श्री सुरेश पटवा
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पशुपतिनाथ मंदिर – भाग-६ ☆ श्री सुरेश पटवा
नेपाल महात्म्य और हिमवतखंड पर आधारित स्थानीय किंवदंती के अनुसार भगवान शिव एक बार वाराणसी के अन्य देवताओं को छोड़कर बागमती नदी के किनारे स्थित मृगस्थली चले आये, जो बागमती नदी के दूसरे किनारे पर जंगल में अभी भी है। भगवान शिव वहां पर चिंकारे का रूप धारण कर निद्रा में चले गए। जब देवताओं ने उन्हें खोजा और उन्हें वाराणसी वापस लाने का प्रयास किया तो उन्होंने नदी के दूसरे किनारे पर छलांग लगा दी। इस दौरान उनका सींग चार टुकडों में टूट गया। उसी स्थान पर भगवान पशुपति चतुर्मुख लिंग के रूप में प्रकट हुए।
मंदिर में चार दरवाजे हैं, जो कार्डिनल दिशाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। पशुपति पुराण के अनुसार, नेमी द्वारा संरक्षित स्थान के रूप में, हिमालय के बीच में स्थित देश को नेपाल के रूप में जाना जाने लगा। नेपाल महात्म्य के अनुसार, नेमी पर पशुपति द्वारा देश की सुरक्षा का दायित्व सौंपा गया था। बौद्ध पौराणिक कथाओं के अनुसार, मंजुश्री बोधिसत्व ने नेपाल घाटी बनाने के लिए नागों की एक प्राचीन झील को बहा दिया और घोषणा की, कि आदि-बुद्ध उस समुदाय की देखभाल करेंगे जो इसे बसाएगा। उसे नेपाल घाटी कहा जाएगा। गोपालराज वंशावली के अनुसार 1380 के दशक में, नेपाल का नाम नेपा द काउहर्ड के नाम पर रखा गया है, जो कि नेपाली वंशज के संस्थापक हैं। इस प्रकार नेपाल घाटी का सम्बंध हिंदू, जैन और बुद्ध परम्पराओं से जुड़ा है।
उसके बाद भरत शर्मा जी हमें पशुपतिनाथ और विशाल नंदी के विधिवत दर्शन करवा कर मुख्य भाट के निवास पर ले गए। मुख्य भाट जी एक छोटी सी बैठक में अपनी पालतू बिल्ली के साथ विराजमान थे। निवास के पीछे गाय बंधी थी। उन्होंने उसके ताजे दूध की चाय पिलाई। पूरे नेपाल में पशुओं को बड़े सम्मान से पाला जाता है। बिल्ली हमारी गोद में आ गई। हमने उसकी पीठ और गले पर सहलाया तो जब तक हम वहाँ रहे वह हमारी गोद में ही ज़मी रही। मुख्य भाट उसे बुलाते रहे परंतु वह टस से मस न हुई। सबके उठने पर वह भी चल दी। मुख्य भाट जी ने अपने निजी पूजा स्थल पर पशुपतिनाथ जी के दर्शन करवा कर हमारे गले में रुद्राक्ष माला पहना कर मंगलाचरण श्लोक पढ़ा। हम दर्शन करके आवास पर पहुँचे। वहाँ सादा जैन भोजन तैयार था। भोजन करके रात्रि विश्राम किया। इति 15 जून 2022 वृतांत।
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16 जून 2022 को होटल येलो पेगोड़ा में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय भाखा सम्मेलन में सम्मिलित होने दस बजे पहुँचना था। जैन भोजनालय में दो-दो आलू पराठा ताजे दही के साथ बरास्ते रसना उदर में उतारे। जवाहर जी ने बताया कि एक टैक्सी हमें लेने आ रही है। हम तैयार होकर जैन मंदिर में महावीर स्वामी के दर्शन उपरांत गेट पर टैक्सी का इंतज़ार करने लगे। एक घंटा इंतज़ार करने के बाद सम्मेलन के आयोजक गंगा प्रसाद शर्मा पहुँचे। उनके साथ होटल येलो पेगोड़ा पहुँचे। कार्यक्रम स्थल पाँचवें माले पर था। वहाँ तब तक कुछ भी तैयारी नहीं हुई थी। दस बजे से मुख्य अतिथि नेपाल के पूर्व शिक्षा मंत्री मोदा नाथ प्रश्री का इंतज़ार करने लगे। उन्हें आने में विलम्ब हो रहा था इसलिए आयोजकों ने उपस्थित साहित्यकारों से कविता-गीत-ग़ज़ल सुनाना शुरू कर दिया। हमने भी समय के साथ पति-पत्नी के रिश्ते में उतरते खुमार पर एक ग़ज़ल पढ़ी। जिसे लोगों ने पसंद किया। आप भी पढ़िए।
