डॉ निशा अग्रवाल

☆ कविता ☆ “सृष्टि रचने वाले तुझको मेरा प्रणाम” ☆ डॉ निशा अग्रवाल

सृष्टि रचने वाले तुझको मेरा प्रणाम,

कण-कण में बसने वाले तुझको मेरा प्रणाम।

सूरज चाँद सितारे तेरी महिमा गाएँ,

नदियाँ पर्वत वन उपवन तेरा यश लहराएँ।

जीवन की हर श्वास कहे तेरा ही नाम,

सृष्टि रचने वाले तुझको मेरा प्रणाम।

 *

माटी से मानव गढ़ डाला, उसमें प्राण भरे,

दुख-सुख, हँसी-आँसू सब तेरे ही रंग धरे।

अहंकार हर ले प्रभु, दे दे सच्चा ज्ञान,

सृष्टि रचने वाले तुझको मेरा प्रणाम।

 *

जब भटके मन अँधियारे में, दीपक बन जल जाए,

टूटे विश्वास की डोर को तू ही जोड़ लाए।

तेरे चरणों में ही मिले जीवन को विराम,

सृष्टि रचने वाले तुझको मेरा प्रणाम।

 *

ना मैं कुछ हूँ, ना मेरा कुछ, सब कुछ तेरा दान,

तेरी कृपा से ही चलता ये सारा जहान।

निश्छल भाव अर्पण करता, लेकर तेरा नाम,

सृष्टि रचने वाले तुझको मेरा प्रणाम।

©  डॉ निशा अग्रवाल

शिक्षाविद, पाठयपुस्तक लेखिका एवं वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर

जयपुर, राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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Nisha Agrawal
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हार्दिक आभार आपका आदरणीय जी 🙏