श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – भाग-३ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

भारत के प्राचीन धर्मों में जैन धर्म भी है। जैन धर्म के प्रतिष्‍ठापक श्रमण महावीर कौन थे? वह भी घुमक्कड़-राज थे। घुमक्कड़-धर्म के आचरण में छोटी-से-बड़ी तक सभी बाधाओं और उपाधियों को उन्‍होंने त्‍याग दिया था – घर-द्वार और नारी-संतान ही नहीं, वस्‍त्र का भी वर्जन कर दिया था। ”करतल भिक्षा : तरुतल वास” तथा दिग-अम्‍बर को उन्‍होंने इसीलिए अपनाया था, कि निर्द्वंद्व विचरण में कोई बाधा न रहे। भगवान् महावीर दूसरी तीसरी नहीं, प्रथम श्रेणी के घुमक्कड़ थे। वह आजीवन घूमते ही रहे। वैशाली में जन्‍म लेकर विचरण करते ही पावा में उन्‍होंने अपना शरीर छोड़ा। बुद्ध और महावीर से बढ़कर यदि कोई त्‍याग, तपस्‍या और सहृदयता का दावा करता है, तो उसे केवल दम्‍भी कहा जायेगा। आज-कल कुटिया या आश्रम बनाकर तेली के बैल की तरह कोल्‍हू से बँधे कितने ही लोग अपने को अद्वितीय महात्मा कहते हैं या चेलों से कहलवाते हैं। मैं तो जिज्ञासुओं को खबरदार कर देना चाहता हूँ, कि वह ऐसे मुलम्‍मेवाले महात्‍माओं और महापुरुषों के फेर से बचें रहें। वे स्वयं तेली के बैल तो हैं ही, दूसरों को भी अपने ही जैसा बना रखेंगे।

 बुद्ध और महावीर जैसे महापुरुषों की घुमक्कड़ी की बात से यह नहीं मान लेना होगा कि दूसरे लोग ईश्‍वर के भरोसे गुफा या कोठरी में बैठकर सारी सिद्धियाँ पा गये। यदि ऐसा होता, तो शंकराचार्य, जो साक्षात् ब्रह्मस्वरूप थे, क्‍यों भारत के चारों कानों की खाक छानते फिरे? शंकर को शंकराचार्य किसी ब्रह्मा ने नहीं बनाया, उन्‍हें बड़ा बनाने वाला था यही घुमक्कड़ी घर्म। शंकर बराबर घूमते रहे – आज केरल में थे तो कुछ ही महीने बाद मिथिला में, और अगले साल काश्‍मीर या हिमालय के किसी दूसरे भाग उत्तराखंड या हिमाचल में। शंकर तरुणाई में ही शिवलोक सिधार गये, किंतु थोड़े से जीवन में उन्‍होंने सिर्फ तीन भाष्‍य ही नहीं लिखे; बल्कि अपने आचरण से अनुयायियों को वह घुमक्कड़ी का पाठ पढ़ा गये, कि आज भी उसके पालन करने वाले सैकड़ों मिलते हैं। हिंदुओं में तीर्थ यात्रा की परिपाटी उनकी सबसे बड़ी देन है। वास्‍को-द-गामा के भारत पहुँचने से बहुत पहिले शंकर के शिष्‍य मास्‍को और योरुप तक पहुँचे थे। उनके साहसी शिष्‍य सिर्फ भारत के चार धामों से ही सन्‍तुष्‍ट नहीं थे, बल्कि उनमें से कितनों ने जाकर बाकू (रूस) में धूनी रमाई। एक ने पर्यटन करते हुए वोल्‍गा तट पर निज्‍नीनोवोग्राद के महामेल को देखा। फिर क्या था, कुछ समय के लिए वहीं डट गया और उसने ईसाइयों के भीतर कितने ही अनुयायी पैदा कर लिए, जिनकी संख्‍या भीतर-ही-भीतर बढ़ती इस शताब्‍दी के आरंभ में कुछ लाख तक पहुँच गई थी।

