श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ३० ☆

☆ आलेख ☆ ~ सतुआ पिसान के लबरी, चलो लइकवो ददरी ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

(बलिया का ददरी मेला हमारी सांस्कृतिक विरासत)

विशाल गंगा का पाट, एक तरफ उत्तर प्रदेश, दूसरी तरफ बिहार। इस बीच रेत पर बसा हुआ एक नगर सिर्फ आज ही नहीं बल्कि सैकड़ो वर्ष पुराने अतीत को अपने दामन में सजोये, अपनी पुरानी पहचान के साथ जस का तस खड़ा है।

महर्षि भृगु के शिष्य दर-दर मुनि के नाम से लगने वाले प्रख्यात कार्तिक पूर्णिमा से प्रारम्भ होने वाला ददरी मेला भारत में ही नहीं बल्कि विश्व मैं भी अपनी पहचान कायब रखा है। हमारे धर्म संस्कृति में कार्तिक पूर्णिमा को पवित्र में नदी और सरोवर में स्नान करने का विधान है। इसी क्रम में एक ऐतिहासिक स्नान महर्षि भृगु की नगरी बलिया में गंगा स्नान करने का बड़ा महत्व है।

यदि हम आज से तीन दशक पीछे जाए तो हमारे गांव संवरा की सड़कों पर मेले के लिए पैदल जाती हुई भीड़, जिसके भीतर श्रद्धा और आस्था कूट-कूट कर भरी होती थी, लगातार पूरी रात चलती थी। लोग सड़क के किनारे खड़े होकर पूरी रात, टैक्सी, बस का इंतजार करते थे। सब की इच्छा या होती थी कि कब गंगा जी के तीर पहुचें और गंगा जी में पवित्र डुबकी गं लगावें।

मुझे याद है, एक बार भईया ( सबसे बड़े भाई साहब -स्व. डॉ शमशेर सिंह, ) मुझे कार्तिक पूर्णिमा ददरी स्नान के लिए गाँव सायकिल से ले गये। वे साइकिल चला रहे थे। पीछे की सीट पर एक बढ़िया सा कपड़ा बांध दिए और उस पर मुझे बैठा दिया। मैं दोनों हाथ पकड़ कर उनके पीछे बैठकर बलिया पहुंचा था। मेरे गांव से बलिया करीब 26 किलोमीटर दूर और बलिया से कम से कम 3-4 किलोमीटर गंगा की थी। हम रात के 10:00 बजे घर से चले थे और लगभग 1:30 के आसपास सामने स्नान कर लिये था। गंगा स्नान करने का क्रेज इतना जबरदस्त था कि लोग कहां-कहां से दूर-दूर से पैदल, गाड़ी से बैलगाड़ियों से ट्रेन से, बस से स्नान करने बलिया आते थे।

मैंने अपने शुरू के पंक्ति में लिखा है ‘सतुवा पिसान के लबरी’ इसका मतलब भी आता है कि लोग इस यात्रा पर निकलते थे तो अपने साथ बलिया का खास रेडीमेड व्यंजन सतुआ अवश्य ही ले आते थे। यानी यदि कोई 15 -20 -25 किलोमीटर पैदल यात्रा करके गंगा स्नान करने जा रहा है, तो वह रास्ते में रुककर सतुवा घोल कर या सुतुआ को सानकर कर खा लेता था।

इस प्रकार अपनी इस आस्था यात्रा को पूरा करते हुए गंगा जी में डुबकी लगाकर वापस लौटता था। वापस लौटने के पहले प्रत्येक दर्शनार्थी या स्नानार्थी की इच्छा यह होती थी कि वह भारतीय भृगु के जरूर दर्शन करें। तत् पश्चात् बालेश्वर बाबा के दर्शन करें।

