टोरिया मेमोरियल की सेंट्रल गैलरी में स्थानांतरित कर दिया गया है। यहां पर रखी एक राइटिंग डेस्क भी देखी जा सकती है जिसका उपयोग क्वीन विक्टोरिया ने विंडसर कैसल में किया था। यहाँ जयपुर जुलूस, दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी तेल से बनी चित्रकला है। जिसमें 1876 में राजा एडवर्ड 7 को अपने राज्य का दौरा करते हुए दिखाया गया है।

हमने घूमफिर कर वहाँ की कैंटीन में नूडल खाकर दोपहर का भोजन निपटाया। फिर उत्तर दिशा से घुसकर दक्षिण गेट पर पहुँचे। टैक्सी ड्राइवर को फ़ोन पर कहा कि दक्षिण गेट पर आ जाए। वह बोला कि जहाँ आपको छोड़ा था, वहीं आइए, उसको समझाया पर वह अड़ा रहा। आख़िर हमें दक्षिण गेट से दो किलोमीटर पैदल चलकर उत्तर दरवाज़े पर पहुँचना पड़ा। फिर उसकी जो परेड ली तो वह पानी माँगने लगा। उसे पानी पिलाकर फिर रगड़ा। इस तरह जय माँ काली कलकत्ते वाली के मंदिर कालीघाट पहुँचे।

कालीघाट मंदिर

काली, कालिका या महाकाली हिन्दू धर्म की एक प्रमुख देवी हैं। वे मृत्यु, काल और परिवर्तन की प्रतीक हैं। यह सुन्दर रूपवान आदिशक्ति दुर्गा माता का काला विकराल और भयप्रद रूप है, जिसकी उत्पत्ति असुरों के संहार के लिये हुई थी। रक्तबीज का वध करते समय उसके रक्त की बूँदों को धरती पर नहीं गिरने देने के लिए उन्होंने उन्हें जीभ पर ग्रहण किया था। देवी रक्त में नहाते-नहाते काले वर्ण की हो गई थीं। तब रक्तबीज का वध संभव हुआ था। क्रोधोन्मत देवी को शिव ने राह में लेटकर रोका था। उनको बंगाल, ओडिशा और असम में इसी रूप में पूजा जाता है।

हम ईडन गॉर्डन स्टेडियम देखकर एक बजे के आसपास कालीघाट मंदिर पहुँचे। वहाँ चारों तरफ़ सड़क बनाने का कार्य चल रहा था। टैक्सी से उतर कीचड़ के बीच से रास्ता बना कर बढ़ रहे थे। तभी दो पंडे आकर बोले- मंदिर के पट बंद हो गए हैं। अब चार बजे खुलेंगे। आप चाहें तो पाँच सौ रुपयों में स्पेशल दर्शन करवा सकते हैं। हम उनसे उलझे बगैर आगे बढ़ते रहे। कुछ दूर चलने के बाद दो पंडों में से एक चलता बना। बाक़ी बचा बोला- चलिए, चार सौ दीजियेगा। हमने मौन साधा हुआ था। वह तीन सौ और फिर दो सौ पर उतर आया। हमने कहा- आप व्यर्थ समय ना गवायें। बलि के लिए कोई दूसरा बकरा देखें। वह भी थोड़ी दूर चलकर ग़ायब हो गया। हम जब मंदिर के प्रवेश द्वार पर पहुँचे तो वहाँ पंडों की पूरी जमात जमा थी। एक हृष्टपुष्ट पंडा दरवाज़ा रोक कर खड़ा था। वह बोला मंदिर बंद हो गया। हमने कहा- भक्त अंदर जाते और बाहर निकलते दिख रहे हैं। वह शिथिल होकर बोला- जूते बग़ल में निकाल दीजिए और ब्राह्मणों के कल्याण हेतु सौ रुपये निकालिए। हमने सोचा, चलो भाई पाँच सौ की सुई एक सौ पर आकर लटक गई। पंडा कल्याण निधि को एक सौ रुपये से समृद्ध करके कबीर को याद करते अंदर घुसे। 

कबीरा आप ठगाइए  और ना ठगिए कोय,

आप ठगाय सुख उपजे और ठगे दुख होय।

मंदिर प्रांगण में घुसते ही हमारे पैर खून की लंबी धार देख कर ठिठक गए। रक्त धार का पीछा करते निगाह वहाँ पहुँची, जहाँ सात-आठ लोग धर्म सम्मत कार्य में लगे थे। बकरे के कटे अंग चारों तरफ़ बिखरे थे। कटे सिर एक तरफ़, टांगों के खुर दूसरी तरफ़, आँतों का ढेर खुरों के पास और सबके बीच में गोश्त का ढेर लगा था। कसाइयों के पीछे कलेजा, भेजा और तिल्ली के अलग-अलग ढेर थे। हम फटी आँखों से यह नज़ारा देख रहे थे। तभी लाल कपड़े की धोती-कुर्ता पहने हाथ में काँसे की थाली में सिंदूर-अक्षत लोटा में जल लिए एक पुरोहित यजमान के साथ प्रकट हुआ। पीछे एक बलि का बकरा लाया गया। पुरोहित ने यजमान को लोटा से पानी लेकर बलि हव्य पर छिड़कने को कहा। पानी की बूँदें बकरे की आँखों ओर पड़ीं तो वह मिमियाया। पुरोहित ने यजमान से कहा-