रामानुज, मधावाचार्य और दूसरे वैष्‍णवाचार्यों के अनुयायी मुझे क्षमा करें, यदि मैं कहूँ कि उन्‍होंने भारत में कूप-मंडूकता के प्रचार में बड़ी सरगर्मी दिखाई। भला हो, रामानंद और चैतन्‍य का, जिन्‍होंने पक से पंकज बनकर आदिकाल से चले आते महान घुमक्कड़ धर्म की फिर से प्रतिष्‍ठापना की, जिसके फलस्वरूप प्रथम श्रेणी के तो नहीं किंतु द्वितीय श्रेणी के बहुत-से घुमक्कड़ उनमें भी पैदा हुए। ये बेचारे बाकू की बड़ी ज्वालामाई तक कैसे जाते, उनके लिए तो मानसरोवर तक पहुँचना भी मुश्किल था। अपने हाथ से खाना बनाना, मांस-अंडे से छू जाने पर भी धर्म का चला जाना, हाड़-तोड़ सर्दी के कारण हर लघुशंका के बाद बर्फीले पानी से हाथ धोना और हर महाशंका के बाद स्नान करना तो यमराज को निमन्‍त्रण देना होता, इसी लिए बेचारे फूँक फूँककर ही घुमक्कड़ी कर सकते थे। इसमें किसे उज्र हो सकता है, कि शैव हो या वैष्‍णव, वेदान्‍ती हो या सदान्‍ती, सभी को आगे बढ़ाया केवल घुमक्कड़-धर्म ने।

महान घुमक्कड़-धर्म, बौद्ध धर्म का भारत से लुप्‍त होना क्या था, तब से कूप-मंडूकता का हमारे देश में बोलबाला हो गया। सात शताब्दियाँ बीत गईं, और इन सातों शताब्दियों में दासता और परतंत्रता हमारे देश में पैर तोड़कर बैठ गई, यह कोई आकस्मिक बात नहीं थी. लेकिन समाज के अगुओं ने चाहे कितना ही कूप-मंडूक बनाना चाहा, परंतु इस देश में माई-के-लाल जब-तब पैदा होते रहे, जिन्‍होंने कर्मपथ की ओर संकेत किया। हमारे इतिहास में गुरु नानक का समय दूर का नहीं है, लेकिन अपने समय के वह महान घुमक्कड़ थे। उन्‍होंने भारत-भ्रमण को ही पर्याप्‍त नहीं समझा और ईरान और अरब तक का धावा मारा। घुमक्कड़ी किसी बड़े योग से कम सिद्धिदायिनी नहीं है, और निर्भीक तो वह एक नम्‍बर का बना देती है। यह अतिवादिता हो सकती है लेकिन इसका संदेश बहुत स्पष्ट है। घुमक्कड़ नानक मक्‍के में जाके काबा की ओर पैर फैलाकर सो गये, मुल्‍लों में इतनी सहिष्‍णुता होती तो आदमी होते। उन्‍होंने एतराज किया और पैर पकड़ के दूसरी ओर करना चाहा। उनको यह देखकर बड़ा अचरज हुआ कि जिस तरफ घुमक्कड़ नानक का पैर घूम रहा है, काबा भी उसी ओर चला जा रहा है। यह है चमत्‍कार! आज के सर्वशक्तिमान, किंतु कोठरी में बंद महात्‍माओं में है कोई ऐसा, जो नानक की तरह हिम्‍मत और चमत्‍कार दिखलाए?

दूर शताब्दियों की बात छोड़िए, अभी पिछली शताब्‍दी भी नहीं बीती थी, इस देश से स्वामी दयानंद को विदा हुए। स्वामी दयानंद को ऋषि दयानंद किसने बनाया? घुमक्कड़ी धर्म ने। उन्‍होंने भारत के अधिक भागों का भ्रमण किया; पुस्‍तक लिखते, शास्‍त्रार्थ करते वह बराबर भ्रमण करते रहे। शास्त्रों को पढ़कर काशी के बड़े-बड़े पंडित महा-महा-मंडूक बनने में ही सफल होते रहे, इसलिए दयानंद को मुक्त-बुद्धि और तर्क-प्रधान बनाने का कारण शास्त्रों से अलग कहीं ढूँढ़ना था और वह था उनका निरन्‍तर घुमक्कड़ी धर्म का पालन। उन्‍होंने समुद्र यात्रा करने, द्वीप-द्वीपान्‍तरों में जाने के विरुद्ध जितनी थोथी दलीलें दी जाती थीं, सबको चिंद्दी-चिंद्दी उड़ा दिया और बतलाया कि मनुष्‍य स्‍थावर वृत्त नहीं है, वह जंगम प्राणी है। चलना मनुष्‍य का धर्म है, जिसने इसे छोड़ा वह मनुष्‍य होने का अधिकारी नहीं है।

