श्री संजय भारद्वाज
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३०५ ☆ अगले बरस तू जल्दी आ…
कल अनंत चतुर्दशी थी। गणेश चतुर्थी के दिन गणेश जी के विग्रह की प्रतिष्ठा से आरम्भ गणेशोत्सव विसर्जन के साथ ही कल समाप्त हो गया। यूँ देखें तो सृजन, प्रतिष्ठा और विसर्जन के माध्यम से जीवन की सम्पूर्ण यात्रा हमारे अनेक त्योहारों में अंतर्निहित है। आगमन से गमन तक का पर्व है, गणेशोत्सव।
घर में अतिथि का आगमन एक सामान्य घटना है। अतिथि के आने का दूसरा पहलू है कि वह लौट जाएगा। भूलोक भी प्रकृति का घर है। हम सब अतिथि हैं। मर्त्यलोक में देह धारण करके जो आया, उसका लौटना अवश्यंभावी है। कीर्ति तो अक्षुण्ण रह सकती है, अमर हो सकती है पर देह का नष्ट होना अनिवार्य है।
नश्वर जगत में प्रदत्त समय का सदुपयोग करना, अपनी भूमिका का समुचित निर्वहन करना मनुष्य से अपेक्षित है। समय बीतने के बाद पश्चाताप के अलावा कुछ शेष नहीं रह जाता।
किसी राज्य में राजा द्वारा आयोजित संगीतोत्सव में भाग लेने के लिए एक युवा सितारवादक को आमंत्रित किया गया। सितारवादक के लिए अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन का यह स्वर्णिम अवसर था। उसने विचार किया कि वह ऐसा सितार बजाएगा जिससे श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाएँगे और राजा उससे प्रसन्न होकर बहुत सारा धन देगा।
संगीतोत्सव आरम्भ हुआ। हर कलाकार की प्रस्तुति के लिए समय निर्धारित था। समय पूरा होने पर पर्दा गिर जाता और फिर नया कलाकार आता। सितारवादक की प्रस्तुति का समय आया। वह मंच पर पहुँचा। वादन आरम्भ करने से पहले सितार की ट्यूनिंग के लिए उसकी खूँटियाँ मरोड़ कर सुर मिलाने लगा। इस प्रक्रिया में ऐसा खोया कि उसे प्रदत्त समय समाप्त हो गया और पर्दा गिरा दिया गया। सितारवादक को वादन के बिना ही लौटना पड़ा। अवसर तो मिला था पर प्रस्तुति नहीं दे पाया, तैयारी में ही रह गया। डॉ. हरिवंशराय बच्चन के शब्दों में लिखूँ तो ‘जीवन सब बीत गया, जीने की तैयारी में।’
समय रहते वह सितार बजा लेता तो संभव था कि उसकी सितार के सुर वर्षों तक याद किए जाते और देहातीत होकर भी अपनी प्रतिभा के बल पर वह चिरंजीवी हो जाता।
अष्ट चिरंजीवी व्यक्तित्वों में से एक हैं महर्षि वेदव्यास। उन्हें ज्ञान का मूर्तिमान स्वरूप माना गया है। मान्यता है कि महर्षि ने भगवान गणेश को दस दिन तक निरंतर महाभारत की कथा सुनाई और श्री गणेश उसे लिपिबद्ध करते गए। तत्पश्चात महर्षि ने पाया कि श्री गणेश के शरीर का तापमान बहुत अधिक बढ़ गया है। महर्षि ने गणेश जी को समीप के एक सरोवर में स्नान कराया ताकि उनके शरीर का तापमान सामान्य हो सके। यह काल गणेशोत्सव के रूप में मनाया जाता है और उत्कर्ष के रूप में विग्रह का जल में विसर्जन होता है।
श्री गणेश बुद्धि के देवता हैं। स्वाभाविक है कि उनके लिए मनाया जानेवाला उत्सव ज्ञान की प्रतीति कराने वाला हो। महर्षि वेदव्यास इसी शाश्वत ज्ञान के अविनाशी प्रसारक हैं। ज्ञान के प्रचार-प्रसार में लगे साधकों में महर्षि का यही जाग्रत अंश देखने को मिलता है।
सृजन, प्रतिष्ठा और विसर्जन के माध्यम से गणेशोत्सव, जीवनचक्र की प्रतिकृति बनकर सामने आता है। स्मरण रहे, ‘अगले बरस तू जल्दी आ’ आगमन से गमन की सतत और अखंड यात्रा का घोष है। काया धारण करने वाला हर जीव इसी अटल यात्रा का पथिक है। ..इति।
© संजय भारद्वाज
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्री गणेश साधना संपन्न हुई. अगली साधना की सूचना आपको शीघ्र ही दी जावेगी।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈