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बात तो होती है उनकी मगर वो बात नहीं होती,
वैसी दिलचस्प अब उनकी मुलाक़ात नहीं होती।
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बातों-बातों में भीग जाता था अश्कों से दामन,
स्याह बादल आते हैं मगर बरसात नहीं होती।
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पहले पूरी रात ही गुज़र जाती थी रानाइयों में,
ज़ुबान खुलती मगर मुहब्बत की रात नहीं होती।
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गिरह उनके बड़ी देर में बहुत मुश्किल से खुलते,
सब कुछ हो जाता है मगर मुलाक़ात नहीं होती।
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दिन कई बीत जाते बिना मतलब बतोले किए,
नज़रों नज़रों में भी अब कोई बात नहीं होती।
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जुबां तो कैंची सी चलती दोनों तरफ़ देर तलक,
अजीब है मगर क़ायदे की कोई बात नहीं होती।
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अब शाम की अंगड़ाई का आलम छोड़िए हुज़ूर,
जुदाई के वक्त भी नज़राना सौग़ात नहीं होती।
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पूर्णिमा गुज़र जाती है अमावस के इंतज़ार में,
रातें बहुत आती मगर चाँदनी रात नहीं होती।
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मसरूफ़ियत बनी शातिर अन्दाज़ की सौतन,
साथ रहकर जज़्बात की कोई बात नहीं होती।
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अब बदल चुकी हैं रिश्तों की रवायात इस क़दर,
किसी को ढाई हर्फ़ों की अता ख़ैरात नहीं होती।
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दोनो मुँह फुलाए बैठे हैं इश्क़ की महफ़िल में,
आतिश आहत मन से दिल की बात नहीं होती।
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मुख्य अतिथि महोदय बहुत विलम्ब से आने के कारण दस बजे शुरू होने वाला कार्यक्रम बारह बजे प्रारम्भ हो सका। प्रथम सत्र की अध्यक्षता नेपाली साहित्यकार ऋषभ देव धिमिरे ने की। मुख्य अतिथि- जवाहर कर्णावत, विशिष्ट अतिथि – दधि राज, जितेंद्र दहिया, पूनम मिश्रा इत्यादि ने सम्मेलन को सम्बोधित किया। पुस्तक लोकार्पण सत्र में हमारे कहानी संग्रह “प्रेमार्थ”, चंद्र भान राही के उपन्यास “मायानगरी के सम्राट” और डा.अनीता चौहान के कहानी संग्रह “टूटते इंद्रधनुष” का मुख्य अतिथि द्वारा लोकार्पण कराया गया। हमने तीनों कृतियों पर प्रकाश डाला। स्वागत उद्बोधन- गंगा प्रसाद शर्मा “गुणशेखर” ने दिया। उसके पश्चात सम्मान समारोह हुआ। डॉक्टर जवाहर कर्णावत भोपाल ने अपने उद्बोधन में भाषा की उपदेयता, ज्ञान का माध्यम, हिंदी पत्रकारिता, अवधि, भोजपुरी और हिंदी के प्रचार प्रसार पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा रामचरितमानस ने हिंदी को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई। फ़िजी, सूरीनाम, मारीशस, दक्षिण अफ़्रीका, गुयाना में हिंदी की वस्तुस्थिति बताई। मुख्य अतिथि ने टूटिफूटी हिंदी में सम्बोधित किया। तीन बजे दोपहर भोज हुआ।