अपना नाम लें-

ऽऽऽऽऽऽऽऽ

पिता जी का नाम लें

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गोत्र का नाम लें

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स्थान का नाम लें

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अपनी मन्नत कहें

@@@@@@

उसने यजमान को हव्य के माथे पर लाल सिंदूर-अक्षत टीका करने को कहा।

उसके बाद पुरोहित ने मंत्र पढ़ा-

“कालिकायै विद्महे श्मशानवासिन्यै

धीमहि तन्नो घोरा प्रचोदयात्।”

उसके बाद पुरोहित और यजमान सामने से हट गए।  एक व्यक्ति ने आकर बकरे का मुँह कस कर पकड़ लिया। दूसरे आदमी ने पीछे की दोनों टांगें पकड़ीं। तीसरा खूब तगड़ा आदमी लोहे का वज़नदार फरसा लेकर आया। उसने सिर के ऊपर तक फरसा उठा कर मारा और बकरे का सिर एक ही झटके में धड़ से अलग कर दिया। टाँग पकड़े व्यक्ति ने बकरे के तड़फ़ते धड़ को लिटा दिया। एक अन्य व्यक्ति ने बकरे का सिर उठाकर ढेर पर रख दिया। उसके बाद धड़ के पेट को चीर कर आँतें, लिवर, कलेजा निकाले। फिर धड़ को एक लंबे रस्से पर बंधे हुक से लटका कर ऊपर से नीचे की तरफ़ खाल उतारी। एक बड़ी मज़बूत पॉलीथिन में गोश्त रखकर यजमान को दिया। बाक़ी गोश्त बलि का प्रसाद स्वरूप मंदिर का हिस्सा हो गया। मंदिर में मोबाइल से फोटो खींचने की मनाही है। फिर भी हमने बाहर निकलते-निकलते पेंट की जेब से मोबाइल थोड़ा सा निकाल बिना फोकस किए एक फोटो निकाल लिया।

उसके बाद काली माता के दर्शन हेतु पंक्ति में खड़े हो गए। दस मिनट में दर्शन करके बाहर निकल टैक्सी की दिशा में चल दिए। मंदिर से लौटते समय जॉर्ज ओर्वेल के एनिमल फ़ार्म और ऑप्टन सिंक्लेयर के जंगल उपन्यासों में वर्णित मीट इंडस्ट्री में ऑटोमैटिक स्लॉटर हाउस के दृश्य घूमते रहे।

बलि चढ़ाने की प्रथा हिंदुओं के शाक्त संप्रदाय के अलावा यहूदी और इस्लाम धर्म में भी प्रचलित है। ओल्ड टेस्टामेंट के अनुसार अब्राहम ने अपने बेटे इशाक को यहोवा से प्यार करना और उसके सभी वादों पर भरोसा रखना सिखाया। मगर जब इशाक करीब 25 साल का हुआ तो यहोवा ने अब्राहम से एक ऐसा काम करने के लिए कहा जो बहुत मुश्‍किल था। परमेश्‍वर ने अब्राहम से कहा, ‘तू अपने इकलौते बेटे को मोरिया देश ले जा और वहाँ एक पहाड़ पर उसकी बलि चढ़ा।’ अब्राहम को बिलकुल भी पता नहीं था कि यहोवा ने ऐसा करने के लिए क्यों कहा। फिर भी उसने यहोवा की बात मानी।

अगले दिन सुबह-सुबह अब्राहम ने अपने साथ इशाक और दो सेवकों को लिया और मोरिया देश की तरफ निकल पड़ा। तीन दिन बाद उन्हें दूर से वह पहाड़ दिखायी दिया। अब्राहम ने अपने सेवकों से कहा कि वे वहीं रुकें और वह इशाक को लेकर जाएगा। अब्राहम ने एक चाकू लिया और इशाक से कहा कि वह लकड़ियाँ उठाए। इशाक ने अपने पिता से पूछा, ‘बलिदान चढ़ाने के लिए जानवर कहाँ है?’ अब्राहम ने कहा, ‘बेटा, यहोवा देगा।’