ये वही महर्षि बाबा है जिनके शिष्य दर-दर ऋषि के नाम पर ददरी मेला लगता है। ददरी मेला भारत के बड़े मेलों में से एक है। ऐसे बड़े मेलों में एक मेला बिहार के सोनपुर में लगता है। जिसे लोग हरिहरनाथ का मेला कहते हैं। लोगों मानता है कि बलिया मेला जब समाप्त होता है तो हरिहर क्षेत्र का सोनपुर का मेला शुरू हो जाता है। ये ही सारी दुकान वहां जाकर शिफ्ट हो जाती थी। इस मेले की विशेषता यह थी कि इस मेले में बड़ी-बड़ी दुकानों के अलावा पशुओं का बाजार विशेष रूप से हाथी घोड़ा भी बिकते हैं। न जाने अब हाथी दिखाते हैं या नहीं नहीं मैं बता सकता। पहले लोग हाथी पालने के शौकीन होते थे जो रइस जाते या समृद्ध परिवार के लोग होते थे उन्हें हाथी पालने का शौक था। वे अपने दरवाजे पर हाथी रखते थे। हाथी को शुभ मानते थे। लक्ष्मी का स्वरूप मानते थे। हाथी को खरीदने से ज्यादा हाथी को पालने का महत्व होता था। हर किसी कूबत नहीं होती थी कि वह हाथी पाल सके क्योंकि हाथी ऐसा जानवर है जिसको भरपूर चारा चाहिए। उसका पूरा-पूरा देख-रेख होना चाहिए। उसके ड्राइवर यानी महावत का पूरा खर्च देना होता है। यानी एक ऐसा वाहन जिसका आउटपुट जीरो हो लेकिन उसमें लागत बड़ी तगड़ी हो।

शायद अबके जमाने में कोई ऐसा वाहन को नहीं खरीदना चाहेगा। मेरे बड़ी बुआ के घर हाथी हुआ करता था उसे हाथी के लिए अलग से दो चार बीघा गन्ने बोए जाते थे। वह हाथी कभी-कभार मेरे गांव भी आता था और एक दिन नहीं हफ्तों रुक जाता था अब तो उसे तक उसके चेहरे की सारी व्यवस्था हम सबको करनी पड़ती थी। लेकिन एक शोहरत तो थी ही कि हमारे बुआ के पास हाथी है।

इस समय ददरी मेले हाथी बिक रहा है या नहीं बिक रहा है लेकिन नहीं कह सकता।

मेले में का ऐतिहासिक सांस्कृतिक स्वरूप जिसे लोग बहुत याद करते हैं वह स्वयं में विशिष्ट हुआ करता था। इसमें सांस्कृतिक कार्यक्रम साहित्यिक गोष्ठीयाँ एवं कवि सम्मेलन आदि भी होते थे, आज भी होते हैं। अपने ईंटर के हिंदी पुस्तक में “भारतवर्षोन्नति कैसे हो “शीर्षक से एक लेख हुआ करता था। यह लेख भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा 1884 में बलिया के ददरी मेले में दिए गये भाषण पर आधारित था। अब आप स्वयं समझ सकते हैं कि यह मेला कितना प्राचीन मेला रहा है। यदि आप बलिया के निवासी हैं तो आपको बलिया भृगुजी, ददरी मेला, रसड़ा की रामलीला, बलिया का महावीरी झंडा, बलिया बलिदान दिवस, आदि ऐतिहासिक तिथि एवं अवसरों का ज्ञान या जानकारी अवश्य होगी।

 फिर मैं ददरी मेंले की ओर लौटता हूं। इस ददरी मेले में जब महिलाएं गीत गाते हुए सड़कों पर निकलती थी तो हमारे पिताजी, उन महिलाओं का गया हुआ एक गीत गुनगुनाया करते थे, मैं उस गीत की कुछ पंक्तियों को आपके सामने प्रस्तुत करता हूं।

” योगवहूँ निशि वासर जोगजती,

जैसे रे सोनरा सोनवा के जोगवे ला,

घटे न पावे एको रत्ती,

योगवहूँ निशि वासर जोगजती,

जइसे रे पन्हेंरिया पनावा के जोगवेला,

सड़े न पावे एको पती,

योगव हूँ निशि वासर जोगजती,

वैसे हो रामजी सीता जी के जोगवे ले,

घटे न पावे मान मती

योगवहूँ निशि वासर जोगजती,

ऐसे अनेक भक्ति गीतों गाते हुए महिलाएं सिर पर गठरी रखे हुए मेले की तरफ निकलती थी और अपनी यात्रा को बड़े ही आनंद के भाव से पूरा करतीं थीं।

वैसे जो प्रसिद्ध गंगा स्नान के मेले लगते थे उनमें बलिया का ददरी मेला, बटेश्वर का मेला, गढ़मुक्तेश्वर का स्नान पर्व, रायबरेली में लगने वाला गंगा स्नान मेला, लखनऊ में गोमती के किनारे कतकी मेला। न जाने यह मेल अब कितने प्रभावी हैं और किस स्तर पर लग रहे हैं, नहीं कह सकता। लेकिन बलिया का ददरी मेला आज भी अपने धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को, सजोते हुए, अपनी पहचान बनाए हुए है

कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाले इस ददरी मेले की आपको हृदय से बधाई देता हूं।

भृगु बाबा की जय।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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