बीच में फ़ुरसत के समय काठमांडू पर चर्चा होती रही। होटल की छत से काठमांडू को घेरे खड़ी पहाड़ियाँ हल्की बूँदाबाँदी के बीच धुँधली दिख रही थीं। दिमाग़ में विचार आया कि इन्ही पहाड़ियों से पाँच नदियाँ इस घाटी में उतरती हैं।
दूसरा सत्र चार बजे प्रारम्भ हो सका। कार्यक्रम संचालक महोदय खुद एक घंटा बोलते रहे। अंत में राम के ऊपर तीन मिनट का व्याख्यान बीस लोगों को देना था। कोई तीन मिनट तो कोई आठ, नौ और दस मिनट तक बोलते रहे। संचालक स्वयं अधिक बोलने का लोभ संवरण नहीं कर पाए थे, तो दूसरों को क्या कहते? अंत के दो वक्ताओं के पूर्व हमको बोलने को कहा गया।
हमने कहा- हम लोग किस राम की बात कर रहे हैं। बाल्मीकी के राम, तुलसी के राम, कबीर के राम, गुरु रामदास के राम, लोहिया के राम, गांधी के राम, रामानन्द सागर के राम, वोट के राम या चोट के जय श्री राम। राम एक संस्कृति हैं, राम एक व्यक्ति हैं, राम एक दर्शन हैं। हम रामकथा की ऐतिहासिकता पर बात करेंगे। तुलसी दास का जन्म 1532 में हुआ था और देहत्याग 1623 में, उन्होंने अकबर का पूरा 49 वर्ष का शासन और जहांगीर के शासन के 18 वर्ष देखे थे। वे 91 वर्ष जीवित रहे थे। मुहम्मद गौरी के बाद के समूचे सुल्तानी काल से हिंदू जनता प्रताड़ित थी। वह बाहरी चीजों को छोड़कर अंतर्मुखी भक्ति की तरफ़ मुड़ी। तब भारतीय संस्कृति ने मीरा, सूरदास, कबीरदास, गुरु नानक और तुलसीदास जैसे संतों से हिंदी साहित्य का भक्ति काल आरम्भ करवाया। तुलसी दास जी ने राजपुर में पहला हनुमान मंदिर स्थापित कर रामकथा कहना आरम्भ किया। तभी से राममय लोक संस्कृति का विकास हुआ है। जो निर्गुण राम भारतीयों की आत्मा की ताक़त थे। अब सत्ता की सगुण कमजोरी बन गए हैं। हम राम की महान संस्कृति को किस तरफ़ ले जाना चाहते हैं। हमें विचार करना होगा। राम संस्कृति को जानना है तो तुलसी को जानो, अमृत लाल नागर की किताब “मानस का हँस” पढ़ो। रामधारी सिंह दिनकर की “भारतीय संस्कृति के चार अध्याय” पढ़ो।
अंत में शोध पत्र प्रस्तुति कार्यक्रम में हमने अपना व्याख्यान “उपन्यास का इतिहास” शोध पत्र पढ़ा।
“उपन्यास भारतीय विधा नहीं है। उपन्यास लेखन मध्यम वर्ग के विकास से जुड़ा है। उपन्यास विधा ने इंग्लैंड में सत्रहवीं सदी में शुरुआत, अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी में विकास बीसवीं सदी में परिपक्वता प्राप्त की थी। एक उपन्यास लम्बा जटिलता पूर्ण गद्य कथा है जो मानवीय अनुभव के साथ कल्पनात्मक रूप में आकार लेता है। अंग्रेजी साहित्य में इसकी उत्पत्ति पारंपरिक रूप से 18 वीं शताब्दी में हुई है।
