श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३९८ ☆

?  आलेख – लघुकथा – जानूमेट ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

करीने से सजे ड्राइंग रूम के एक कोने पर अपनी राकिंग चेयर पर आगे पीछे डोलते हुए राजन एल्बम के पन्ने पलटते और खुद ही मुस्कराने लगते ।

तभी जुनू आई और इस तरह उन्हें मुस्कुराते देख बोलीं, क्या हुआ जानू, राजन बोले आई लव यू।

पिछले पैंतीस सालों के वैवाहिक जीवन में यह वाक्य हजारों बार जुनू और उनके जानू राजन के बीच संवाद, समझ, और प्यार व्यक्त करता ही रहा है।

नाश्ते के पहले अपनी दवा निकालते हुए डिब्बे पर छपा नाम जानुमेट 500 देख रंजन हमेशा मुस्कुरा देता था। जानूमेट। जैसे डाक्टर ने बीमारी की दवा नहीं, रिश्ते का नाम दे दिया हो। जब पहली नार्मल चेकअप में उसका शुगर लेवल अधिक आया था, तो मन में डर था, भविष्य का, परहेज का ।

डॉक्टर ने सहज स्वर में कहा था हर भोजन के साथ एक जानूमेट500, जीवन भर।

जीवन भर शब्द ने राजन को भीतर तक हिला दिया था, लेकिन जानूमेट ने उसे थाम लिया।

अब दिन के खाने की शुरुआत घड़ी से नहीं, जानूमेट से होती थी। नाश्ते की प्लेट लगे या देर हो जाए, उसका ध्यान पहले छोटी सी इस गोली पर जाता। जेब में, पर्स में, दराज में, कार में, हर जगह उसकी मौजूदगी रहती। जैसे कोई प्रेमी बिना बोले याद दिलाता रहे कि लापरवाही मत करना। दफ्तर में मीटिंग लंबी हो जाए तो वह घबराता नहीं था, बस जेब टटोलता था। जानूमेट है न।

धीरे धीरे उसने देखा कि दवा ने उसके भीतर एक अनुशासन जगा दिया है। वह समय पर खाने लगा, पैदल घूमने जाने लगा, मीठे से दूरी रखने लगा। हर तीन महीने में जांच करवाना अब मजबूरी नहीं, जिम्मेदारी बन गई थी। रिपोर्ट आते ही वह पहले खुद को देखता, फिर जानूमेट के डिब्बे को। जैसे कह रहा हो देखा, तुम्हारा साथ ।

कभी कभी उसे लगता यह गोली उससे ज्यादा फिक्र करती है उसकी। जब वह थक कर सब कुछ भूल जाना चाहता, तब जानूमेट उसे रोक लेती। जब वह कहता एक दिन न लेने से क्या होगा, तब जानूमेट चुपचाप आईने में उसका भविष्य दिखा देती। कोई डांट नहीं, कोई शोर नहीं, बस खामोश मौजूदगी।

एक दिन उसकी बेटी ने मुस्कुराकर पूछा, पापा ये जानूमेट क्या है। उसने हंसते हुए कहा, यह मेरी जानू है। जो मुझे हर दिन याद दिलाती है कि खुद से प्यार कैसे किया जाता है। बेटी ने चौंक कर देखा, फिर समझ गई। उसने डिब्बे को आदर से उठाया, जैसे परिवार का कोई सदस्य हो।

शुगर की बीमारी ने उसे जो सिखाया, वह किसी प्रवचन में नहीं था। जीवन की देखभाल भी एक प्रेम है, बस उसमें, नियमित जांच होती है। जानूमेट ने उसे यह प्रेम करना सिखा दिया था। बिना शिकायत, बिना शर्त, हर भोजन के साथ। अपनी जिंदगी में जुनू और जानूमेट के अनुप्रास पर वह बरबस एक बार फिर मुस्करा पड़ा ।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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