आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – ग़ज़लिका।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २७१ ☆
☆ ग़ज़लिका ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
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जमाना जान गया पर मुझे पता ही नहीं
हुआ है इश्क़ अगर तो हुई ख़ता भी नहीं
.
अदाएँ देख अगर दिल हुआ दिवाना तो
जुनूने-इश्क से डरना कोई वजह तो नहीं
.
किया नहीं था, हुआ जो वो हो गया खुद ही
पता नहीं कि किया इश्क़ या किया ही नहीं
.
जिधर भी देखता तस्वीर एक ही दिखती
नहीं बाहर है कहीं दिल में वो बसा तो नहीं
.
नहीं वजूद रहा उससे अब अलग जब से
कहूँ कैसे कि कुछ हुआ तो पर हुआ ही नहीं
.
नदी की धार है वो घाट हूँ मैं ठहरा सा
जुदा होकर भी कभी मैं हुआ जुदा ही नहीं
.
कहो मत नाखुदा किस्सा-ए-इश्क को लोगों!
करे सजदा ‘सलिल’ उसको जो है खुदा भी नहीं
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© आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
१४-३-२०२६
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