श्री राकेश कुमार
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १५० ☆ देश-परदेश – International Coffee Day ☆ श्री राकेश कुमार ☆
(1st October)
अंग्रेजों ने हमारे देश की चाय को हमें ही पीना सिखाया था। काफ़ी भी पश्चिम की देन मानी जा सकती है। हमारे देश में तो खालिस याने कि शुद्ध दूध पीने का रिवाज़ हुआ करता था। अब हम लोग उसी दूध की दिन भर चाय या काफी पीते रहते हैं। दूध से होने वाले सारे लाभ, चाय और काफी के उपयोग से गवां देते हैं।
एक जमाना था, जब अंग्रेजों का राज आधी दुनिया पर हुआ करता था, उन्होंने कमाई के चक्कर में हमारे देश की चाय को खूब बेचा था। अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम में चाय के बहिष्कार को आजादी का हथियार बनाया गया था। चाय के बदले काफ़ी के उपयोग को प्रोत्साहित किया गया। इसलिए अमेरिका में आज भी काफी का ही चलन है।
हमारे देश के दक्षिण भाग में भी काफी का चलन बहुत अधिक है। देश के उत्तरी और पश्चिम भाग में काफी के प्रसार में “इंडियन काफी हाउस” नामक चेन ने बहुत बड़ा रोल निभाया था।
कुछ दशकों तक काफी अमीरों के यहां पी जाती थी, मध्यम वर्ग में भी धीरे धीरे खास मेहमानों के लिए काफी परोसे जाने लगी है।
हमारे कुछ मित्र भी जब कभी घर आते है, तो कहते है, हम चाय नहीं पीते, काफी पिलवा दो। इसके विपरीत हम जब उनके घर जाते है, तो चाय परोस देते है, ये कहते हुए तुम तो चाय ही पीते हो, और खुद भी हमारे नाम से चाय ही पीते हैं।
पश्चिम ने काफ़ी को केक, चाकलेट, आइसक्रीम के माध्यम से भी हमारी जुबां के जायके को बदलने की भी साजिश की गई थी। जिंदगी भर चाय पीने वाली महिलाएं भी दुकान पर “काफी कलर” की साड़ी की मांग करती हुई मिल जाएंगी। गर्मी में काफी से तोबा करने वालों के लिए “आइस कॉफ़ी” लोकप्रिय की गई है। जबकि ठंडी या कड़वी चाय का मतलब हमारे देश के युवा अच्छे से जानते हैं।
सिनेमा घर और रेलवे स्टेशन पर एस्प्रेसो काफी की मशीनें लगाई गई थी। शादियों में केसर बादाम वाले दूध के स्थान पर काफी परोसी जाने लगी है। काफी की कड़वाहट कम करने के लिए चाकलेट/ कोको पावडर छिड़ककर स्वादिष्ट बनाया जाता था।
आज काफी की काफ़ी चर्चा हो गई है, अब मेहनत करके घर पर देसी एस्प्रेसो यानी काफी को चम्मच से रगड़ कर पिया जाएगा।
© श्री राकेश कुमार
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