श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – भाग-२ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

1.घुमक्कड़ धर्म

चरैवैति-चरैवैति का शाब्दिक अर्थ है-निरन्तर आगे बढ़ते रहना। जिस प्रकार पृथ्वी निरंतर अपनी धुरी पर ब्रह्मांड में घूमती रहती है। सूर्य निरन्तर भ्रमणशील रहता है, कहीं रुकता नहीं, कभी थकता नहीं है। उसी तरह मनुष्य निरन्तर अपने जीवन-वृत्त में प्रवृत्त रहता है और एक न एक दिन अपने गन्तव्य को प्राप्त कर अनंत में विलीन होकर पुनः नई शुरुआत करता है। निरन्तर आगे बढ़ते रहने का सिद्धान्त सुनने में तो बहुत अच्छा लगता है। परन्तु इस सिद्धान्त का परिपालन अत्यन्त कठिन है, क्योंकि मनुष्य के जीवन में देश, काल और परिस्थितियों का बड़ा महत्वपूर्ण योगदान है। हर समय, हर जगह, परिस्थितियाँ एक जैसी नहीं होती। कभी शारीरिक सीमाओं के कारण, कभी आर्थिक परेशानियों के कारण, कभी भावनात्मक दुर्बलताओं के कारण, कभी प्राकृतिक आपदाओं के कारण, कभी अन्य अज्ञात भय के कारण मनुष्य का उत्साह मन्द पड़ जाता है और वह अपने चरैवैति धर्म से विमुख हो जाता है। निरन्तर आगे बढ़ने की बात तो दूर, वह परिस्थितियों के आगे हथियार डाल देता है या उनसे समझौता कर लेता है। विषम परिस्थितियों में केवल वे ही लोग आगे बढ़ पाते हैं जिनमें बाधाओं से लड़ने का अदम्य साहस होता है। जीवन सतत चलते रहने का उपक्रम है। कविवर हरिऔध ने ठीक ही कहा है-

वे देख कर बाधा विविध बहु विघ्न घबराते नहीं,

वे रह भरोसे भाग्य के दु:ख भोग पछताते नही।

केवल जुझारू घुमंतू लोग ही अपने परिश्रम से आलस्य के गहन अन्धकार को प्रकाश में बदल सकते हैं, जीवन यात्रा की सफलता के अन्तिम सोपान तक पहुँच पाते हैं। इतिहास साक्षी है, कोलम्बस अपने साथियों के विरोध के बावजूद भी गरजते हुए समुद्र में नौका लेकर उतर पड़ा और आखिर नई दुनिया की खोज करने में सफल होकर मानव सभ्यता में अमर हुआ। ऐतरेय ब्राह्मण में इन्द्र कहते हैं- ”परिश्रम करने वाले को श्री मिलती है।”

मैं मानता हूँ, पुस्‍तकें भी कुछ-कुछ घुमक्कड़ी का रस प्रदान करती हैं, लेकिन जिस तरह फोटो देखकर आप हिमालय पर लहराते देवदार के गहन वनों और श्‍वेत हिम-मुकुटित शिखरों के सौन्‍दर्य, बादलों से मिलकर उनके लुभावन रूप, उनके गंध का अनुभव नहीं कर सकते, उसी तरह यात्रा-कथाओं से आपकी उस सत्य से भेंट नहीं हो सकती, जिसका आभासी साक्षात्कार घुमक्कड़ को होता है। यात्रा-वृतांत पाठकों के लिए यही कहा जा सकता है, कि दूसरे अन्‍धों की अपेक्षा उन्‍हें थोड़ा आलोक मिल जाता है और साथ ही ऐसी प्रेरणा भी मिल सकती है, जो स्‍थायी नहीं तो कुछ दिनों के लिए उन्‍हें घुमक्कड़ बना सकती हैं।