उपन्यास ने अंग्रेजी गृहयुद्ध (1642) की शुरुआत में हुए धर्म सत्ता और उच्च-मध्यम वर्ग के बीच हुए संघर्ष को सबसे प्रभावी ढंग से चिह्नित किया। चार्ल्स प्रथम के बाद 1649 में हाउस ऑफ कॉमन्स द्वारा राजशाही और हाउस ऑफ लॉर्ड्स के उन्मूलन ने प्यूरिटन कॉमनवेल्थ (1649-1660) के गठन और मध्यम वर्ग के राजनीतिक प्रभुत्व में पहली बार वृद्धि का संकेत दिया। 1688 की गौरवशाली क्रांति से घबरा कर जेम्स II (“ओल्ड प्रिटेंडर”) अपने बेटे चार्ल्स (“यंग प्रेटेंडर” या बोनी प्रिंस चार्ली) के साथ फ्रांस भाग गया। ब्रिटिश संसद ने विलियम ऑफ ऑरेंज और उनकी पत्नी, मैरी, (स्पेन कैथोलिक जेम्स द्वितीय की प्रोटेस्टेंट बेटी) को इंग्लैंड पर शासन करने के लिए आमंत्रित किया। 1715 के स्कॉटिश विद्रोह के बाद स्टुअर्ट राजशाही ने आंशिक रूप से 1745-1746 में इस सिद्धांत को स्वीकार किया कि अंग्रेजी मध्यम वर्ग संसद के माध्यम से अपना शासक चुन सकता है; इसे उस मध्यम वर्ग की शक्ति के विकास के दूसरे चरण के रूप में भी देखा जा सकता है। यह सब उपन्यास के माध्यम से हुआ।
इंग्लैंड ने फ्रांस के साथ 1689-1697 के सात वर्षीय युद्ध ने बर्बादी देखी। लेकिन सत्रहवीं सदी के अंत और अठारहवीं शताब्दी की शुरुआत (विशेषकर रानी ऐनी के शासनकाल के दौरान, 1702-1714) में इंग्लैंड की भौतिक प्रगति, व्यापारिकता में वृद्धि, जनसंख्या में भारी वृद्धि और शहर में जनसंख्या का तीव्र और अपरिवर्तनीय स्थानांतरण का दौर चला। समाज औद्योगिक क्रांति के कगार पर था और समवर्ती वैज्ञानिक क्रांति ने इसे बढ़ावा दिया। मुक्त उद्यम फला-फूला और इसके साथ मध्यम वर्ग का विस्तार हुआ। फलस्वरूप अठारहवीं शताब्दी की शुरुआत में इंग्लैंड एक व्यापारिक शक्ति बन गया। जबकि इंग्लैंड का शासन अभी भी अपेक्षाकृत कम संख्या के लॉर्ड्ज़ परिवारों के पास था। परंतु अब इंग्लैंड के वंशानुगत जमींदारों को उस युग के नए व्यापारी पूँजीपतियों के साथ सत्ता साझा करनी थी। अंग्रेज़ी उपन्यासों ने महती भूमिका निभाई।
लॉर्ड और कारोबारी पूँजीपति वर्ग-संघर्ष के इस परिवेश से आरंभिक अंग्रेजी उपन्यासों का उदय हुआ। वास्तव में, रॉबिन्सन क्रूसो, कर्नल न्यूपोर्ट और मोल फ़्लैंडर्स के रूप में गुमनाम पात्रों के “इतिहास” या “जीवन” और मिगुएल डे सर्वेंट्स ने ‘डॉन क्विक्सोट (1605) और छद्म ऐतिहासिक परंपरा में, डेनियल डेफो के उपन्यासों ने अपनी कल्पनाओं को उपन्यास में प्रस्तुत किया।
मिगुएल डे सर्वेंटिस का स्पैनिश उपन्यास “डॉन क्विक्सोट” (1605), अलेक्जेंड्रे डुमास के “द थ्री मस्किटियर्स” (1844), मार्क ट्वेन के “एडवेंचर्स ऑफ टॉम सायर और हकलबेरी फिन” (1884), में निहित प्रत्यक्ष संदर्भों का साहित्यिक समुदाय पर बड़ा प्रभाव पड़ा।
पद्य-गद्य की पृथक प्रकृति और इतिहास का इतिहास रहा है। ग्रीक महाकाव्यों के महान लेखक होमर द्वारा लिखित इलियड और ओडिसी, भारतीय संस्कृति के वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत पद्य में लिखित ग्रंथ हैं। हिंदी गद्य का विकास अठारहवीं सदी से शुरू होता है। गद्य लिखना कठिन होता है।
