श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “माँ गंगा: आस्था, विज्ञान और सम्पूर्ण जीवन…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २८५ ☆
☆ माँ गंगा: आस्था, विज्ञान और सम्पूर्ण जीवन… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
भारत की आत्मा यदि किसी एक धारा में बहती हुई महसूस की जाए, तो वह है माँ गंगा। यह केवल एक नदी नहीं, बल्कि सनातनी लोगों की आस्था, संस्कृति और जीवन का आधार है।
तीर्थ अनेकों आपके, भक्त तारतीं आप।
संगम की महिमा अमिट, हर लें सब संताप।।
सच में, गंगा केवल जल नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा है। भारत के अनगिनत तीर्थ, घाट और नगर इसी पवित्र धारा के किनारे बसे हैं, जहाँ आज भी लोग अपने दुःखों का विसर्जन कर शांति का अनुभव करते हैं।
माँ गंगा का भौतिक उद्गम गौमुख (गंगोत्री ग्लेशियर) से माना जाता है। यहाँ से निकलने वाली धारा “भागीरथी” कहलाती है, जो आगे चलकर देवप्रयाग में अलकनंदा से मिलती है और तभी “गंगा” नाम धारण करती है।
यहाँ एक अद्भुत समन्वय दिखता है—आध्यात्मिक कथा कहती है कि राजा भगीरथ की तपस्या से गंगा पृथ्वी पर आईं, जबकि विज्ञान बताता है कि यह हिमनदों के पिघलने से बनी एक विशाल नदी तंत्र है। जीवन को सींचती हुई यात्रा…
उद्गम गौमुख आपका, गंगोत्री हरिद्वार।
वाराणसी प्रयाग माँ, कल-कल जल रसधार।।
गंगा हरिद्वार से मैदानों में प्रवेश करती है, जहाँ इसका स्वरूप और भी विशाल और जीवनदायिनी हो जाता है।
फिर प्रयागराज में यमुना और अदृश्य सरस्वती के साथ त्रिवेणी संगम बनाती है—यह स्थान आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
आगे वाराणसी जैसे प्राचीन नगर में गंगा मोक्षदायिनी मानी जाती हैं, जहाँ जीवन और मृत्यु दोनों का गहरा संबंध इस नदी से जुड़ता है।
गंगा की धारा अनेक शहरों और संस्कृतियों को जोड़ती हुई आगे बढ़ती है…
कोलकता, कानपुर, गाजी, पटना धाम।
जीवनदायनि मातु हैं, सदा बहें अविराम।।
कानपुर, पटना और कोलकाता जैसे बड़े नगरों से गुजरते हुए अंततः गंगा, गंगा सागर में समुद्र से मिल जाती हैं।
यह मिलन केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक प्रतीक है—जीवन की यात्रा का अंतिम समर्पण।
क्यों विशेष है गंगा जल?
आधुनिक विज्ञान भी गंगा की विशेषताओं को स्वीकार करता है। शोध बताते हैं कि गंगा जल में स्वयं शुद्धिकरण (self-purification) की अद्भुत क्षमता होती है, जिसका कारण उसमें पाए जाने वाले विशेष जीवाणु और खनिज हैं।
यही कारण है कि गंगा जल लंबे समय तक खराब नहीं होता—यह बात आज के युवाओं को विज्ञान के माध्यम से जोड़ती है।आज की युवा पीढ़ी के लिए गंगा केवल पूजा का विषय नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का आह्वान है।
गंगा हमें सिखाती है—
निरंतर बहते रहना
सबको जोड़ना
और स्वयं को समर्पित करना
यदि हम गंगा को स्वच्छ और अविरल बनाए रखें, तो यह केवल एक नदी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन का आधार बनी रहेगी।
देवनदी मंदाकिनी, विष्णुपगी ध्रुवनन्द।
सुरसरिता माँ जाह्नवी, देतीं परमानन्द।।
माँ गंगा सच में “जाह्नवी”, “सुरसरिता” और “देवनदी” हैं—जो केवल शरीर ही नहीं, बल्कि आत्मा को भी पवित्र करती हैं।
माँ गंगा की यह यात्रा—गौमुख से गंगा सागर तक—हमें जीवन का गूढ़ संदेश देती है:
“बहते रहो, जोड़ते रहो, और अंततः समर्पण में ही पूर्णता है।”
यही गंगा है—आस्था भी, विज्ञान भी, और जीवन का सार भी।
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© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
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