आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  मुक्तिका )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 18 ☆ 

☆ मुक्तिका  ☆ 

 

सलिल बूँद मिल स्वाति से, बन जाती अनमोल

तृषा पपीहे की बुझे, जब टेरे बिन मोल

 

मन मुकुलित ममतामयी!, हो दो यह वरदान

सलिल न पंकिल हो तनिक, बहे मधुरता घोल

 

मनुज छोर की खोज में, भटक रहा दिन-रैन

कौन बताये है नहीं, छोर जगत है गोल

 

रहे शिष्य की छाँह से, शिक्षक हरदम दूर

गुरु कह गुरुघंटाल बन, परखें स्वारथ तोल

 

झूम बजाएँ नाचिए, किंतु न दीजै फाड़

अटल सत्य हर ढोल में, रही हमेशा पोल

 

सगा न कोई किसी का, सब मतलब के मीत

सरस सत्य हँस कह सलिल, अप्रिय सत्य मत बोल

 

अगर मधुरता अत्यधिक, तब रह सजग-सतर्क

छिप अमृत की आड़ में, गरल न करे किलोल

 

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

३-४-२०२०

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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Shyam Khaparde
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अच्छी रचना