जब वे चलते-चलते पहाड़ पर पहुँचे तो उन्होंने वहाँ एक वेदी बनायी। फिर अब्राहम ने इशाक के हाथ-पैर बाँधे और उसे वेदी पर लिटा दिया। फिर अब्राहम ने हाथ में चाकू लिया। वह इशाक के गले को रेंतने ही वाला था कि यहोवा के स्वर्गदूत ने स्वर्ग से पुकारा, ‘अब्राहम, लड़के को मत मार, अब मैं जान गया हूँ कि तुझे परमेश्‍वर पर विश्‍वास है क्योंकि तू अपने बेटे की बलि चढ़ाने के लिए तैयार हो गया।’ तब अब्राहम ने देखा कि वहाँ एक मेढ़ा है जिसके सींग झाड़ियों में फँसे हैं। उसने जल्दी से इशाक के हाथ-पैर खोल दिए और उसके बदले मेढ़े की बलि चढ़ायी।

यही घटना क़ुरान में इस तरह वर्णित है।

इब्राहिम की निष्ठा और समर्पित होने की भावना का जश्न मनाने के लिए बकरीद मनाई जाती है और बकरे को कुर्बान किया जाता है क्योंकि अल्लाह ने भी इस्माइल की जगह बकरे को ही कुर्बान किया था। यहाँ इशाक की जगह इस्माइल का नाम मिलता है।

पशु बलि की प्रथा हिंदुओं में शाक्त संप्रदाय से जुड़ी हुई है। बलि प्रथा आदिवासी परंपराओं में भी दृढ़ता से निहित है। पशु बलि भारत में प्राचीन वैदिक धर्म का हिस्सा थी, और इसका उल्लेख यजुर्वेद में मिलता है। बाद के पुराणों और भगवद गीता जैसे हिंदू ग्रंथों में पशु बलि की सख़्त मनाही है।

डॉक्टर रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी कृति “संस्कृति के चार अध्याय” के पृष्ठ क्रमांक 60 पर डॉक्टर मंगलदेव शास्त्री के माध्यम से उल्लिखित किया है कि “भारतीय संस्कृति में जो कई परस्पर विरोधी युग्म हैं, उसका भी एक कारण है कि संस्कृति आरम्भ से ही सामासिक रही है। भारतीय समाज में एक द्वन्द तो कर्म और संन्यास का है, दूसरा प्रवृत्ति और निवृत्ति को लेकर है, तीसरा स्वर्ग और नरक की कल्पनाओं को लेकर है।” यही बात शाकाहार और मांसाहार को लेकर भी है। परस्पर विरोधी प्रवृत्ति साथ-साथ विकसित होती रही है।

हिंदुओं में मांसाहार बनाम शाकाहार प्रणाली अलग क़िस्म से विकसित हुई है। आदि शंकराचार्य (788-820 ईस्वी) तक सनातन धर्म की प्रवृत्ति कई धाराओं में विभाजित होने लग गई थी परंतु उनका विभिन्न समुदायों में विभाजन नहीं मिलता है। आदि शंकराचार्य ने ब्रह्म सिद्धांत पर वेदान्त की व्याख्या शुरू की, तब कुछ प्रचलित भाष्यों के अनुसार ब्रह्म किसे माना जाय,  इस पर विवाद उत्पन्न हुए।

  • शैव मत का कहना था कि शिव ब्रह्म हैं और प्रकृति उनकी शक्ति है।
  • वैष्णव मत ने प्रतिपादित किया कि विष्णु ब्रह्म हैं और उनके सभी अवतार भी ब्रह्म हैं।
  • शाक्त मत की स्थापना थी कि शक्ति ब्रह्म है। वह कई रूपों में व्यक्त होती है। रक्त शक्ति का प्राण है। बलि उसका भोजन है। शक्ति को रक्त नहीं मिलेगा तो वह लुप्त हो जाएगी।

 भक्ति दर्शन का प्रादुर्भाव दक्षिण भारत में नयनार संतों ने किया और विशेष तौर से स्वामी रामानंद भक्ति को उत्तर भारत की तरफ़ लाए।

 भक्ति उपजी द्रविड अंग लायो रामानंद।

 गुजरात में संत नरसिंह मेहता, महाराष्ट्र में तुकाराम, बृज में सूरदास-मीरा और अवध में कबीर-तुलसीदास ने वैष्णव महिमा का बखान किया। तब तक वेदान्त से अलग समाज का बड़ा तबका बौद्ध और जैन अहिंसा सिद्धांत को व्यवहार में प्रयुक्त करने लगा था। वैष्णव पंथियों रामानुज और वल्लभ आचार्य ने शाकाहार की महिमा बताई। इस तरह दक्षिण से उत्तरप्रदेश तक वैष्णव पंथ शाकाहार सहित स्थापित हो गया। शिव-पार्वती की आराधना करने वाले शैव पंथी भी देर सवेर शाकाहार पर स्थिर हो गए।

