श्री राकेश कुमार
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १७२ ☆ देश-परदेश – एक अच्छी आदत ☆ श्री राकेश कुमार ☆
आज उपरोक्त ख़बर दैनिक समाचार पत्र में पढ़ी तो बड़ा सुकून मिला। जबसे होश संभाला है, जीवन में जब भी कोई मिला, हर व्यक्ति ये ही कहता रहा, “तुम कुछ भी नहीं करते हो”।
आज इस खबर से बड़ी राहत मिली। बचपन में पाठशाला के शिक्षक, परिजन आदि सभी ये ही कहते थे, कब तुम कुछ करोगे? अब बड़े हो रहे हो, कब कुछ करोगे ?
महाविद्यालय के गुरुजन भी ये ही तोहमत दिया करते थे। जीवन में क्या करोगे? आदि आदि। विवाहोपरांत भी पत्नी ये ही कहती आ रही हैं, तुम तो निठल्ले हो, दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है।
कार्यालय के साथी भी वरिष्ठ अधिकारी से कह देते थे, हमारे पास तो कोई काम है, ही नहीं, इसी चक्कर में सभी सीटों का पेंडिंग कार्य हमें ही करना पड़ता था। ठप्पा जो लगा हुआ था, कि हमारे सीट पर कुछ भी काम नहीं है।
बच्चे, अब बड़े हो गए हैं, वो भी मीठे शब्दों में ऐसा ही कुछ कह देते हैं। जो करना है, जल्दी करना आरंभ कर देवें। जीवन में एक्टिव रहना चाहिए।
मित्र मंडली भी खुले आम, भरी महफिलों में हमारी फुरसतिया आदत का मखौल उड़ाते रहते हैं।
अब सब का मुंह बंद हो जायेगा, जब उनको मालूम चलेगा हम वर्षों से कुछ नहीं कर, दिमाग को ब्रेक दिए हुए हैं। अब जब भी ब्रेक समाप्त होगा, हम बहुत कुछ कर सकने लायक बन जाएंगे। बस दिल साथ नहीं दे रहा, वो कमबख्त तो ये चाहता है, हम कभी भी कुछ ना करें।
हद, तो तब हो जाती है, दिल के निकट वाले दोस्त इस लेख को पढ़ कर ये कह देते हैं, उसके पास कोई काम नहीं है, बस मोबाइल में कुछ भी लिख कर सांझा कर देता है।
© श्री राकेश कुमार
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