श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “अर्थतंत्र की रीढ़ को। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१४ – अर्थतंत्र की रीढ़ को… ☆

राजनीति में लग गया, नेताओं को रोग।

अर्थतंत्र की रीढ़ को, तोड़ रहे ये लोग।।

*

ऋण देकर उपकृत करें, बाँट रहें खैरात।

फिर उसको माफी करें, यह कैसी सौगात।।

*

जनता देती टैक्स है, सुविधाओं की आस।

सत्ताधारी कर रहे, उनको सदा निरास।।

*

बाढ़ अकाल आगजनी,तोड़ फोड़ के नाम।

करें सुरक्षा कुछ नहीं, भुगतें सब अंजाम।।

*

जात धर्म के नाम पर, तुष्टिकरण का रोग।

इनके अंदर है भरा, भंडारे का भोग।।

*

दान वीर ऐसे बने, जैसे मिली हो छूट।

अपने वोट सहेजने, कोषालय की लूट।।

*

अपराधों को रोकने, असफल हैं ये लोग।

क्षतिपूर्ति के नाम पर, पाल रखा है रोग।।

*

अर्थतंत्र कमजोर कर, हर्षित होते आज।

पैर कुल्हाड़ी मारते, सबके सिर पर गाज।।

*

अर्थ तंत्र है देश की, वह मजबूत गठान।

इससे ही बढ़ती सदा, हर मुल्कों की शान।।

*

नैतिकता पर जोर दें, तजें अनैतिक राह।

चारित्रिक पथ पर चलें, चहुँ दिश होती वाह।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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