श्री राकेश कुमार
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १५३ ☆ देश-परदेश – International Day for Tolerance:16th Nov ☆ श्री राकेश कुमार ☆
आज के दिन को “विश्व सहनशीलता” दिवस के रूप में मनाए जाने का क्रम विगत कुछ दशकों से ज़ारी हैं। जब इस बावत जानकारी प्राप्त हुई, तो थोड़ा विस्मय भी हुआ। हम अभी तक ये ही समझते थे, कि असहनशीलता सिर्फ हमारे देश के नागरिकों में ही होती हैं, क्योंकि हम लोग तो बिना बात के भी असहनशील होने में देरी नहीं करते हैं। गुस्सा करना तो हम सबके दिलो दिमाग की प्राथमिकता में है।
छोटी छोटी बातों को लेकर नाराज़ होना हमारी परंपरा बन चुकी हैं। दिलों में आपसी भाई चारे की विरासत तो कब की दफ़न हो चुकी है। छोटे से लेकर उम्र दराज व्यक्ति लड़ने के बहाने खोजता रहता है। वो ज़माना लद गया, जब “जर, जोरू और जमीन” (धन, औरत और जमीन) के लिए ही झगड़े हुआ करते थे।
पश्चिम ने हमारी संस्कृति को अर्श से फर्श (आसमान से जमीन) पर पटक दिया हैं। पिता-पुत्र, भाई-बहन, पति-पत्नी जैसे पवित्र संबंधों को असहनशीलता ने विच्छेद कर तार तार कर दिया है।
शर्म और हया जैसे शब्दों को तो हिंदी के शब्द कोश से हटाने के प्रयास सफल रहें हैं। अंग्रेजी में “लेट गो” या पंजाबी भाषा में “ठंड रख” सुने हुए कई दशक हो गए हैं। नित जीवन में तो अब “जीरो टॉलरेंस” पूरी तरह अपना लिया है।
हमारे संतो ने मानव के हृदय में धीरज रखने के लिए, बहुत सारी रचनाएं, रची हैं। कबीर की वाणी भी ऐसा ही कुछ कह रही हैं।
कबीरा धीरज के धरे, हाथी मन भर खाय।
टूट एक के कारने, स्वान घरै घर जाय॥
अब लेखनी को विराम देता हूं कहीं प्रतिदिन लंबा लंबा पढ़ कर आप असहनशील ना हो जाएँ।☺️
© श्री राकेश कुमार
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