प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे
☆ मुक्तक – होली ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆
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होली मस्ती लेकर आई, खेल रहे कन्हाई।
बरसाने से राधारानी, दौड़ी-दौड़ी आई।
खेल रहे ग्वाले-ग्वालाएँ, मुखड़े हैं रंगीन,
रंग-अबीरों की आभा तो, सारे ब्रज में छाई।।
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खेल रहे देवर-भौजाई, उल्लासित है तन-मन।
जीजू और सालियाँ खेलें, इतराता है आँगन।
मची हुई हुड़दंग आज तो, हुरियारों का ज़ोर,
लगता है पल में जी लेंगे, अब तो सारा जीवन।।
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गले मिल रहे प्रीति लिए दिल, ख़त्म हुई सब दूरी।
आज सभी होली में डूबे, नहीं शेष मजबूरी।
गाँव-शहर, गलियों-सड़कों में, रँग डालो का शोर,
बीवी लगती मदिरा जैसी, और प्रेमिका नूरी।।
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चला रही है आज पड़ोसन, नयनों से तो तीर।
अपुन हो गए घायल ज़्यादा, दिल ने पाई पीर।
मैंने मौका पाकर उसका मुख कर डाला लाल,
मैंने मन के अरमानों को पिला दिया मृदु नीर।।
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© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे
प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661
(मो.9425484382)
ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