भारतेंदु को गद्य के विकास का आरंभिक लेखक माना जाता है। उन्होंने उपन्यास नहीं लिखा। भारतेंदु हिंदी गद्य की शुरुआत के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने आजकल के शुद्धतावादियों की तरह उर्दू और अंग्रेज़ी शब्दों से परहेज़ नहीं किया। वे जानते थे कि एक नई भाषा का गद्य दूसरी भाषाओं के सहारे से आगे बढ़ता है। जैसे अंग्रेज़ी में अन्य भाषाओं लेटिन, ग्रीक, रोमन, फ़्रेंच संस्कृत के अनगिनत शब्द समाहित हो गए हैं। भारतेंदु युग में ऐतिहासिक दृष्टि से लाला श्रीनिवास दास का ‘परीक्षा-गुरु’ (1882 ई.) हिन्दी का पहला उपन्यास माना जाता है।
बंकिम चंद्र बंगाली के, देवकी नंदन खत्री आरम्भिक उपन्यासकार और प्रेमचंद हिंदी के उपन्यास सम्राट माने जाते हैं। ये तीनों अंग्रेज़ी भाषा के अच्छे जानकार थे। उन्होंने अंग्रेज़ी साहित्य से गद्य लिखना सीखा। उसके बाद मातृ भाषा में लेखन शुरू किया था।
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित दुर्गेशनंदिनी के साथ अपनी यात्रा शुरू की थी। रवींद्रनाथ टैगोर, माणिक बंदोपाध्याय, ताराशंकर बंदोपाध्याय और शरत चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा गद्य का ‘नया’ प्रयोग उनके कार्यों के माध्यम से ‘परिपक्व’ में बदल गया। लगभग ये सभी साहित्यिक गतिविधियाँ कोलकाता में जोरों पर चल रही थीं।
देवकीनन्दन खत्री ने ‘चन्द्रकांता’, ‘चन्द्रकांता-संतति’ तथा ‘भूतनाथ’ नामक तिलस्म और ऐयारी के रोचक उपन्यास कई भागों में प्रकाशित किए। लोगों ने उनके उपन्यास पढ़ने के लिए हिंदी लिखना-पढ़ना शुरू किया था।
हिंदी में आधुनिक सामाजिक उपन्यासों का सूत्रपात प्रेमचंद (1880-1936) से हुआ। उन्होंने ऐनातोले फ़्रैंक के थायस (Thayas) उपन्यास का अहंकार नाम से अनुवाद किया था जो भोग-अध्यात्म द्वन्द पर सर्वोत्तम कृति मानी जाती है। उन्होंने जस्टिस (Justice) नाटक का न्याय नाम से अनुवाद किया। इस तरह वे उपन्यास विद्या से परिचित हुए।
प्रेमचंद पहले उर्दू में लिखते थे, बाद में हिंदी की ओर मुड़े। “सेवासदन’, “रंगभूमि’, “कायाकल्प’, “गबन’, “निर्मला’, “गोदान’, आदि प्रसिद्ध उपन्यास हैं, जिनमें ग्रामीण वातावरण का उत्तम चित्रण है। चरित्रचित्रण में प्रेमचंद गांधी जी के “हृदयपरिवर्तन’ के सिद्धांत को मानते थे। बाद में उनका रुझान समाजवाद की ओर भी हुआ, ऐसा जान पड़ता है। कुल मिलाकर उनके उपन्यास हिंदी में आधुनिक सामाजिक सुधारवादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे उपन्यास सम्राट कहलाते हैं।
प्रेमचंद उत्तरोत्तर युग के प्रमुख उपन्यासकार जयशंकर प्रसाद, भगवतीचरण वर्मा, अमृतलाल नागर, जैनेंद्रकुमार, वात्स्यायन “अज्ञेय’, इलाचंद्र जोशी, हजारीप्रसाद द्विवेदी, वृंदावनलाल वर्मा थे।
जयशंकर प्रसाद के “कंकाल’ और “तितली’, भगवतीचरण वर्मा के ‘चित्रलेखा’ “टेढ़े मेढ़े रास्ते’ और “भूले बिसरे चित्र’ प्रसिद्ध हैं। उपेन्द्रनाथ अश्क की “गिरती दीवारें’ का भी इस समाज की बुराइयों के चित्रांकन में महत्वपूर्ण स्थान है। अमृतलाल नागर की “बूँद और समुद्र”, “मानस का हँस”, “खंजन नय”’, नाच्यो बहुत गोपाल, यथार्थवादी शैली में आगे बढ़कर श्रेष्ठ आंचलिक उपन्यास हैं।
