डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख ख्वाहिशें–जीने का सलीका। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # २८९ ☆

☆ ख्वाहिशें–जीने का सलीका.. ☆

‘एक अजीब सा रिश्ता है, मेरे और मेरी ख़्वाहिशों के दरमियां/ वो मुझे जीने नहीं देतीं और मैं उन्हें मरने नहीं देता’… ख़्वाहिशें ज़िंदगी जीने का सलीका हैं, मक़सद हैं, जो प्रेरणा देती हैं… हमें अपनी मंज़िल तक पहुंचने की राह दर्शाती हैं। ख़्वाहिशें वह संजीवनी हैं, जो मानव को ऊर्जा प्रदान करती हैं और मानव उन्हें पूरा करने के निमित्त बड़े से बड़ा करिश्मा कर गुज़रता है। अपनी शक्ति व सामर्थ्य से बढ़ कर कार्य करने को आप करिश्मा या प्रभु-कृपा ही कहेंगे न… यह सर्व-स्वीकार्य तथ्य है कि यह ऊर्जा हमें प्रभु-कृपा से ही प्राप्त होती है, क्योंकि उसकी रज़ा के बिना तो एक पत्ता भी नहीं हिल सकता। दूसरी ओर उसकी कृपा से पंगु भी पर्वत लांघ सकता है; नेत्रहीन देखने लगता है; लंगड़ा चलने लगता है और परमात्म-सत्ता ही मानव को फ़र्श से अर्श पर ला सकती है… राजा को रंक व रंक को राजा के शीर्षस्थ स्थान पर ले जाकर बैठा सकती है। इसे आप चमत्कार व प्रभु-कृपा कहेंगे या अपनी शक्ति व सामर्थ्य से अर्जित लक्ष्य। वास्तव में इन दोनों तथ्यों में विरोधाभास है। एक ओर तो हम प्रभु-अनुकंपा में पूर्ण विश्वास रखते हैं; उसी के प्रति समर्पित हो जाते हैं और उसका सारा श्रेय सृष्टि-नियंता को देते हैं। दूसरी ओर हम इसे करिश्मा कहते हैं अर्थात् इसका श्रेय अपनी लग्न, परिश्रम व मेहनत को देकर फ़ख्र महसूस करते हैं, क्योंकि परिश्रम व संघर्ष हमारी ख़्वाहिशों की वह संजीवनी है; जो हमें ऊर्जा प्रदान करती है।

उपरोक्त दोनों तथ्य सत्य प्रतीत होते हैं। मानव और ख़्वाहिशों के बीच विचित्र-सा रिश्ता है। ख़्वाहिशों को आप जीवन-रेखा से भी अभिहित कर सकते हैं। मुझे याद आ रही हैं अब्दुल कलाम जी की पंक्तियां… ‘मानव को सपने बंद आंखों से नहीं, खुली आंखों से देखने चाहिएं, क्योंकि वे सपने आपको सोने नहीं देते..आपकी प्रेरणा होते हैं। आपके जीवन को उमंग व आनंदोल्लास से भरते हैं और उन्हें साकार करने की राह दर्शाते हैं। सो! सपने मानव को आकाश की बुलंदियों तक पहुंचाते हैं और उन परिस्थितियों में वह सब कर गुज़रता है; जिसके वह योग्य ही नहीं होता है। ‘ख़्वाहिशें मुझे जीने नहीं देतीं और मैं उन्हें मरने नहीं  देता’…दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं; अन्योन्याश्रित हैं। कलाम जी का यह संदेश कि खुली आंखों से देखे हुए सपने मानव को सोने नहीं देते और वह उन्हें मरने नहीं देता विचारणीय है कि आखिर वह स्थिति कब उत्पन्न होती है?

यह सत्य है कि जब हमारा लक्ष्य उत्तम होता है और उसे प्राप्त करने के लिए हम अपना तन, मन, धन ही नहीं, समस्त ऊर्जा लगा देते हैं अर्थात् सर्वस्व समर्पण कर देते हैं। प्रश्न उठता है…प्रभु के प्रति समर्पण हमें मुक्ति, निर्वाण व मोक्ष की ओर ले जाता है और उन सपनों व ख़्वाहिशों को पूरा करने का सारा श्रेय हम ‘मैं अर्थात् स्वयं’ को प्रदान करते हैं, जो सर्वथा अनुचित है। ‘मैं’ ख़्वाहिशों को मरने नहीं देता अहं भाव को दर्शाता है, क्योंकि ‘मैं’ में निहित हैं…दिव्य व अलौकिक शक्तियां; जो हमारे अंतर्मन की सुप्त शक्तियों को जाग्रत करती हैं और हम यह सोचने पर विवश हो जाते हैं कि जब अन्य व्यक्ति उस मुक़ाम पर पहुंच चुका है; तो मैं क्यों नहीं… जबकि उस परमात्मा ने तो सबको समान बनाया है। यह भाव हमें प्रेरित करता है और उसके बल पर हमारा मन में अदम्य साहस हिलोरें लेने लगता है। हम अपने अंतर्मन में अलौकिक ऊर्जा अनुभव करते हैं… उस स्थिति में हम वह सब कुछ कर गुज़रते हैं;  जिसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी। परंतु यह तभी सम्भव है, जब हममें आत्मविश्वास होगा और हम अपनी आंतरिक शक्तियों को पहचान कर अंतिम सांस तक संघर्षरत रहेंगे। इतना ही नहीं, हम स्वयं को परिश्रम रूपी अग्नि में झोंक देंगे, तो यही पराकाष्ठा हमें मंज़िल तक पहुंचाने का माध्यम बनेगी।

