श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “हस्तरेखा”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४९ ☆
🌻लघु कथा🌻 🤲हस्तरेखा 🤲
सदियों से चली आ रही ज्योतिष विद्या, हस्त रेखा, टोना – टोटका, उपाय कोई मानता कोई नहीं मानता।
परन्तु जहाँ पर काम बन जाए सभी एक साथ।
एक हस्त रेखा वाले बाबा की दुकान चल पड़ी। 20-25 लोग सदैव लाईन पर खड़े ही मिलते।
अपना हुलिया इस कदर बना रखें थे कि सच में देखने वाला मोहित हो जाता था। हर बात सच्ची जान पड़ती थी।
अचानक एक हाथ आगे बढ़ा। बाबा जी ने देखा—तुम्हारी हस्त रेखा कह रही है तुम्हें किसी का मालिकाना मिलेगा। बिना कमाए ही सब मिलेगा।
जब तक कुछ और कहते उनको एक पर्ची दिखने लगी लिखा था – – चुपचाप स्वागत करके अपनी जगह मुझे बिठा दो। वरना – – हस्त रेखा मुझे भी बनाना आता है। पीछे की पंक्ति में माँ खड़ी है।
बिजलियाँ कौंध गई। अपनी गर्भवती स्त्री को मारते मारते अधमरा छोड़ बाबा बनने का ढोंग अब समाप्त होता दिखने लगा। मेरी हस्त रेखा में ढूँढ निकालने का योग बना हुआ है।
बाबा जी दोनों हाथ मलते नजर आने लगे।
☆
© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





