सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

(सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी  सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की  साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर  के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । हम आपकी रचनाओं को अपने पाठकों से साझा करते हुए अत्यंत गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में  एडिशनल डिविजनल रेलवे मैनेजर, पुणे हैं। आपका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है।आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  कविता “नदी ”।  यह कविता आपकी पुस्तक एक शमां हरदम जलती है  से उद्धृत है। )

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☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 41 ☆

☆ नदी  ☆

कभी नदी को देखा है तुमने

अपने रास्ते खुद खोजते हुए?

 

इस बार जब गुजरो उसके करीब से

तो ज़रा ध्यान से देखना

उसके पागलपन को

जो उसे रुकने नहीं देता

और वो पत्थरों को काटती,

पहाड़ों को भेदती,

जंगलों को लांघती,

बढती ही जाती है…

 

यदि नदी

किसी सहारे या साथ को खोजती रहे

तो कहाँ चल पाएगी वो?

 

सुनो,

कोई साथ दे दे

तो उसकी ऊँगली ज़रूर पकड़ना,

पर कभी अपना वजूद मत भूल जाना

और बढती रहना

नदी सी

सिर्फ अपनी रूह के भरोसे पर!

 

© नीलम सक्सेना चंद्रा

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2 Comments
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Shyam Khaparde
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अच्छी रचना

Shekhar Palkhe
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सहज सुंदर रचना!