श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी  भावप्रवण कविता मानवता अब हार रही है आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९६ ☆

कविता – मानवता अब हार रही है☆ श्री संतोष नेमा ☆

मानवता अब  हार  रही  है  |

होकर द्रवित  पुकार रही है  ||

बेटा करता कत्ल  बाप  का |

जाने   कैसी   रार   रही   है ||

कैसे  बदला वक्त आज का |

रिश्ते सभी  बिसार रही  है ||

*

खूब बँटे हम  जाति धर्म  पर |

रखा न बिल्कुल ध्यान कर्म पर ||

रखा ताक  पर मानवता  को |

दिखें  न कितने दाग मर्म पर ||

भेद-भाव   दीवार  रही   है |

मानवता  अब  हार   रही  है

*

हथियारों  की   जंग  देख  लो |

बारूदों   के    रंग   देख   लो ||

रखें  अहम  को   सबसे  आगे |

अब   देशों  के  ढंग   देख  लो ||

झूठी शान अकड़ वालों को|

अब दुनिया धिक्कार  रही है  ||

मानवता   अब  हार   रही   है  |

*

चौराहों   पर   खड़े    दुशासन |

भूखे   दानव   नोच   रहे   तन ||

बदली चाल समय  की देखो |

अब   नारी  के  टूट   रहे   मन ||

कब   आयेंगे   कृष्ण   कन्हैया |

अबला   क्यों  लाचार  रही  है ||

मानवता   अब  हार   रही   है  |

*

भय परमाणु  सामरिकता   का |

बढ़ती नित्य पाशविकता  का ||

मची   होड़   है   हथियारों  की |

काम  नहीं अब नैतिकता   का ||

अब  ‘संतोष’  शांति की  खातिर |

सबकी   यही   पुकार   रही   है |

मानवता   अब   हार   रही    है  |

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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