घुमक्कड़ क्‍यों दुनिया का सर्वश्रेष्‍ठ गतिमान विचार है? घुमक्कड़ी ने आज की दुनिया को बनाया है। यदि आदिम-पुरूष एक जगह नदी या तालाब के किनारे गर्म मुल्‍क में पड़े रहते, तो वह दुनिया को आगे नहीं ले जा सकते थे। इसमें संदेह नहीं कि आदमियों की घुमक्कड़ी ने बहुत बार खून की नदियाँ बहाई हैं। घुमक्कड़ों से हम हर्गिज नहीं चाहेंगे कि वह खून के रास्‍ते को पकड़ें, किंतु अगर घुमक्कड़ों के काफिले दिगदिगांत न आते-जाते, तो सुस्‍त मानव-जातियाँ सो जातीं और पशु से ऊपर नहीं उठ पातीं। आदिम घुमक्कड़ों में से आर्यों, शकों, हूणों ने क्या-क्या किया, अपने खूनी पथों द्वारा मानवता के पथ को किस तरह प्रशस्‍त किया, इसे इतिहास में हम उतना स्‍पष्ट वर्णित नहीं पाते, किंतु मंगोल-घुमक्कड़ों की करामातों को तो हम अच्छी तरह जानते हैं। बारूद, तोप, कागज, छापाखाना, दिग्‍दर्शक, चश्‍मा यही चीजें थीं, जिन्‍होंने पश्चिम में विज्ञान-युग का आरंभ कराया और इन चीजों को वहाँ ले जाने वाले मंगोल घुमक्कड़ थे। जिन्होंने रोमन साम्राज्य की चूलें हिला कर रख दी थीं। जिससे अंततः यूरोप के देशों का जन्म हुआ।

हिन्दी का यायावर बड़ा खूबसूरत शब्द है। घुमक्कड़ के लिए सबसे प्रिय पर्यायवाची शब्द यही लगता है। एक अन्य वैकल्पिक शब्द खानाबदोश है। मगर ऐसा महसूस होता है कि भाव के स्तर पर खानाबदोश में जहाँ दर-दर की भटकन का बोध होता है वहीं यायावर अथवा घुमक्कड़ में भटकने के साथ मनमौजी वाला भाव भी शामिल है।

यायावर की व्युत्पत्ति पर गौर करें तो भी यही बात सही साबित होती है। इस शब्द का संस्कृत में जो अर्थ है वह है परिव्राजक, साधु-संत, संन्यासी आदि। साधु-संतों के व्यक्तित्व में नदियों के से गुणों की बात इसीलिए कही जाती है क्योंकि नदियों में जो सदैव बहने की, गमन करने की वृत्ति होती है वही साधु में भी होनी चाहिए। इसी भ्रमणवृत्ति के परिणामस्वरूप वे अनुवभवजनित ज्ञान से समृद्ध होते हैं और तीर्थस्वरूप कहलाते हैं। अब मनमौजी हुए बिना भला भ्रमणवृत्ति भी आती है कहीं? गौर करें कि नदी तट के पवित्र स्थानों को ही तीर्थ कहा जाता है। हमने साथियों के साथ पैदल खंड नर्मदा परिक्रमा में हर घाट को तीर्थ महसूस किया है।

यायावर बना है संस्कृत की “या” धातु से। इसमें जाना, प्रयाण करना, कूच करना, ओझल हो जाना, गुजर जाना (यानी चले जाना – मृत्यु के अर्थ वाला गुजर जाना मुहावरा नहीं) आदि भाव शामिल हैं। अब इन तमाम भावार्थों पर जब गौर करेंगे तो आज आवागमन के अर्थ में खूब प्रचलित यातायात शब्द की व्युत्पत्ति सहज ही समझ में आ जाती है। या धातु से ही बना है यात्रा शब्द जिसका मतलब है गति, सेना का प्रयाण, आक्रमण, सफर, जुलूस, तीर्थाटन-देशाटन आदि। इससे ही बना संस्कृत में यात्रिकः जिससे हिंदी में यात्री शब्द बना। घुमक्कड़ वृत्ति के चलते ही साधु से उसकी जात और ठिकाना न पूछे जाने की सलाह कहावतों में मिलती है। खास बात यह भी है कि यातायात और यायावर चाहे एक ही मूल से जन्मे हों मगर इनमें बैर भाव भी है। साधु-संन्यासियों (यायावर) के जुलूस, अखाड़े और संगत जब भी रास्तों पर होते हैं तो यातायात का ठप होना तय समझिए।

