सुश्री मंजिरी “निधि”
(बड़ोदा से सुश्री मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता ‘इशारा‘।)
कविता – इशारा ☆ सुश्री मंजिरी “निधि”
(महाश्रृंगार छंद)
जिंदगी बदले रंग हजार,
तभी तो पाना मुश्किल पार l
इशारा देती है हर बार,
भटकते रहते हैं लाचार ll
नजर को पढना मुश्किल यार,
सत्य ही है सबका आधार l
झूठ तो कर्ता है लाचार,
सोच लो क्या होगा उपचार ll
*
इशारा करना अब तो छोड़,
सामने आकर मन से बोल l
हृदय की धड़कन कहती देख, प
कड़ कर मुझको आँखें खोल ll
प्रेम के देखो लाखों रंग,
तभी तो होती रहती जंग l
इसे जो समझे जाता हार,
निराले होते उसके ढंग ll
*
इशारा कर्ता है जब ईश,
नहीं देता है मानव ध्यान l
बाद में रोता प्रभु को कोस,
मिले जब कर्मो से अपमान ll
करो तुम सरल शील व्यवहार,
तभी होती है जस जयकार l
बने हम प्रकृति का आधार,
दिए हो यह अनुपम उपहार ll
☆
© सुश्री मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




