श्रीमती शशि सराफ
(श्रीमती शशिसुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘गोपी संग रास रंग…‘।)
☆ शशि साहित्य # १७ ☆
कविता – नया प्रयास… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ
क्यूं उच्छवास में उदासी है ?,
मलाल है, कि पच्चीस भी निकल गया..
समय ही तो वह चक्र है,
जिसका हर पल बदल गया..
बीते कल पर डालो नजर,
कितने खजाने झोली में भर गया..
नए से रिश्ते, नयी दोस्तियां,
नई पहचान, नए सपने और,
नए अनुभव दे, परिपक्व कर गया..
कदमों तले तुम्हारे, ठोस आधार बन,
उन्नति के नए सोपान रच गया..
बिखेरे थे, जो धरती के गोद में,
उन बीजों का उत्सर्जन हो गया..
जितना बन सके, भला करते चलो,
धर्म से सुगम मार्ग, प्रशस्त हो गया..
बंदिशों की बेड़ी डालो, दुर्गुणों पर..
कह सको.. छब्बीस नई उपलब्धियां दे गया..
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© श्रीमती शशि सराफ
जबलपुर, मध्यप्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