हिन्दी-उर्दू में यायावर के अर्थ में सैलानी शब्द भी प्रचलित है और भाषा में लालित्य लाने के लिए अक्सर इसका भी प्रयोग होता है। सैलानी वह जो सैर-सपाटा करे। सैलानी अरबी मूल का शब्द है और बरास्ता फारसी, हिन्दी-उर्दू में दाखिल हुआ। इस शब्द की व्युत्पत्ति देखें तो वहाँ भी बहाव, पानी, गति ही नजर आएँगे। अरबी में एक लफ्ज है सैल, जिसके मायने हुए पानी का बहाव, बाढ़ या जल-प्लावन। गौर करें कि किसी किस्म के प्रवाह के लिए, वह चाहे भावनाओं का हो या लोगों का, हिन्दी-उर्दू में सैलाब शब्द का इस्तेमाल खूब होता है। अलबत्ता सैलाब का मूल अर्थ तो बाढ़ ही है, मगर प्रवाह वाला भाव प्रमुख होने से इसके अन्य प्रयोग भी होने लगे हैं जैसे आँसुओं का सैलाब। सैल से ही बन गया सैलानी अर्थात जो गतिशील रहे। सैर-सपाटा पसंद करनेवाला। इसी कड़ी में आता है सैर, जिसका मतलब है तफरीह, पर्यटन, घूमना-फिरना आदि। इससे बने सैरगाह, सैरतफरीह जैसे लफ्ज हिन्दी में चलते हैं।

अब बात घुमक्कड़ की। यायावर के लिए घुमक्कड़ एकदम सही पर्याय है। घुमक्कड़ वो जो घूमता -फिरता रहे। यह बना है संस्कृत की मूल धातु घूर्ण् से जिसका अर्थ चक्कर लगाना, घूमना, फिरना, मुड़ना आदि है। घूमना, घुमाव, घुण्डी आदि शब्द इसी मूल से उपजे हैं। हिन्दी-उर्दू के घुमक्कड़ और गर्दिश जैसे शब्द इसी से निकले हैं। उर्दू-फारसी का बड़ा आम शब्द है आवारागर्द। इसमें जो गर्द है वह उर्दू का काफी प्रचलित प्रत्यय है। आवारा का मतलब निकला व्यर्थ घूमनेवाला। इसका अर्थविस्तार बदचलन तक पहुँचता है। जबकि घूर्णः से ही बने घुमक्कड़ के मायने होते हैं सैलानी, पर्यटक या घर से बाहर फिरने वाला। यूँ उर्दू-हिन्दी में गर्द का मतलब है धूल, खाक। यह गर्द भी घूर्ण् से ही संबंधित है अर्थात घूमना-फिरना। धूल या या खाक भी एक जगह स्थिर नहीं रहती। इस गर्द की मौजूदगी भी कई जगह नजर आती है। जैसे गर्दिश, जिसका आम तौर पर अर्थ होता है संघर्ष। मगर भावार्थ यहाँ भी भटकाव या मारा-मारा फिरना ही है। गर्दिश से गर्दिशजदा, गर्दिशे-दौराँ, गर्दिशे-रोजगार आदि लफ्ज भी बने हैं।

“अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा” राहुल सांकृत्यायन (1893-1963) का अमर लेख है। हमारा मानना है कि इस महत्वपूर्ण लेख को सभी स्कूली पाठ्यक्रमों में अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए। शास्त्रों में जिज्ञासा ऐसी चीज के लिए होनी बतलाई गई है, जोकि श्रेष्‍ठ भाव है तथा व्‍यक्ति और समाज सबके लिए परम हितकारी हो। वेद व्‍यास ने अपने “ब्रह्मसूत्र” शास्‍त्र में ब्रह्म को सर्वश्रेष्‍ठ मानकर उसे जिज्ञासा का विषय बनाया। व्‍यास-शिष्‍य जैमिनि ने धर्म को श्रेष्‍ठ माना। पुराने ऋषियों से मतभेद रखना हमारे लिए पाप की वस्‍तु नहीं है, आखिर छ शास्त्रों के रचयिता छ आस्तिक ऋषियों में भी आधों ने ब्रह्म को धत्ता बता दिया है। दुनिया की सर्वश्रेष्‍ठ वस्‍तु है आज़ाद घुमक्कड़ी। वैचारिक घुमक्कड़ी से बढ़कर व्‍यक्ति और समाज का कोई हितकारी नहीं हो सकता। दुनिया – दु:ख में हो चाहे सुख में – सभी समय यदि सहारा पाती है, तो वैचारिक घुमक्कड़ों से। प्राकृतिक आदिम मनुष्‍य परम घुमक्कड़ था। खेती, बागबानी तथा घर-द्वार से मुक्‍त वह आकाश के पक्षियों की भाँति पृथ्‍वी पर सदा विचरण करता था, जाड़े में यदि इस जगह था तो गर्मियों में वहाँ से दो सौ कोस दूर।