बीसवीं शताब्‍दी के भारतीय घुमक्कड़ों की चर्चा करने की आवश्‍यकता नहीं। इतना लिखने से मालूम हो गया होगा कि संसार में यदि कोई अनादि सनातन धर्म है, तो वह घुमक्कड़ धर्म है। लेकिन वह कोई संकुचित संप्रदाय नहीं है, वह आकाश की तरह महान है, समुद्र की तरह विशाल है। जिन धर्मों ने अधिक यश और महिमा प्राप्‍त की है, वह केवल घुमक्कड़ धर्म ही के कारण। प्रभु ईसा घुमक्कड़ थे, उनके अनुयायी भी ऐसे घुमक्कड़ थे, जिन्‍होंने ईसा के संदेश को दुनिया के कोने-कोने में पहुँचाया। यहूदी पैगम्‍बरों ने घुमक्कड़ी धर्म को भुला दिया, जिसका फल शताब्दियों तक उन्‍हें भोगना पड़ा। उन्‍होने चूल्‍हे से सिर निकालना नहीं चाहा। घुमक्कड़-धर्म की ऐसी भारी अवहेलना करने वाले की जैसी गति होनी चाहिए वैसी गति उनकी हुई। चूल्‍हा हाथ से छूट गया और सारी दुनिया में घुमक्कड़ी करने को मजबूर हुए। घुमक्कड़ी ने जिन्हें मारवाड़ी सेठ बनाया; या यों कहिए कि घुमक्कड़ी-धर्म की एक छींट पड़ जाने से मारवाड़ी सेठ भारत के यहूदी बन गये। जिसने इस धर्म की अवहेलना की, उसे रक्‍त के आँसू बहाने पड़े। अभी इन बेचारों ने बड़ी कुर्बानी के बाद और दो हजार वर्ष की घुमक्कड़ी के तजर्बे के बल पर फिर अपना स्‍थान प्राप्‍त किया। आशा है स्‍थान प्राप्‍त करने से वह चूल्‍हे में सिर रखकर बैठने वाले नहीं बनेंगे। अस्‍तु,  सनातन-धर्म से पतित यहूदी जाति को महान पाप का प्रायश्चित या दंड घुमक्कड़ी के रूप में भोगना पड़ा, और अब उन्‍हें पैर रखने का स्‍थान मिला। यह घुमक्कड़ी धर्म है, जिसने यहूदियों को केवल व्‍यापार-कुशल उद्योग-निष्‍णात ही नहीं बनाया, बल्कि विज्ञान, दर्शन, साहित्‍य, संगीत सभी क्षेत्रों में चमकने का मौका दिया। समझा जाता था कि व्‍यापारी तथा घुमक्कड़ यहूदी युद्ध-विद्या में कच्‍चे निकलेंगे; लेकिन उन्‍होंने पाँच-पाँच अरबी साम्राज्‍यों की सारी शेखी को धूल में मिलाकर चारों खाने चित्त कर दिया और सबने नाक रगड़कर उनसे शांति की भिक्षा माँगी।

इतना कहने से अब कोई संदेह नहीं र‍ह गया, कि घुमक्कड़-धर्म से बढ़कर दुनिया में धर्म नहीं है। धर्म भी छोटी बात है, उसे घुमक्कड़ के साथ लगाना ”महिमा घटो समुद्र की, रावण बसा पड़ोस” वाली बात होगी। घुमक्कड़ होना आदमी के लिए परम सौभाग्य की बात है. यह पंथ अपने अनुयायी को मरने के बाद किसी काल्‍पनिक स्वर्ग का प्रलोभन नहीं देता, इसके लिए तो कह सकते हैं – ”क्या खूब नक़द सौदा है, इस हाथ ले इस हाथ दे।” घुमक्कड़ी वही कर सकता है, जो निश्चिंत है। घुमक्कड़ी के लिए चिंताहीन होना आवश्‍यक है, और चिंताहीन होने के लिए घुमक्कड़ी भी आवश्‍यक है। दोनों का अन्‍योन्‍याश्रय होना दूषण नहीं भूषण है। घुमक्कड़ी से बढ़कर सुख कहाँ मिल सकता है? आखिर चिंता-हीनता तो सुख का सबसे स्‍पष्‍ट रूप है। घुमक्कड़ी में कष्‍ट भी होते हैं, लेकिन उसे उसी तरह समझिये, जैसा भोजन में मिर्च। मिर्च में यदि तीखापन न हो, तो क्या कोई मिर्च-प्रेमी उसमें हाथ भी लगायेगा? वस्‍तुत: घुमक्कड़ी में कभी-कभी होने होने वाले कड़वे अनुभव उसके रस को और बढ़ा देते हैं, उसी तरह जैसे काली पृष्‍ठभूमि में चित्र अधिक खिल उठता है।

