श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “तिनके…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६१ ☆

☆ # “तिनके…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

तिनके अब पैरों के तले

रौंदे नहीं जाएंगे

अगर जोर जबरदस्ती की

तो पैर जख्मी हो जाएंगे

 

तिनकों का जख्म

आसानी से नहीं भरता है

जख्म नासूर बन जाए

तो कभी-कभी इंसान

दर्द से मरता है

 

बड़े-बड़े आंधी और तूफान

बरगद को उखाड़ देते हैं

लेकिन वह भी

तुच्छ समझे जाने वाले

तिनके के आगे

सर झुका देते

 

तिनके की जड़ें

अंदर तक जाती है

ना वह मरती है

ना कुंभलाती है

इसकी गहराई किसी को

समझ नहीं आती है

 

तिनके दुर्बल सही

पर कमजोर नहीं है

किसी और का

उन पर जोर नहीं है

जंगल ही उनका अपना घर है

कहीं और ठौर नहीं है

 

तिनके को प्रकृति की पनाह

में रहने दो

उन्मुक्त  हवा ओं के साथ बहने दो

परिंदों की बोली कहने दो

निसर्ग  की धूप-छांव

सहने दो

 

क्यों की,

जब तिनके प्रचंड गर्मी में

झुलसते है

अंदर ही अंदर

सुलगते है

जंगल की भीषण आग बनते हैं

दावानल में ढलते है

तो वन के वन

जलकर राख हो जाते है

अहंकार में डूबे हुए

सब ख़ाक हो जाते है /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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