श्री राकेश कुमार
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १७६ ☆ देश-परदेश – माँ के नाम का बाज़ार सज चुका है ☆ श्री राकेश कुमार ☆
पिछले कुछ दिनों से चारों दिशाओं में “मदर्स डे” (मातृ दिवस) की चर्चा हो रही हैं। विगत एक दशक से मदर्स डे शब्द सुनना आरंभ किया है।
बचपन से बुढ़ापे की दहलीज तक का जीवन तो बिना मदर्स डे मनाए ही व्यतीत हो गया था। अब जीवन की अंतिम पायदान पर ये सब देखने/ सुनने को मिल रहा है।
बाज़ार सज चुके है, पश्चिम में खुशियां मानने का आरंभ कार्ड भेज का शुभकामनाएं प्रेषित करने से होता हैं। नाना प्रकार के उपहार मां के लिए उपलब्ध कराए जाते हैं। ऑनलाइन व्यापार के चतुर खिलाड़ी भी इस रेस में अग्रणी रहते है।
“कुछ मीठा हो जाए” के नाम से ज़हर परोसने वाले भी सक्रिय हो जाते हैं। बाज़ार को भुनाने में सबसे आगे रहते है। आज भुने हुए चने की दुकान मुश्किल से मिलती है, लेकिन चॉकलेट/ केक हर दुकान पर मिल जाता है। किसी भी दिन, कभी भी, कुछ भी हो केक काट कर खुशियां मनाया जाना अब हमारे समाज में भी एक रिवाज़ बन चुका है।
हमारी संस्कृति जहां मां अपने पूरे जीवन में बच्चों को सभी तरह की खुशियां ही नहीं देती वरन उनके सब कष्ट/दुःख का निवारण भी करती है। उसको वर्ष में एक दिन का सम्मान देना कदापि न्यायोचित नहीं हो सकता है।
प्रतिदिन प्रातः काल मां के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेने की हमारी परंपरा अब विलुप्तता की कगार पर है। एक दिन मां को भगवान बना देने से मातृत्व ऋण कभी भी चुकाया नहीं जा सकता हैं। इसलिए अपनी संस्कृति का अनुपालन कर जब मौका मिले मां से आशीर्वाद प्राप्त करते रहें।
© श्री राकेश कुमार
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