श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “वैचारिक सुदृढ़ता…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २५५ ☆ वैचारिक सुदृढ़ता… ☆
जीवन में बाधाएँ आपको मजबूत बनाने हेतु आती हैं । जो होता है; अच्छे के लिए होता है , यही स जीवन का मूल मंत्र है ।
किसी ने कह दिया आप से कुछ नहीं बनता और आपने मान लिया ये कहाँ तक उचित है ? किसी को इतना हक देना कि वो आपके कार्यों का मूल्यांकन करे बिल्कुल उचित नहीं, ईश्वर ने हर व्यक्ति को विशिष्ट बनाया है , एक के जैसा दूसरा हो ही नहीं सकता, जब हमारे हाथ की उँगलियाँ , एक ही माता- पिता की सन्ताने , एक गुरु के शिष्य, एक वृक्ष के फल , एक डाल के फूल ,ये सब परस्पर भिन्न हैं तो हम आपस में ये उम्मीद क्यों करते हैं, कि सब कुछ हमारे अनुरूप हो ।
कभी आपने गौर किया कि किस तरह छोटे- छोटे कीड़े, मकड़ी न सिर्फ़ फूल वरन पत्तियों को भी खाते हैं , जिसका उपचार तो कीट नाशकों द्वारा कर दिया जायेगा पर हमारे जीवन में जो घुन रूपी कीड़ें हैं उनका इलाज़ कैसे हो इसका चिन्तन अवश्य करना चाहिए ।
केवल उदास होने से कोई हल नहीं मिलता, दृढ़ इच्छा शक्ति व मजबूत हृदय से ही आप जीवन में आने वाले बाधा रूपी कीटों का उन्मूलन कर सकते हैं । जीवन में खर पतवारों को गाजर घास की तरह न पनपने दें, सही समय पर जागें अन्यथा मानसिक अवसाद से कोई नहीं बचा पायेगा ।
एक बार पुनः सोचें कि धरती के अलग- अलग हिस्सों में मौसम एक सा नहीं रहता, खान- पान, संस्कृतियाँ सब कुछ भिन्न , ऐसी स्थिति में समझदारी से निर्णय लेना चाहिए, केवल अंतरात्मा की आवाज के आधार पर निर्णय कर सही गलत का भेद करें क्योंकि परम आत्मा ही अन्तरात्मा है ।
© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
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