श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सजल – रिश्तों की डोरी फिर टूटी….”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # २३१ ☆
☆ रिश्तों की डोरी फिर टूटी… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆
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रिश्तों की डोरी फिर टूटी।
समझो अपनी किस्मत फूटी।।
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सामाजिक प्राणी है मानव।
अपने परिवारों की खूटी।।
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नेताओं की बात न पूछो।
धन दौलत जमकर है लूटी।।
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दर्द विनाशक हैं सदियों से।
आयुर्वेद की जड़ी-बूटी।।
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मानव रहा अकेले घर में।
आँगन कौदों-कुटकी कूटी।।
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प्लेटफार्म पर मैं भी पहुँचा।
देख रहा था गाड़ी छूटी।।
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© मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
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