जैनेंद्रकुमार के मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि वाले “परख’, “सुनीता’, “कल्याणी’ आदि से भी अधिक उनके “त्यागपत्र’ ने हिंदी में बड़ा महत्वपूर्ण योगदान दिया। वात्स्यायन “अज्ञेय’ ने अपने मनोविश्लेषण में “शेखर : एक जीवनी’, “नदी के द्वीप’, “अपने अपने अजनबी’ में उत्तरोत्तर गहराई और सूक्ष्मता दिखाई। इस शैली में लिखनेवाली बहुत कम मिलते हैं। इलाचंद्र जोशी के “संन्यासी’, “प्रेत और छाया’, “जहाज का पंछी’ आदि में सामाजिक विकृतियों पर अच्छा प्रकाश डाला गया है। इस शैली के उपन्यासकारों में धर्मवीर भारती का “सूरज का सातवाँ घोड़ा’ और नरेश मेहता का “वह पथबंधु था’ उत्तम उपलब्धियाँ हैं।
ऐतिहासिक उपन्यासों में हजारीप्रसाद द्विवेदी का “बाणभट्ट की आत्मकथा’ एक बहुत मनोरंजक कथाप्रयोग है जिसमें प्राचीन काल के भारत को मूर्त किया गया है। वृंदावनलाल वर्मा के “महारानी लक्ष्मी बाई’, “मृगनयनी’ आदि में ऐतिहासिकता तो बहुत है, रोचकता भी है, परंतु काव्यात्मकता द्विवेदी जी जैसी नहीं है। राहुल सांकृत्यायन (1895-1963), रांगेय राघव (1922-1963) आदि ने भी कुछ संस्मरणीय ऐतिहासिक उपन्यास दिए हैं।
उपन्यास अपने जन्म से स्वतंत्रता की संतान है। इसलिए वह इतिहास में दबी चीखों, हँसने और रोने को भी दर्ज करता है जो अनसुना रह जाते हैं। जिस दौर में इतिहास एक आतंक के रूप में उपस्थित किया जा रहा है और फिल्म से लेकर उपन्यास तक इतिहास खेलने की वस्तु है, ऐसे समय में सामाजिक स्मृति के समानांतर निजी स्मृति को इतिहास की आवाज बनाना अर्थपूर्ण माना जा सकता है। उपन्यासकार को स्मरण रखना होगा कि भारत वह धरती है जहां कहीं भी कुदाल चलाओ, उसकी नोक एक मूर्ति से टकराती है। कुदाल की नौक कई मूर्तियों को गढ़ रही और कई मूर्तियों को ध्वस्त कर रही है।
नेपाल में भारत से अधिक महंगाई है। रात्रि को भोजन की इच्छा नहीं थी। इसलिए ब्रेड सेवन का निश्चय किया। भारत में ब्रेड पच्चीस रुपए की मिलती है जो काठमांडू में पचास रुपए की मिली। यदि विनिमय दर से समायोजित करें तो 100 भारतीय रुपए 160 नेपाली मुद्रा के बराबर होते हैं। उस हिसाब से 25 रुपए की ब्रेड 40 नेपाली रुपयों में मिलनी चाहिए जबकि वह 50 रुपयों में अर्थात् भारतीय तुलना में 25% महँगी मिली। मारुति की जो कार भारत में चार लाख में मिलती है वह नेपाल में बारह से चौदह लाख में मिलती है। नेपाल में बचत दर बहुत कम है इसलिए विनियोग नहीं होने से उत्पादन भी कम होता है। यह देश अधिकांश चीजों के लिए भारत और चीन पर निर्भर है। इसके पास स्वतंत्र अर्थनीति नहीं है। भारत और चीन की अर्थनीतियों का सीधा प्रभाव नेपाल पर पड़ता है। चीन यहाँ एक बहुत बदा दांव लगा रहा है। वह ल्हासा (तिब्बत) से काठमांडू रेललाईन डालने की जुगत में है। यदि वह कामयाब हो गया तो वह दिन दूर नहीं जब नेपाल चीन का आर्थिक उपनिवेश बन जाएगा। उसकी भारत पर निर्भरता समाप्त हो जाएगी। चीन तिब्बत में यही दाव चल चुका है। दुनिया में सर्वाधिक लम्बी सीमा चीन की भारत से साझा होगी। फिर उसका दाव सिक्किम और भूटान के बीच चिकन नेक से होकर बंगला देश पहुँचना होगा। वह पाकिस्तान से मिलकर ग्वादर बंदरगाह से अरब सागर पहुँच चुका है। इस तरह दोनों तरफ़ से भारत को घेर लेगा। यह चीन का एक मिशन है।
क्रमशः…
© श्री सुरेश पटवा
भोपाल, मध्य प्रदेश
*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






