श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है आपका आलेख “छाया रूपेण संस्थिता ”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४२ ☆
🌻आलेख 🚩छाया रूपेण संस्थिता 🚩
सदियो से चली आ रही— वह दुर्गा की छाया ही तो है। माँ, कन्या, बहन, बेटी, बहु, अर्धांगिनी, स्वामिनी, दासी, सेविका, तत सम भाव रुप और ममता बदलते हुये।
जगह- जगह देवी कहलाने का अधिकार क्या ? सिर्फ नवरात्रे पर ही होती है। वात्सल्य, ममता को आँचल में छिपाये, वंश को पल्लवित करते, अपार नेह बरसाते, आशीष देते वह छाया ही तो है।
कभी शैलपुत्री, ब्रम्ह चारणी, चन्द्र घंटे, कुष्मांडा, स्कंध, कात्यायनी, कालरात्रि, दुर्गा, सिद्धिदात्री सभी रुप गुणों में पूजी जाती है।
स्व और समाज की प्रवृति से चंचला– आज भामिनी से भोगिता, भोगिनी की ओर बढ़ते – छाया रूपेण संस्थिता की श्रेष्ठता- श्रद्धा दोनों खंडन- खंडित, मूरत दर्शिता की भावना रंजित होते चली जा रही है।
या देवी सर्व भूतेशु श्रद्धा रूपेण संस्थिता को पावन करें जगदंबिका।
माँ के नवरात्रे पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं 💐🙏
☆
© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




