आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपके दोहा सलिला

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 10 ☆ 

☆ दोहा सलिला ☆ 

कर अव्यक्त को व्यक्त हम, रचते नव ‘साहित्य’

भगवद-मूल्यों का भजन, बने भाव-आदित्य

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मन से मन सेतु बन, ‘भाषा’ गहती भाव

कहे कहानी ज़िंदगी, रचकर नये रचाव

.

भाव-सुमन शत गूँथते, पात्र शब्द कर डोर

पाठक पढ़-सुन रो-हँसे, मन में भाव अँजोर

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किस सा कौन कहाँ-कहाँ, ‘किस्सा’-किस्सागोई

कहती-सुनती पीढ़ियाँ, फसल मूल्य की बोई

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कहने-सुनने योग्य ही, कहे ‘कहानी’ बात

गुनने लायक कुछ कहीं, कह होती विख्यात

.

कथ्य प्रधान ‘कथा’ कहें, ज्ञानी-पंडित नित्य

किन्तु आचरण में नहीं, दीखते हैं सदकृत्य

 

व्यथा-कथाओं ने किया, निश-दिन ही आगाह

सावधान रहना ‘सलिल’, मत हो लापरवाह

 

‘गल्प’ गप्प मन को रुचे, प्रचुर कल्पना रम्य

मन-रंजन कर सफल हो, मन से मन तक गम्य

 

जब हो देना-पावना, नातों की सौगात

ताने-बाने तब बनें, मानव के ज़ज़्बात

 

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

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