मानव इन तीन माध्यमों के द्वारा अपनी मंज़िल को प्राप्त कर सकता है…प्रतिभा, व्युत्पत्ति व अभ्यास। प्रतिभा जन्मजात होती है; व्युत्पत्ति के अंतर्गत वेद-शास्त्रों के अध्ययन से ज्ञान प्राप्त कर मानव उस दिशा की ओर अग्रसर होता है। तीसरी शक्ति है अभ्यास अर्थात् ‘करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।’ सो! अभ्यास हमें उस कग़ार तक पहुंचाने की सामर्थ्य रखता है, जो अकल्पनीय होती है। अभ्यास हमें लक्ष्य प्राप्ति होने तक धैर्यपूर्वक परिश्रम करने की प्रेरणा देता है।

सो! ख़्वाहिशों को पूर्ण करने में यह तीनों शक्तियां कारग़र सिद्ध होती हैं। यह इस तथ्य की पुष्टि करती हैं कि ‘तुम कर सकते हो।’ परंतु जब मानव इसे चुनौती के रूप में स्वीकार कर लेता है, तो राह में आने वाली बाधाएं अपनी दिशा बदल लेती हैं। अल्बर्ट आइंस्टीन का उदाहरण सबके समक्ष है। वे गणित विषय में कमज़ोर थे और बच्चों का उसके कोट के पीछे बुद्धू की पर्ची लगाना; टीचर का सात जन्मों तक गणित विषय में पारंगत न होने के बारे में व्यंग्य करना उसके हृदय को बेध जाता है और उसका सोते-जागते, खाते-पीते, उठते-बैठते गणित सीखने का उपक्रम करना– उन्हें एक दिन प्रसिद्ध गणितज्ञ व वैज्ञानिक बना देता है।

क्रैग का रूबेन को दर्पण के सामने जाकर अपने लक्ष्य को दोहराने और स्वयं को ल्यूज़ खेल में झोंक देने की प्रेरणा देना–उसमें अदम्य साहस संचरित करता है; जो कल्पनातीत है। वह कहता है कि ‘मुझे परवाह नहीं, मैं जीत कर रहूंगा। भले ही मेरे दोनों पैर टूट जाएं; हड्डियां चरमरा जाएं; चोट लग जाए… परंतु मैं ‘ओलंपिक मैन बन कर ही रहूंगा’ ने उन्हें विश्व-प्रसिद्धि प्रदान की। सो! समस्याएं व चुनौतियां सबके जीवन में आती हैं और जो इनका सामना सीना तान करते हैं; विपरीत प्रकृति भी अपनी राह बदल लेती है। स्वामी दयानंद सरस्स्वती की यह उक्ति ‘जिसमें धैर्य है और जो मेहनत से नहीं घबराता; कामयाबी उसकी दासी बन जाती है’ उक्त भाव को पुष्ट करती है अर्थात् दृढ़-संकल्प, धैर्यपूर्वक किया गया परिश्रम व लक्ष्य के प्रति एकाग्रता हमें मंज़िल तक पहुंचाने का मादा रखती है, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमारे सम्मुख हैं। अर्जुन का मछली की आंख पर निशाना साधना उसे सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर की संज्ञा प्रदान करता है।

ख़्वाहिशें मानव को ऊर्जस्वित करती हैं; अदम्य साहस से आप्लावित करती हैं, परंतु सकारात्मक सोच के साहसी व आत्मविश्वासी व्यक्ति का ‘मैं-

‘मैं’ उसे मरने नहीं देता। यह मानव का जुनून है, जो उसे लक्ष्य प्राप्त करने से पहले बीच राह थककर नहीं बैठने देता। दोनों स्थितियां मानव के लिए हितकारी हैं, श्रेयस्कर हैं। यदि हम सपने नहीं देखेंगे, तो उन्हें साकार करने की ख़्वाहिश कहां से उत्पन्न होगी? सो! सपने हमारे पथ- प्रदर्शक हैं, जो हमें उस मुक़ाम पर पहुंचाने की राह दर्शाते हैं; हममें ऊर्जा संचरित करते हैं… परंतु इसके लिए प्रभु-कृपा व अनुकंपा अपेक्षित है। जैसा कि सर्वविदित है ‘ईश्वर उनकी सहायता करता है; जो अपनी सहायता ख़ुद करते हैं’  तथा ‘परिश्रम ही सफलता की कुंजी है।’ सो! संघर्ष हमें उस मुक़ाम तक पहुंचाने का सामर्थ्य रखता है, जो कल्पनातीत है। सो! परमात्म-सत्ता में विश्वास रखते हुए लक्ष्य के प्रति समर्पित भाव से निरंतर परिश्रम व संघर्ष ही हमें अपनी मंज़िल तक पहुंचाने की सामर्थ्य रखता है। इसके लिए सपनों व ख़्वाहिशों को ज़िंदा रखने की आवश्यकता है, जिससे सफलता-प्राप्ति के सभी द्वार स्वत: खुल जाते हैं और उन राहों पर चलकर मानव विश्व में मील के पत्थर स्थापित कर सकता है।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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