श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है आपका एक संस्मरण “आम और खास”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६३ ☆
🌻संस्मरण 🌻 आम और खास ☆
बचपन की घटना याद हो आई। गर्मी का मौसम, तपती दुपहरी और भरे पूरे परिवार में एक कमरे में लगा हुआ एक तीन बाँहों वाला पंखा।
जो बहुत खास था। कुछ खास मौके पर चलता था और जब चले तब बड़े थोड़े ऊंचे जगह पर बैठे जैसे तखत, पलंग, जो मध्यम थे वह स्टूल, बेंच, छोटी चौपाई। और हम बच्चे दरी या चटाई बिछा है तो भी ठीक, नहीं तो लिपा- पुता घर का सुंदर महकता हुआ वह कमरा, जानते हैं इसकी कीमत क्यों थी क्योंकि वह खास था जहाँ पर बड़े बुजुर्गों का साया था, भोजन कक्ष जहाँ से दादी और माँ की चूड़ियों की आवाज, रुतबे से बाबा और चाचा बाबा की आवाज, पिताजी अपनी सादगी और कुशल वाकपटुता से पूरे परिवार के लिए एक रामलाल की भांति प्यारे।
जाने कहाँ गए वो दिन अब न वह जगह बची और न लोग। कहते हैं 80- 100 वर्षों के बाद घर बदल जाता है, गाँव बदल जाते हैं, लोग बदल जाते हैं, बोली बदल जाती है, और संस्कार संस्कृति भी बदल जाती है और तो और जो खास होता है वह आम होते देर नहीं लगती।
वैसा ही हाल कुछ पंखे का हो गया। गर्मी पहले से और बेहतर हो गई है। और पंखे खास से आम हो गए हैं। न उनमें परिवार है और न वह ठंडक वाली हवा।
आज हर कमरे में एक पंखा और ए सी लगा हुआ है। देखा जाए सब कहते हैं यह वह खास वाला है परंतु मुझे लगता है यह खास नहीं यह तो आम हो गया है। जो हर कमरे पर है परंतु कमरे में वह नहीं है जो खास होते हैं।
बस मन की बातें थी। जो थोड़ी सी बात आप सभी के साथ साँझा कर ली। हृदय के साथ उन सभी बीती बातों को गर्मी में आम से खास और खास से आम होते देखा गया। आप सभी के लिए बहुत-बहुत बधाइयाँ और बहुत-बहुत अभिनंदन। खास बने रहियेगा– शीतल, ठंडक, धीरज, श्रद्धा, निष्ठा और संस्कार को लिए। ममता, सेवा पूजन, परहित, जनहित, दया, करुणा संस्कृति को लेकर आम बने रहियेगा।
सदैव प्रभु कृपा बरसती रहेगी। जिसमें मै, मेरा को जगह न मिले, हमारे- अपने को खास बनाते रहियेगा।
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© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





