श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी समसामयिक विषय पर एक कविता –  बाबाओं से बचकर रहिए आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९९ ☆

बाबाओं से बचकर रहिए☆ श्री संतोष नेमा ☆

बाबाओं   से    बचकर    रहिए |

मन  की  बात न  सबसे  कहिए ||

ओढ़  धर्म  का   चोला   निकलें |

इनकी   नीयत  खुद  ही  पढ़िए ||

*

बन    जाते    हैं    ये    अवतारी |

रहे    ढोंगपन     इनका     भारी ||

करें   कभी    मत   अंधी   श्रद्धा  |

बहुधा   तन   के   हुए   शिकारी ||

बहिन   बेटियों    सावधान    हो |

स्वयं   ज्ञान   से   निर्णय  करिए ||

बाबाओं    से    बचकर    रहिए |

*

रोज    मीडिया    हमें    दिखाता |

नाम    नवीन    रोज     बतलाता ||

पाखंडों   की    कमी   नहीं    है |

इनका  नहीं   धर्म     से    नाता ||

आज      चेतना     हुई     जरूरी |

बहुरुपियों   से  खुद   ही  बचिए ||

बाबाओं    से     बचकर    रहिए |

*

वाणी    में    है    ज्ञान   धर्म   का |

मन   रखते   पर   बुरे   कर्म   का ||

इनके     अन्तस    को    पहचानो |

हो   न   सामना  कभी   शर्म  का ||

खूब   चढ़ा   कर   इन्हें    चढ़ावा |

नहीं   मुफ्त    में   झोली   भरिए ||

बाबाओं    से     बचकर     रहिए |

*

ईश्वर    पर    हम   रखें    आस्था |

एक    लक्ष्य    बस   एक   रास्ता ||

हर मुश्किल  का  हल  करता  वह |

रखें    न    कोई    अन्य    वास्ता ||

डग – डग   पर  मिलता  है  धोखा |

अब  “संतोष”   धर्म  पथ   गहिए |

बाबाओं    से     बचकर     रहिए ||

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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