व्‍यक्ति के लिए घुमक्कड़ी से बढ़कर कोई सार्थक धर्म नहीं है। जाति का भविष्‍य घुमक्कड़ों पर निर्भर करता है, इसलिए हरेक तरुण और तरुणी को घुमक्कड़-व्रत ग्रहण करना चाहिए, इसके विरुद्ध दिये जाने वाले सारे प्रमाणों को झूठ और व्‍यर्थ का सामना करना चाहिए, यदि माता-पिता विरोध करते हैं, तो समझाना चाहिए कि वह भी भक्त प्रह्लाद के माता-पिता के नवीन संस्‍करण हैं। यदि हित-बांधव बाधा उपस्थित करते हैं, तो समझाना चाहिए कि वे दिवांध हैं। धर्म-धर्माचार्य कुछ उलटा-सीधा तर्क देते हैं, तो समझ लेना चाहिए कि इन्‍हीं ढोंगों और ढोंगियों ने संसार को कभी सरल और सच्‍चे पथ पर चलने नहीं दिया। यदि राज्‍य और राजसी-नेता अपनी कानूनी रुकावटें डालते हैं, तो हजारों बार की तजर्बा की हुई बात है, कि महानदी के वेग की तरह घुमक्कड़ की गति को रोकनेवाला दुनिया में कोई पैदा नहीं हुआ। बड़े-बड़े कठोर पहरेवाली राज्‍य-सीमाओं को घुमक्कड़ों ने आँख में धूल झोंककर पार कर लिया। राहुल सांस्कृत्यायन ने ऐसा एक से अधिक बार किया है। पहली तिब्‍बत यात्रा में अंग्रेजों, नेपाल-राज्‍य और तिब्‍बत के सीमा-रक्षकों की आँख में धूल झोंककर जाना पड़ा था।

यदि कोई तरुण-तरुणी घुमक्कड़ धर्म की दीक्षा लेता है – यह अवश्य समझना होगा कि यह दीक्षा वही ले सकता है, जिसमें बहुत भारी मात्रा में हर तरह का साहस है – तो उसे किसी की बात नहीं सुननी चाहिए, न माता के आँसू बहने की परवाह करनी चाहिए, न पिता के भय और उदास होने की, न अपनी पत्‍नी के रोने-धोने की फिक्र करनी चाहिए और न किसी तरुणी को अभागे पति के कलपने की। बस शंकराचार्य के शब्‍दों  ”निस्‍त्रैगुण्‍ये पथि विचरत: को विधि: को निषेधा:” को अपना पथप्रदर्शक बनाना चाहिए।

मानव अपने स्वभाव से जिज्ञासु प्रवृत्ति का होता हैं अर्थात वह हर पल कुछ न कुछ नया जानने में लगा रहता हैं। उनकी यह ललक न केवल अपने मतलब तक की चीजों से जुडी होती हैं बल्कि वह नई-नई जगहों आदि के बारें में जानकारी इकट्ठा करता रहता हैं।

देशाटन हिन्दी के दो शब्दों देश और अटन से मिलकर बनता हैं। यहाँ देश शब्द का आशय एक ऐसे भूभाग से किया जाता हैं। जो प्राकृतिक रूप से संसाधनों से सम्पन्न हो। ऐसे ही भूभाग को को देश कहा जाता हैं। जो दूसरे देश या प्रान्त से पूर्ण रूप से अलग हो, वही अटन शब्द का अर्थ होता हैं भ्रमण, घूमना, फिरना या सैर करना, नयें नयें स्थानों को देखना आदि। इस तरह से कोई व्यक्ति अपने या दूसरे देश के भूभाग में प्राकृतिक सौन्दर्य, ऐतिहासिक स्थलों, स्मारकों, पर्वतों, सभ्यता, संस्कृति का अवलोकन करने जाता हैं तो उसे देशाटन कहा जाता हैं। हिन्दी में देशाटन के लिए एक अन्य शब्द देश दर्शन भी प्रयोग किया जाता हैं. इस तरह छोटे या व्यापक रूप में देशाटन का अर्थ भ्रमण या दर्शन करने से लिया जाता हैं फिर वह किन्ही राज्यों का हो या दुनियां के किसी देश का हो। इतिहास-देशाटन का अतीत उतना ही पुराना हैं जितना कि मानव का। प्राचीन काल में भी बड़ी मात्रा में देशाटन हुआ करते थे। मध्यकाल तथा उससे पूर्व दसवीं सदी तक के समय में कई विदेशी यात्री भारत में देशाटन के लिए आए थे। फाहियान, ह्वेनसान, इब्नबतूता जैसे यात्रियों ने यहाँ भ्रमण कर भारत की संस्कृति, सभ्यता एवं लोगों के जीवन रहन सहन आदि के बारें में जानकारी प्राप्त की थी।

