श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना अक्षय दान पुण्य का पर्व: आँवला नवमी। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २६३ ☆ अक्षय दान पुण्य का पर्व: आँवला नवमी

*

कीजे सदा कुछ पुण्य ऐसे,जो हमें अक्षय करें।

डोरी थामें प्रीत संग तो, धर्म पालन से रहें। ।

पूजा करते दोनों हाथों, दान देते आँवला।

राधा रानी सारी सखियाँ,ढूंढ़ती प्रिय साँवला। ।

*

पर्यावरण की रक्षा का संकल्प सनातन संस्कृति का मूल मंत्र है। वसुधैव कुटुम्बकम की भावना को समेटे हुए आँवला नवमी जो कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन विष्णु भगवान के स्वरूप कृष्ण जी  की पूजा अर्चना करके आँवले का दान किया जाता है। क्योंकि इस दिन का पुण्य अक्षय  (कभी नहीं नष्ट होने वाला) माना जाता है, इसलिए इसे अक्षय नवमी भी कहते हैं।

महिलाएँ और पुरुष इस दिन आँवला वृक्ष की पूजा करते हैं, व्रत रखते हैं और दान-पुण्य करते हैं।

मान्यता है कि इस दिन आँवला वृक्ष पूजन करने से दीर्घायु, स्वास्थ्य और समृद्धि मिलती है।

आइए सपरिवार इस दिन वनभोज करें, अपने संग संस्कृति और संस्कारों को जोड़ना हम सबका दायित्व है।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments