स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – संकल्पित रहो…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८१ – संकल्पित रहो – १ ✍

दोस्तो!

मैं महापुरुष नहीं साधारण व्यक्ति हूँ।

मेरे मन में भी उपजते हैं। हर्ष और विषाद

मुझे भी घेरती है निराशा

मैं भी बोलता हूँ/ दिग्भ्रमित अर्जुन की भाषा

पीड़ित होता हूँ अन्याय और अत्याचार से

विह्वल हो उठता हूँ। द्रौपदी जैसी पुकार से।

फिर होता है एहसास

कि मुझे जकड़े है- विवशता का पाश!

सोचता हूँ

जाने अनजाने इसी नागपाश में बँधे हैं

सब लोग

सब में व्याप गया है

निर्बलता का राजरोग,

शायद

निर्बलता शब्द न हो बिल्कुल ठीक

निर्बलता की जगह शायद

निर्वीयता होगा सही सटीक,

यह निर्वीयता नहीं तो क्या है

कि फटी आँखें देखती हैं

जलती बस्तियाँ।

देखती हैं- सद्भाव की डूबती कश्तियाँ।

प्रेम को मूर्खता

और करुणा को समझा जाता है

लिजलिजा विचार

अखबारों में रोज छपते हैं समाचार

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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Bhavana Shukla
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सादर नमन