बंगाल सहित पूर्वोत्तर भारत शक्ति की पूजा और पशु बलि पर अडिग रहे। संस्कृति व्यक्तित्वों का निर्माण करती है। बीसवीं सदी में वैष्णव महात्मा गांधी अहिंसा सिद्धांत पर आज़ादी का आंदोलन खड़ा करना शुरू करते हैं। शाक्त के गढ़ कलकत्ता में सुभाष चंद्र बोस हिंसक आंदोलन के पक्ष में खड़े हुए तो कांग्रेस में विभाजन अनिवार्यता हो गई। शाक्त क्रांतिकारी राह पर चले गए। सनातनी हिंदू सतत विकासशील दर्शन है। कभी कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकालता। विमर्ष हमेशा जारी है। अन्य संप्रदायों ने छठवीं-सातवीं सदी में अंतिम निष्कर्ष निकाल लिया। वहाँ विमर्ष की कोई गुंजाइश नहीं है।

कभी कोलकाता का कालीघाट मंदिर देवी काली को समर्पित हुगली नदी पर एक पवित्र घाट था। समय के साथ वैष्णव नदी शक्ति मंदिर से दूर चली गई। मंदिर अब आदिगंगा नामक एक छोटी नहर के किनारे है जो हुगली से जुड़ती है। कालीघाट को भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। शाक्त मान्यता अनुसार कालीघाट उस स्थल का प्रतिनिधित्व करता है जहाँ दक्षिणायन या सती के दाहिने पैर का पंजा गिरा था। इसका 15 वीं और 17 वीं शताब्दी के बंगाल के शाक्त भक्ति साहित्य में संदर्भ मिलता है। वर्तमान मंदिर 19 वीं शताब्दी का है। माना जाता है कि कालीघाट मंदिर चंद्रगुप्त द्वितीय के समय से अस्तित्व में है।

मूल मंदिर राजा बसंत राय द्वारा बनाया गया था, जो प्रतापदित्य के चाचा और जेसोर (बांग्लादेश) के राजा थे। मंदिर एक छोटी झोपड़ी के आकार का ढांचा था, जिसे अकबर के सेनापति राजा मानसिंह ने 16वीं शताब्दी में वर्तमान स्वरूप दिया। वर्तमान संरचना 1809 में सबरन रॉय चौधरी के मार्गदर्शन में पूरी हुई। मुख्य मंदिर में देवी काली की एक अनूठी प्रतिमा है।

मां काली की वर्तमान मूर्ति दो संतों – ब्रह्मानंद गिरि और आत्माराम गिरि द्वारा बनाई गई थी। मूर्ति की तीन विशाल आंखें और एक लंबी जीभ और चार हाथ हैं, जो सोने के बने हैं। मंदिर में पुष्प और मोर-आकृति की टाइलें हैं जो इसे विक्टोरियन रूप प्रदान करती हैं। इसके अलावा मंदिर में “कुंडूपुकर” नामक एक पवित्र तालाब है जो परिसर के दक्षिण पूर्व कोने में स्थित है। इस तालाब के पानी को गंगा के समान पवित्र माना जाता है।

हलधर परिवार मंदिर की संपत्ति का मूल मालिक होने का दावा करता था, लेकिन उनका दावा बनिशा के चौधरी द्वारा विवादित था। 1960 के दशक में सरकार और हलधर परिवार के प्रतिनिधित्व के साथ मंदिर के प्रशासनिक प्रबंधन के लिए एक समिति का गठन किया गया था। इसके बाद पश्चिम बंगाल सरकार ने कालीघाट मंदिर को बेहतर बनाने में दिलचस्पी ली और आज यह मंदिर कोलकाता के पर्यटन स्थलों में आकर्षण का केंद्र है।

यहाँ काली देवी की टचस्टोन से बनी प्रचंड प्रतिमा स्थापित है। इस प्रतिमा में मां काली भगवान शिव की छाती पर पैर रखे हुए नजर आती हैं। गले में नरमुंडों की माला पहने हैं और हाथ में फरसा और नरमुंड हैं। काली मां की जीभ बाहर निकली हुई है, जिससे रक्त की कुछ बूंदें भी टपकती नजर आ रही हैं। इस मूर्ति के पीछे कुछ किवदंतियां भी प्रचलित हैं। काली माता की मूर्ति श्याम रंग की है। आंखें और सिर सिंदुरिया रंग में हैं। यहां तक की मां काली के तिलक भी सिंदुरिया रंग में लगा हुआ है। वे हाथ में एक फरसा पकड़े हैं जो सिंदुरिया रंग का ही है।

समय अधिक होने लगा था। इसलिए बिड़ला तारामंडल, भारतीय संग्रहालय, बिड़ला मंदिर, अलीपुर जू फुर्ती से घूमे। पार्क स्ट्रीट भी देखना थी।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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