स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘उजास ही उजास‘ की एक भावप्रवण कविता – अब तो जागो…।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७८ – अब तो जागो…१
(काव्य संग्रह – ‘उजास ही उजास’ से )
बड़े बाप के बिगड़ैल बेटे की तरह
बेवजह गुस्सा होता हुआ
तेजी से निकल गया – वर्ष।
और
एक जोरदार धक्के से गिरा दिया
उस बूढ़े बरगद को
जो हमारी छाया था, घर था, ईश्वर था।
उसने ही हमें रचा था
उसके सिवा हमारे पास
कुछ भी नहीं बचा था ।
हम पंछी नहीं थे
कि उड़ जाते
बस रोने लगे।
हमें याद आने लगे वे पल
जब हम
धूप के कोड़ों से हो जाते थे विकल
और छुप जाते थे बरगद की छाँह में
वह हमें लेकर बाँह में
झूला झुलाता था,
गाता था-
‘कादर मन कहुँ एक अधारा
दैव दैव आलसी पुकारा‘।
उसने ही सौंपे थे
खेत और खलिहान
उसने ही सौंपी थी- गंधवती लताएँ
और बताएँ ?
क्रमशः १
© डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




