डॉ सत्येंद्र सिंह
(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक संस्मरण – “साइकिल वाले सर… “।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६१ ☆
संस्मरण – साइकिल वाले सर… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
बात 1994-95 की है। लवलेश सोलापुर में तैनात थे, दो चार महीने ही हुए थे। हिंदी कार्यशाला का आयोजन था। पैंसठ सत्तर वर्ष के एक वृद्ध करीब साढ़े छह फुट लंबे चोडा सीना, रंग गोरा ऑफिस में प्रविष्ट हुए। हिंदी कार्यशाला में व्याख्यान देने के लिए उन्हें आमंत्रित किया गया था। वे डी.ए.वी. कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल थे और एन.सी.सी. के कमांडेंट। हालांकि अंग्रेजी के विद्वान थे पर हिंदी ऐसी बोलते थे कि सुनने वाले के दिल में उतर जाए। पंजाबी थे और उनके संभाषण में पंजाबी टोन और अधिक रस घोल देती।
उन्हें देखते ही मिलने की एक सहज उत्कंठा जागृत हो जाती। व्याख्यान समाप्त होने के बाद लवलेश उनके सामने हाजिर हुआ और जैसे दृष्टि मिली तो वह एक विद्यार्थी की तरह उनके चरणों में झुक गया। उन्होंने उसे बाँह पकड़ कर उठाया और खाली पड़ी कुर्सी पर बिठाया तथा स्वयं भी एक कुर्सी पर बैठ गए। लवलेश का परिचय पूछा, कहाँ के निवासी हो, रुचियाँ क्या क्या हैं, सोलापुर में कहाँ रहते हो। वे पूछते गए और वहउत्तर देता गया।
वे भसीन सर के नाम से विख्यात थे। पूरा नाम पुराने लोग ही जानते होंगे। साइकिल पर हमेशा चलते और साइकिल पर एक झोला टंगा रहता। साइकिल वाले सर। रविवार का दिन था। लवलेश परिवार के साथ नाश्ता करने वाला था । घर के नाम पर एक ही कमरा था और उससे अटैच टॉयलेट बाथरूम। बेटे ने बताया कोई वृद्ध अंकल हैं साइकिल लिए हुए। लवलेश बाहर निकला और उन्हें प्रणाम करके अंदर ले आया। चेहरे पर कोई भाव नहीं थे। उनके सामने नाश्ते की प्लेट रखी, उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया। बातचीत में बताया कि उनकी दो बेटियाँ हैं। एक बेटी मुंबई में डॉक्टर है दामाद भी डॉक्टर हैं। छोटी बेटी डॉक्टरी पढ़ रही थी कि अचानक बीमार पड़ी तो आज तक पड़ी है। उसके इलाज पर सब कुछ चला गया। पैंशन से जैसे तैसे खर्च चल जाता है। ट्यूशन भी कर लेता हूँ। फिर मुस्कुरा कर तनाव झटक दिया और बच्चों से उनकी पढ़ाई के बारे में पूछते रहे। चलते चलते बोले कि मैं यहाँ से गुजर रहा था तो सहज ही साइकिल आपकी ओर मुड़ गई। वैसे मैं किसी के घर बहुत कम जाता हूँ।
कई बार बाजार में मिले तो उसी साइकिल पर। बाजार में भी लोग उनकी बहुत इज्जत करते। वे सबसे उनके बच्चों की पढ़ाई लिखाई की बात करते और कोई कठिनाई होती तो उसे दूर करने के लिए साइकिल पर ही उस बच्चे के स्कूल या कॉलेज में पहुंच जाते। प्राचार्य से बात करके समस्या सुलझा देते। सभी प्राचार्य उनका बहुत सम्मान करते क्योंकि अधिकांश उनके विद्यार्थी रहे थे या एनसीसी कैडेट्स।
