श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ४८ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ घृणित कृत्य ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

प्रकृति का खेल बिगाड़ोगे तो, प्रकृति भी खेल बिगड़ेगी ।

पशु पंक्षी को यदि मारोगे तो, प्रकृति भी तुमको मारेगी।।

*

धरती पर तेरा शासन है,    यह भ्रम क्यों तेरे अन्दर है।

जंगल तेरा पर्वत तेरा,            तेरा ही नदी -समुन्दर  है ।।

*

वह झील किनारे बैठी थी,   लखती थी राह विहंगों की।

वह उनसे बातें करती थी,       मैत्री परदेशी परिंदों की ।।

*

वे परदेशी परिंदे थे,          सुंदरता गजब निराली थी।

वे पक्के शिखर विजेता थे,   चालें उनकी मतवाली थीं।।

*

वे इक दूजे को तकते थे,       नर -पक्षी प्रेम निराला था।

आयी टोली शिकार वाली, मन में भीतर कुछ काला था।।

*

गोली बंदूक की निकल गई, एक पक्षी तड़पा लुढ़क गया।

बच्ची ने आह भरी कसकर, रुध गया कंठ और जकड गया।।

*

रे दुष्ट हृदय तूँ बैरी है,     क्यों भूला अपना आतिथ्य धर्म।

तूने जघन्य अपराध किया,      रे पापी कर डाला अधर्म।।

*

परिणाम भयंकर झेलेगा,            तूने कर डाला महा पाप।

अति निम्म कोटि का कर्म किया, देती हूं तुमको कठिन श्राप।।

*

एक वर्ष अभी बीता भी न था,   छाया घन क्रूर करोना का।

साथी संग स्वर्ग सिधारा वह,      हो गया वही जो होना था।।

*

दुनिया ने देखा कठिन क्रोध,     कैसे प्रकृति धारण करती ।

समय चक्र सबने देखा,      मानवता बिनु मारे कैसे मरती।।

*

काव्य कथा के पृष्ठ कथा,         सचमुच सहेज कर रखेंगे ।

ये घृणित पंथ के अनुगामी, इस कविता से कुछ तो सीखेंगे।।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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