श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२६ ☆

?  व्यंग्य – गुरु गुड़, चेला शक्कर  ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

कहावत पुरानी है, मगर शिक्षा की आवश्यकता की तरह सदा प्रासंगिक है, गुरु गुड़ रह गया, चेला शक्कर हो गया।

पहले गुरु के चरण छूकर ज्ञान मिलता था। अब गुरु के पास पहुंचने से पहले विद्यार्थी उसका सोशल मीडिया प्रोफाइल छानता है। गुरु की योग्यता क्या है, यह बाद की बात है, फॉलोअर कितने हैं,रेटिंग क्या है यह पहले देखा जाता है।

कभी शिक्षक ज्ञान का स्रोत था। आज ज्ञान हर जेब में है,गूगल , ए आई और मोबाइल के रूप में।

आज का परिष्कृत मंत्र है,गूगल , मोबाइल दोनों खड़े काके लागूं पाँव, बलिहारी मोबाइल आपकी जिन गूगल दियो बताये ।

शिक्षक कहता है, “बच्चों, ध्यान से सुनो।” बच्चा मोबाइल खोलकर कहता है, “सर, यह तो गूगल पर कुछ और लिखा है।”इसी से परेशान एक

डाक्टर साहब ने क्लीनिक के बाहर बोर्ड लगवा रखा है, गूगल का ज्ञान और जूते बाहर ही रखें।

गुरु समझाने लगता है, चेला स्क्रीन पर अंगुली घुमाकर समझा देता है।

गुरु ने जीवन भर पढ़कर ज्ञान पाया, चेले ने पाँच मिनट में ज्ञान डाउनलोड कर लिया है।

शिक्षक दिवस पर अचानक गुरु का महत्व बढ़ जाता है। स्कूल में फूल आते हैं, कार्ड आते हैं, भाषण होते हैं। विद्यार्थी कहते हैं, “सर, आप हमारे जीवन के आदर्श हैं।”गुरु भावुक हो जाता है।

अगले ही दिन वही आदर्श , ऑनलाइन शिकायत पोर्टल पर बच्चों के शोषण के रूप में दर्ज किया जाता है।

5 सितम्बर को गुरु भगवान होता है, 6 सितम्बर को ‘फीडबैक’ का विषय बन जाता है।

यूं यदि शिक्षक दिवस की परम्परा नई सरकार के समय शुरू होती तो डा सर्व पल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन की जगह उसके संदर्भ गुरु वशिष्ठ या गुरु सानदीपनि के समय से जोड़ निकाले जाते ।

हमारे जमाने में सोंटी वाले मास्साब होते थे , अद्धा , पौना का पहाड़ा होता था, अब तो बच्चों की शिक्षा को आसान बनाने के लिए इतने नियम बना दिए गए हैं, कि  शिक्षक को शाला जाने से पहले नियम पढ़ने पड़ते हैं।

कभी शिक्षक पूछता था, “होमवर्क क्यों नहीं किया?”

विद्यार्थी बहाना बनाता था।

आज विद्यार्थी कहता है, “सर, होमवर्क तो एआई ने किया है, बस कोई यह मत पूछिए कि मैंने समझा भी है या नहीं।”

अब कक्षा में गुरु और एआई आमने-सामने हैं। गुरु के पास अनुभव है, एआई के पास उत्तर।

गुरु कहता है, “मैंने तीस साल पढ़ाया है।”

एआई कहता है, “मैंने तीस करोड़ दस्तावेज पढ़े हैं।”

गुरु चुप है।

अनुभव का मुकाबला आँकड़ों से हो जाए तो गुरु भी अपडेट माँगता है।

पहले विद्यार्थी गुरु से पूछता था, “सर, यह कैसे होगा?”

अब गुरु विद्यार्थी से पूछता है, “बेटा, यह ऐप कैसे चलेगा?”

चेला मुस्कुराता है।

गुरु ने शिष्य को ज्ञान दिया था, शिष्य गुरु को पासवर्ड दे रहा  है।

शिक्षा का बाजार भी बदल गया है। कभी स्कूल में फीस देकर पढ़ाई होती थी। अब फीस देखकर लगता है कि बच्चा पढ़ने नहीं, किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में निवेश करने जा रहा है। विदेशों में हालत ये देखने मिल रही है कि कई माता पिता बच्चे को घर में पढ़ाना पसंद करते हैं। दूसरा बच्चा इसलिए नहीं करते कि पढ़ाई का खर्च कैसे करेंगे।

स्कूल की इमारत चमक रही है, वेबसाइट चमक रही है, यूनिफॉर्म चमक रही है, विज्ञापन चमक रहा है।बस  शिक्षा गुमशुदा  है। परीक्षा , पेपर लीक चर्चा में हैं, वास्तविक ज्ञान , नैतिकता और व्यक्तित्व का विकास , लापता है।

शिक्षा मिशन नहीं व्यवसाय बन गई है। भव्य स्कूल बिल्डिंग , एसी क्लास रूम, सीसी टीवी , लक्जरी बस ने शिक्षा को ऊँचा किया है, इतना कि वह आम लोगों की पहुंच से ऊपर जा रही दिखती है। व्यवस्था ने स्कूल को धंधा बना कर रसीद धारी पूंजीपति को मोटा किया है।

और शिक्षक?

वह आज भी वही है। कक्षा में खड़ा है। हाथ में चॉक हो या स्मार्ट बोर्ड की पेन, चिंता वही है।

बच्चा पढ़ेगा या नहीं?

माता-पिता संतुष्ट होंगे या नहीं?

परिणाम अच्छा आएगा या नहीं?

और सबसे बड़ी चिंता, कहीं किसी ने उसकी कक्षा का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर तो नहीं डाल दिया?

शिक्षक अब केवल शिक्षक नहीं है। उसे काउंसलर होना है, प्रशासक होना है, तकनीकी विशेषज्ञ होना है, मोटिवेशनल स्पीकर होना है और कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि उसे विद्यार्थी के माता-पिता की अपेक्षाओं का भी होमवर्क करना है।

 5 सितम्बर को मंच पर कहा जाएगा, “शिक्षक राष्ट्र निर्माता है।”

शिक्षक मुस्कुराएगा।

राष्ट्र निर्माण की जिम्मेदारी उसी की है।

इसलिए उसे जनगणना भी करना है, चुनाव भी करवाना है।

शिक्षक दिवस पर फूल दीजिए, भाषण दीजिए, सम्मान दीजिए, स्मृति-चिह्न दीजिए।

मगर सिर्फ एक दिन के लिए नहीं। वर्तमान स्थिति में गुरु गुड़ रह गया है, चेला शक्कर हो गया है।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

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