उनके बहुत सारे विद्यार्थी आईएएस करके उच्च पदों पर आसीन थे। लवलेश के एक मित्र ओबीसी कैडर के थे और उनके बेटे को इंजीनियरिंग में एडमिशन के लिए कास्ट वेलीडिटी सर्टिफिकेट चाहिए था। बहुत भागा दौड़ की पर सफलता नहीं मिली। वे दोनों घर पर हताश बैठे थे कि भसीन सर आ गए। हमारी चिंता सुनकर बोले कि मैं एक पत्र लिखता हूँ। आप उसे भेज दीजिए। उनकी हैंड राइटिंग इतनी सुंदर थी बिल्कुल मोती जैसी। टाइपिंग की जरूरत नहीं थी क्योंकि उनकी हैंड राइटिंग उनकी पहचान थी। उनके पत्र का यह असर हुआ कि बच्चे का प्रोवीजनल एडमिशन हो गया और कॉलेज को अनुदेश प्राप्त हुए कि इस प्रमाण पत्र के लिए योग्य विद्यार्थियों का एडमिशन रोका न जाए और उनसे लिखित ले लिया जाए कि भविष्य में वे प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर देंगे।
एक बार सुबह-सुबह आए। अब उनका लवलेश के घर पर आना आम बात हो गई थी। आकर कुर्सी पर बैठ गए। उनके चेहरे पर बहुत चिंता के भाव थे। लवलेश ने चाय का प्याला हाथ में दिया तो कांपते हाथों ले लिया, बोले कुछ नहीं। फिर लवलेश ने व्यग्रता से पूछा कि सर क्या बात है। उनकी आंखों में आँसू छलक आए। बोले, “घर की अंदरूनी बातें किसी से नहीं कहता, आपसे भी नहीं कहूंगा। किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया, न उधार मांगा। ट्यूशन करता रहा। पर आज ऐसी नौबत आ गई है कि उधार मांगना पड़ेगा। बिजली का बिल छह हजार का आ गया है। बिजली वाले कहते हैं कि पहले बिल भरिए, फिर देखेंगे। फिर लवलेश से सीधे बोले, “मुझे छह हजार उधार दे दीजिए, मैं वापस कर दूंगा। ” लवलेश ने कहा कि सर उधार तो नहीं दे पाऊंगा पर आपका बिल अवश्य भर दूंगा। उनके चेहरे पर संतोष के भाव देखकर लवलेश को बहुत खुशी हुई।
लवलेश को कुछ पुस्तकें व एक शब्दकोश चाहिए था। सोलापुर में कहीं मिल नहीं रहे थे। एक पुस्तक तो भसीन सर की ही लिखी हुई थी पर उनके पास उसकी प्रति नहीं थी। सारी पुस्तकें चाँद प्रकाशन की थी। मुंबई वीटी (अब सीएसएमटी) के सामने चाँद प्रकाशन का बोर्ड लगा देखता था। भसीन सर बोले, “जब भी मुंबई जाओ तो चाँद प्रकाशन में जाना और मेरा नाम लेकर बोलना कि ये पुस्तकें मैंने मंगाई हैं।” दो लाइन शायद लिख कर भी दी थीं। खैर लवलेश चाँद प्रकाशन में गया और उनका लिखा कागज देते हुए पुस्तकें बता दीं। वह व्यक्ति अंदर केबिन में गया और लौटकर आया तो लवलेश के हाथ में पुस्तकें थमा दीं। पैसे पूछने पर मना कर दिया कि आप ले जाकर उन्हें दे दीजिए। लवलेश आश्चर्य में था कि इतने बड़े प्रकाशक ने बिना मूल्य लिए कैसे दे दीं। बाद में पता चला कि चाँद वाले और भसीन सर पंजाब के प्रसिद्ध आनंद परिवार से ताल्लुक रखते थे। पर किसी को बताते नहीं थे।
ऐसे थे भसीन सर। लवलेश के मन मस्तिष्क पर आज भी छाए हुए हैं।
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© डॉ सत्येंद्र सिंह
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अद्भुत रचना।
बहुत सुंदर व्यक्ति चित्र। सत्येंद्र सिंह जी, हार्दिक बधाई🎉🎊
बहुत सुन्दर संस्मरण आदरणीय