श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ३१ ☆
☆ लघुकथा ☆ ~ माँ – बेटी ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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वह चौराहे पर पहुंच चुका था। मां बेटी को एक साथ खड़ा देखकर उसने अपनी गाड़ी किनारे लगायी। वह मां बेटी के बीच के प्यार को पढ़ना चाह रहा था। बेटी को दुलारती पुचकारती मां, न जाने क्या सोच रही थी। वह बायें -दाएँ गर्दन घुमाते हुए आरत दृष्टि से कुछ देख रही थी। कभी-कभी वह वह अपने दोनों वाह्य कर्ण को अलग-अलग दिशाओं में घुमा आने वाले संभावित खतरे के आहट को जानने और उससे सतर्क रहने का प्रयास कर रही थी। उसकी मूकभाव भंगिमा और एकटक ताकती नजरे शायद आने जाने वालों से कुछ कहना चाह रही थी।
मां की गर्दन की ललरियों के नीचे बाल भाव में खड़ी बिटिया माँ के पास खड़ी होकर स्वयं को सुरक्षित महसूस कर रही थी। वह भी अपनी माँ की ही तरह रह रहकर वह अपनी पलके मुद लेती। उसकी माँ जिधऱ देखती वह भी उसी तरफ देखती। मानो वह अपनी माँ की नक़ल कर रही हो। यह सब न जाने उसका अत्यधिक खुशी का भाव था या किसी अंतरवेदना का प्रभाव। जो भी हो माँ – बेटी के प्रेम की मूक परिभाषा समझने के लिए लेखक के पास एक सुन्दर अवसर था।
एक बड़े वाहन के कर्कश आवाज में बजे हॉर्न ने उसको एक बार पुनः डरा दिया। अब माँ आगे दूसरी तरफ बढ़ गयी। बिटिया ने भी उसके पीछे पीछे जाने का निर्णय किया। यह उसका सामान्य एवं एक व्यावहारिक स्वभाव था जिसके अनुसार हर छोटा बच्चा अपने माँ के पल्लू को पकड़कर स्वयं को सबसे अधिक सुरक्षित महसूस करता है। शायद यही मनोदशा उस नन्हे बिटिया बच्चे के साथ रही होगी। बछीया बिटिया के मंद गति से बढ़ते पाँव को देखकर लेखक नज़रें ठहर सी गयीं। बिटिया बच्चा अपना एक पैर जमीन पर रख ही नहीं रही थी। उसके एक पैर में गहरी चोट लगी थी,जिसके चलते वह अपने तीन पैरों पर ही चल रही थी। चौथे पैर को जमीन पर रखने की उसकी कुबत नहीं रह गई थी। शायद चौराहे पर खड़ी वह बछिया बिटिया किसी वाहन से चोटिल हो गई थी।
मानवता को समभाव में रहते हुए मनुष्य और पशु में भेद नहीं करना चाहिए। दोनों के प्यार को यदि आप समझ सकते हैं तो उनकी पीड़ा को भी आपको समझना चाहिए।
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© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”
लखनऊ, उप्र, (भारत )
दिनांक 22-02-2025
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