आधुनिक काल में वैचारिक और दैहिक घुमक्कड़ों के काम की बात कहने की आवश्‍यकता है। आधुनिक विज्ञान में चार्ल्स डारविन का स्‍थान बहुत ऊँचा है। उसने प्राणियों की उत्‍पत्ति और मानव-वंश के विकास पर ही अद्वितीय खोज नहीं की, बल्कि सारे ही विज्ञानों को उससे सहायता मिली। कहना चाहिए, कि सभी विज्ञानों को डारविन के प्रकाश में दिशा बदलनी पड़ी. लेकिन क्या डारविन अपने महान आविष्‍कारों को कर सकता था, यदि उसने घुमक्कड़ी का व्रत नहीं लिया होता?

कोलंबस और वास्‍को द-गामा दो घुमक्कड़ ही थे, जिन्‍होंने पश्चिमी देशों के आगे बढ़ने का रास्‍ता खोला। अमेरिका अधिकतर निर्जन-सा पड़ा था। एशिया के कूप-मंडूकों ने घुमक्कड़-धर्म की महिमा बिसूर दी, इसलिए उन्‍होंने अमेरिका पर अपनी झंडी नहीं फहराई। दो शताब्दियों पहले तक आस्‍ट्रेलिया खाली पड़ा था। चीन और भारत को सभ्‍यता का बड़ा गर्व है, लेकिन इनको इतनी अकल नहीं आई कि जाकर वहाँ अपना झंडा गाड़ आते। आज अपने 400-500 करोड़ की जनसंख्‍या के भार से भारत और चीन की भूमि दबी जा रही है और आस्‍ट्रेलिया में एक करोड़ भी आदमी नहीं हैं। आज एशिया वासियों के लिए आस्‍ट्रेलिया का द्वार बंद है, लेकिन दो सदी पहले वह हमारे हाथ की चीज थी। क्‍यों भारत और चीन आस्‍ट्रेलिया की अपार संपत्ति और अमित भूमि से वंचित रह गये? इसीलिए कि वह घुमक्कड़-धर्म से विमुख थे, उसे भूल चुके थे। 

हाँ, इसे भूलना ही कहना होगा, क्‍योंकि किसी समय भारत और चीन ने बड़े-बड़े नामी घुमक्कड़ पैदा किए। वे भारतीय घुमक्कड़ ही थे, जिन्‍होंने दक्षिण-पूर्व में लंका, बर्मा, मलाया, स्‍याम, कंबोज, चंपा, बोर्नियो और सेलीबीज ही नहीं, फिलिपाईन तक का धावा मारा था और एक समय तो जान पड़ा कि न्‍यूजीलैंड और आस्‍ट्रेलिया भी बृहत्तर भारत का अंग बनने वाले हैं; लेकिन कूप-मंडूकता तेरा सत्‍यानाश हो। इस देश के बुद्धुओं ने उपदेश देना शुरू किया कि समुंदर के खारे पानी और हिंदू-धर्म में बड़ा बैर है, उसके छूने मात्र से वह नमक की डली की तरह गल जाएगा।

