श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “महालक्ष्मी”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४४ ☆
🌻लघु कथा🌻 🛕महालक्ष्मी 🛕
पेशे से इंजीनियर राहुल, पर सारा गुणांक उसकी पत्नी करती थी। आज माँ फिर से दिपावली पर पूरे घर की साफ सफाई कर घर की लक्ष्मी (बहु) आने का इंतजार कर रही थी।
छोटा बेटा अपनी माँ का पूरा ध्यान रखता, पर हाय रे विदेश में रहने वाले बेटा बहु!!
पेंशन में जितना मिलता घर का खर्च चलता। माँ ने खुश होकर साड़ी सुहाग का समान बहु के आने पर उपहार स्वरूप देने लगी।
अरे मम्मी जी – – माना कि आपके पास नही है। पर दे ही रही तो चाँदी के सिक्के देती तो कुछ काम आता।
ये मेरे किस काम के – – सामने खड़ी घर में काम करती बाई को देते फोन पर काल करने लगी।
छोटा बेटा दिये लगा रहा था। मुझे तो महालक्ष्मी ही सर्वोपरि है। बेटे के सिर पर हाथ फेरती माँ बोल उठी मुझे भी दीपक का उजाला आज दिखाई दिया है।
दोनों एक दूसरे की बात समझ। पूजन की तैयारी करने लगे।
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© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






