श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सजल – रिश्तों की डोरी फिर टूटी….। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २३१ ☆

☆  रिश्तों की डोरी फिर टूटी…  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

रिश्तों की डोरी फिर टूटी।

समझो अपनी किस्मत फूटी।।

*

सामाजिक प्राणी है मानव।

अपने परिवारों की खूटी।।

*

नेताओं की बात न पूछो।

धन दौलत जमकर है लूटी।।

*

दर्द विनाशक हैं सदियों से।

आयुर्वेद की जड़ी-बूटी।।

*

मानव रहा अकेले घर में।

आँगन कौदों-कुटकी कूटी।।

*

प्लेटफार्म पर मैं भी पहुँचा।

देख रहा था गाड़ी छूटी।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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