जिन यूरोपीय लोगों ने इस मूर्खता को गले नहीं लगाया। उन्होंने दुनिया पर राज्य किया। इतना बतला देने पर क्या कहने की आवश्‍यकता है कि राष्ट्र कल्‍याण के लिए घुमक्कड़-धर्म कितनी आवश्‍यक चीज है? जिस जाति या देश ने इस धर्म को अपनाया, वह चारों पुरुषार्थ फलों का भागी हुआ और जिसने इसे बिसराया, उसके लिए नरक में भी ठिकाना नहीं। आखिर घुमक्कड़-धर्म को भूलने के कारण ही हम सात शताब्दियों तक धक्‍का खाते रहे, ऐरे-गैरे जो भी आए, हमें चार लात लगाते गये। हम संस्कृति का टीका माथे पर धारण कर लातें खाते गये। बीसवीं सदी में भारतीय घुमक्कड़ यूरोप गये। उन्हें जात बाहर कर दिया गया। उन्ही जात बाहरों के नए विचारों में भारतीय विचार मिलाकर भारतीय राष्ट्रवाद का बीज रोपित हुआ। जिसकी हुंकार स्वामी विवेकानन्द शिकागो में भरते दिखे।  

अच्छा तो धर्म से प्रमाण लीजिए। दुनिया के अधिकांश धर्मनायक घुमक्कड़ रहे। धर्माचार्यों में आचार-विचार, बुद्धि और तर्क तथा सहृदयता में सर्वश्रेष्‍ठ बुद्ध घुमक्कड़-राज थे। यद्यपि वह भारत से बाहर नहीं गये, लेकिन वर्षा के तीन मासों को छोड़कर एक जगह रहना वह पाप समझते थे। वह खुद ही घुमक्कड़ नहीं थे, बल्कि आरंभ ही में अपने शिष्‍यों को उन्‍होने कहा था – ”चरथ भिक्‍खवे!” जिसका अर्थ है – भिक्षुओ! घुमक्कड़ी करो। बुद्ध के भिक्षुओं ने अपने गुरु की शिक्षा को कितना माना, क्या इसे बताने की आवश्‍यकता है? क्या उन्‍होंने पश्चिम में मकदूनिया तथा मिश्र से पूरब में जापान त‍क, उत्तर में मंगोलिया से लेकर दक्षिण में बाली और बांका के द्वीपों तक को रौंदकर रख नहीं दिया? जिस बृहत्तर-भारत के लिए हरेक भारतीय को उचित अभिमान है, क्या उसका निर्माण इन्‍हीं घुमक्कड़ों की चरण-धूलि ने नहीं किया? केवल बुद्ध ने ही अपनी घुमक्कड़ी से प्रेरणा नहीं दी, बल्कि घुमक्कड़ों का इतना जोर बुद्ध से एक दो शताब्दियों पूर्व ही था, जिसके ही कारण बुद्ध जैसे घुमक्कड़-राज इस देश में पैदा हो सके. उस वक्त पुरुष ही नहीं, स्त्रियाँ तक जम्‍बू-वृक्ष की शाखा ले अपनी प्रखर प्रतिभा का जौहर दिखातीं, कूपमंडूकों को पराजित करती सारे भारत में मुक्‍त होकर विचरा करतीं थीं।

कोई-कोई महिलाएँ पूछती हैं – क्या स्त्रियाँ भी घुमक्कड़ी कर सकती हैं, क्या उनको भी इस महाव्रत की दीक्षा लेनी चाहिए? इसके बारे में तो अलग अध्‍याय ही लिखा जाना चाहिये। किंतु यहाँ इतना कह देना काफ़ी है कि घुमक्कड़-धर्म क्या किसी भी धर्म पर स्त्रियाँ उतना ही अधिकार रखती हैं, जितना पुरुष। यदि वह जन्‍म सफल करके व्‍यक्ति और समाज के लिए कुछ करना चाहती हैं, तो उन्‍हें भी दोनों हाथों से इस धर्म को स्वीकार करना चाहिए। घुमक्कड़ी-धर्म छुड़ाने के लिए ही पुरुष ने बहुत से बंधन नारी के रास्‍ते में लगाये हैं। बुद्ध ने सिर्फ पुरुषों के लिए घुमक्कड़ी करने का आदेश नहीं दिया, बल्कि स्त्रियों के लिए भी उनका वही उपदेश था। सम्राट अशोक के पुत्र महेंद्र के साथ बहन संघमित्रा भी बुद्ध का संदेश लेकर श्रीलंका गई थी।

 क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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Hemant Tarey
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वाह भाई वाह
आपके लेख से तन स्फूर्त हो उठा और मन आल्हादित 🎊🙏