श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३१ आदिम से आदिम तक… ?

मनुष्य जंगल में रहता था। शिकार के लिए संघर्ष होता था। स्वाभाविक है कि शस्त्र के रूप में पत्थर और लकड़ी का प्रयोग होता होगा।  मनुष्य ने विकास की राह पर कदम बढ़ाए। आदिम से आधुनिक होने की सतत यात्रा की।

इस यात्रा में मनुष्य ने बस्तियाँ बसाई। बस्तियों से गाँव, गाँव से नगर बने। नागरी सभ्यता का उदय हुआ। अकेला-दुकेला रहने वाला मनुष्य समूह में बसने लगा, समाज बना। तथापि संसाधनों के केंद्रीकरण के चलते संग्रह की वृत्ति जन्मी, लालच पनपा। इसने न केवल संघर्ष को बढ़ाया, अपितु द्वंद्व के नए आयाम भी खोले। मनुष्यजीवन के केंद्र में पैसा आता गया। धन संपदा, संसाधनों पर अधिकार जमाए रखने की वृत्ति बढ़ती गई, समर तीव्र होता गया।

संघर्ष की परिधि बढ़ी तो पत्थर, डंडे से आगे बढ़कर मनुष्य ने तलवारें विकसित की। फिर तो एक दूसरे को मारने- काटने के लिए विनाश का खून मुँह लग गया। गोली-गोले ढाले जाने लगे, मनुष्य द्वारा मनुष्य पर दागे जाने लगे। दो लोगों की सिर फुटव्वल में एक की अधिक हानि होती थी, अब हानि सामूहिक होने लगी। शत्रु का संहार, भीषण  नरसंहार में बदलने लगा।

विज्ञान का विकास और विस्तार हुआ। आदमी का आदिम और निखरा। अब ‘मास डिस्ट्रक्शन’ या बड़ी संख्या में मनुष्य को एक साथ मौत के घाट उतार देने के साधन तैयार हुए।

मनुष्य- मनुष्य में होने वाला संघर्ष, दो समूहों में होने वाले युद्ध से होते हुए विभिन्न राष्ट्रों के आपसी  संग्राम तक आ पहुँचा।

फिर उन्नीसवीं सदी आई । बड़ी संख्या में विश्व के राष्ट्र एक दूसरे से उलझे। यह प्रथम विश्वयुद्ध था। इस विश्वयुद्ध ने डेढ़ करोड़ से अधिक लोगों की बलि ली।

दो दशक बीतते-बीतते, विनाश के अजगर ने फिर अपना मुँह खोला। द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ हुआ। येन केन प्रकारेण विजय प्राप्त करना ही इसका अंतिम ध्येय था। इस बार मनुष्य पर परमाणु बम का परीक्षण किया गया। इस विनाश के साक्ष्य के रूप में पूरे शहर में जलकर खाक हुए और कुछ अधजले पेड़ बचे रहे, बाकी पूरा शहर मर गया।

आदमी के भीतर का आदमी मरता रहा, आज भी मर रहा है। कहा गया कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिए लड़ा जाएगा। संसार की महाशक्तियों को लगा कि पहले तेल पर तो आधिपत्य जमा लें, फिर पानी पर सोचा जाएगा।

अस्त्र-शस्त्र अब इतने संहारक हो चले कि एक रात में एक पूरी सभ्यता को नष्ट करने की चेतावनी दी जाने लगी। आदमी के विकराल आदिम को देखते हुए इस चेतावनी के सच सिद्ध होने की आशंका सदा बनी रहती है। आदमी की विडंबना और विसंगति देखिए कि किसी की आशंका, किसी के लिए संभावना भी होती है।

आदमी ने अपनी सूझबूझ से जंगल से महानगर तक यात्रा की। ज़मीन को अपने कब्जे में लिया, अंतरिक्ष को घातक हथियारों से पाट दिया समुद्र के गर्भ में विनाश बो दिया। बाहर से आधुनिक होने की यात्रा में भीतर का आदिम निखरता रहा।

अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था कि चौथा विश्वयुद्ध पत्थरों और लकड़ियों से लड़ा जाएगा। सभ्यता नष्ट करने का आसुरी उन्माद यह स्थिति ला भी सकता है कि हमारी कथित सभ्य प्रजाति ही नष्ट हो जाए।  जब हथियारों के उपयोग से प्रजाति नष्ट हो जाएगी तो नये हथियार ढालने वाले भी नष्ट हो जाएँगे। साधनहीन बचे- खुचे लोग जंगलों में रहने लगेंगे। इसके बाद आगे जब कभी संघर्ष होगा तो फिर वही पत्थर, वही लकड़ियाँ साधन बनेंगे।

आदिम से आदिम की इस यात्रा के असंख्य आयाम हैं। इन आयामों पर हर विचारवान को अपने-अपने ढंग से चिंतन करना चाहिए। इस चिंतन से कोई समाधान निकल कर आ सके तो मनुष्य जाति पर बड़ा उपकार होगा।

© संजय भारद्वाज 

प्रातः 7:31 बजे, 11 अप्रैल 2026

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

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संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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