जो भी विदेशी यात्री भारत आया, उसने अपनी पुस्तक में भारत के लोगों के बारें में विस्तृत वर्णन किया हैं। चीन, वियतनाम आदि देशों से कई बौद्ध भिक्षु भी भारत दर्शन के लिए समय समय पर आते रहे। यह वह दौर था जब यातायात एवं संसार के साधन न के बराबर थे। वास्कोडिगामा भी इसी काल अवधि में भारत आया था।

भिन्न-भिन्न नयें स्थानों का देशाटन के कई सारे फायदे हैं। आज के दौर में देश विदेश की यात्रियों से जो सुख अनुभव मिलते हैं वे अन्यत्र असम्भव हैं। आज किसी भी क्षेत्र में यात्रा के लिए हवाई जहाज, रेल, बस, कार समस्त सेवाएं मिलती हैं। विदेशी यात्राओं के लिए साहसिक समुद्री यात्रा अनुभव का भी लुफ्त उठाया जा सकता हैं। देशाटन का सबसे बड़ा फायदा यह हैं कि हमारे ज्ञान एवं अनुभव में वृद्धि होती हैं। नये-नये स्थानों तथा लोगों से मिलने उनकी संस्कृति रीती रिवाज रहन सहन, भाषा का परिचय होता हैं। प्राकृतिक स्थलों का देशाटन से हम प्रकृति के नये-नये रूपों से अवगत होते हैं। ऐतिहासिक स्थल व स्मारक हमारे इतिहास के ज्ञान को ताजा करते हैं। हमें उस समय की कला संस्कृति तथा ज्ञान का अनुभव मिलता हैं। अधिकतर लोग शौक से भी देशाटन करते हैं ऐसा करने से उनके मन को शांति, जीवन में नई ऊर्जा का संचार होता हैं। आज विश्वभर में देशाटन को एक उद्योग की तरह मान्यता दी जाती हैं। इसकी वजह यह हैं कि देशी-विदेशी पर्यटकों के आने से न केवल अर्थव्यवस्था को बल मिलता हैं बल्कि प्रेम एवं भाईचारे के माहौल की भी स्थापना होती हैं।

मनुष्य में जिज्ञासा की भावना बड़ी प्रबल है। वह अपने पास-पड़ोस, नगर, राष्ट्र, विश्व के बारे में जानना चाहता है। यही जिज्ञासा उसे पर्यटन या देशाटन करने को विवश करती है। विभिल जीवन-पद्धतियों के अध्ययन से नाना प्रकार के प्राकृतिक दृश्यों को देखने से, विभिन्न राष्ट्रों के विकास साधनों एवं वैज्ञानिक उन्नति के परिचय से मानव को आनंद, उत्साह तथा ज्ञान प्राप्त होता है। मनुष्य स्थावर वृक्ष नहीं, जंगम प्राणी है। चलना उसका धर्म है। ‘चरैवेति-चरैवेति’ उसका नारा है।

‘सैर कर दुनिया की गाफिल जिन्दगानी फिर कहाँ?

जिंदगानी ग़र रही तो नौजवानी फिर कहाँ?

