श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “भाव भक्ति के साथ: पूजन…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २५८ ☆ भाव भक्ति के साथ: पूजन… ☆
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मातु सरस्वती पूजन कीन्हा ।
विद्या ज्ञान आप वर दीन्हा ।।
श्वेत वस्त्र पुस्तक वर धारी ।
कमल आसनी आन पधारी।।
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मंगलकाज हुए सब जाते ।
मूढ़ मती के भाग्य जगाते।।
वीणा वादिन हंस वाहिनी ।
सप्त सुरों की आप दायिनी।।
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कई बार अनजाने ही बहुत से ऐसे कार्य हो जाते हैं, जिनको कोई करना नहीं चाहता , सब कुछ पूर्व निर्धारित तरीके से नहीं हो सकता । केवल प्रयास आपके द्वारा हो ऐसा करते रहें परन्तु परिणाम क्या होगा इसकी चिन्ता न करें । आप कर्म के अधिकारी हैं कर्ता नहीं ।
सारे दुःख का कारण यही होता है कि हम स्वयं को कर्ता समझने की भूल कर बैठते हैं और अनजाने ही उन गलतियों के जिम्मेदार बन जाते हैं जो की ही नहीं गयी ।
इसे इस दृष्टि से देखें, जो होगा अच्छा होगा इसमें ही सबका कल्याण है । हर पल को भगवान का उपहार समझते हुए आनन्द के साथ जियें और जीने दें।
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© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
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