‘इस्माइल मेरठी’ के ये लफ़्ज़ देशाटन के प्रेरणा-स्रोत हैं। विभिन्‍न देशवासियों की प्रकृति-प्रवृत्ति के परिणाम, विशिष्ट विषय के अध्ययन, ऐतिहासिक, भौगोलिक, साहित्यिक तथा वैज्ञानिक गवेषणा, प्राकृतिक दृश्यों के अवलोकन, धर्म तथा संस्कृति के आयाम, राष्ट्रीय मेलों और सम्मेलनों में एकत्र होना, तीर्थाटन, व्यापार-वृद्धि, राजकार्य, कूटनीतिक तथा गुप्तचर कार्य, सर्वेक्षण, आयोग तथा शिष्टमंडल, जीवकोपार्जन, आखेट, मनोरंजन, स्वास्थ्य सुधार, पर-राज्य में आश्रय आज के देशाटन के प्रयोजन हैं।

घर से बाहर कदम रखते ही कष्टों का श्रीगणेश होता है, फिर देशाटन तो महाकष्टप्रद है। थका देने वाली यात्रा, प्रतिकूल आहार-व्यवहार; विश्राम की प्रतिकूल व्यवस्था; भाषा न समझने की विवशता; परम्परा और सभ्यता के मानदण्ड की अनभिज्ञता, ठग और गिरहकटों का भय, विपरीत प्रकृति-प्रवृत्ति वाले अथवा दुष्ट लोगों का साथ तथा अत्यधिक आर्थिक बोझ देशाटन में बाधक हैं। डॉ. राहुल सांकृत्यायन की दलील है; घुमक्कड़ी में कष्ट भी होते हैं, लेकिन उसे उसी तरह समझिए, जैसे भोजन में मिर्च।

देशाटन से अनुभव का विकास होता है। विभिन्‍न राष्ट्रों, स्थानों की भौगोलिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक स्थिति का ज्ञान होता है व्यापारिक स्पर्द्धा और उन्नत होने के भाव प्रबल होते हैं। सहिष्णुता की शक्ति बढ़ती है। विभिन्न प्रकृति के मनुष्यों से संपर्क में आने के कारण मानव मनोविज्ञान के ज्ञान में वृद्धि होती है। नये लोगों के मेल-मिलाप से मित्रता की सीमा फैलती है। प्रकृति से साहचर्य बढ़ता है। बातचीत करने का ढंग पता लगता है। व्यवहार कुशलता में वृद्धि होती है। कष्ट-सहिष्णुता का स्वभाव बनता है। मन का रंजन होता है। आंनद का स्रोत फूटता है। जीवन में सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है। विदेशों में भ्रमण करने से अनेक प्रकार के चाल-चलन दिखाई पड़ते हैं। सज्जनों और दुर्जनों के स्वभाव मालूम होते हैं और मनुष्य अपने आपको पहचान जाता है। इसलिए पृथ्वी पर भ्रमण करना चाहिए।

देशाटन द्वारा ज्ञान प्राप्ति के साथ-साथ हमें सरस और रुचिपूर्ण मनोरंजन भी प्राप्त होता है। विभिन्‍न स्थानों, वनों, पहाड़ों, नदी-तालाबों और सागर की उत्ताल तरंगों का अवलोकन कर पर्यटक का मन झूम उठता है। पर्यटन हमारे स्वास्थ्य के लिए भी हितकर है। जलवायु-परिवर्तन से चित्त में सरसता और उत्साह का संचार होता है, जिससे हम प्रसन्‍न मन:स्थिति में रहते हैं, जो हमारे स्वास्थ्य की अनिवार्य शर्त है। देशाटन के दौरान हमें अनेक असुविधाओं और कष्टों का भी सामना करना पड़ता है। इन्हें सहन करके तथा इनका समाधान ढूँढ लेने पर हमें अद्भुत खुशी का अनुभव होता है।

देशाटन विश्व-बंधुत्व की भावना की भी वृद्धि करता है। सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे संतु निरामया: की मंगलमयी भावना, विश्व में शांति, सुख, सौन्दर्य और श्री वृद्धि का जनक है। देशाटन विश्व बंधुत्व की भावना प्रबल करने का प्रयास है। कष्टों, विपत्तियों, प्राकृतिक विपदाओं, दुर्भावनाओं, युद्धों और विनाश-प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने का प्रयास है। विश्व को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला ज्योति पुंज है। आइए, बहरहाल महापंडित राहुल सांकृत्यायन जी से घुमक्कड़-धर्म की दीक्षा लेते हैं। दक्षिणा स्वरुप छः महीनों में एक घुमक्कड़ी-व्रत का उस समय तक पालन करें जब तक हम मायावी संसार में घुमक्कड़ी कर सकते हैं।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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