श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १८० ☆ देश-परदेश – अंतरराष्ट्रीय पोहा दिवस : 7 जून ☆ श्री राकेश कुमार ☆

अस्सी के दशक तक उतर भारत के लोग पोहा को चिवड़ा के नाम से जानते थे। सूखे पोहे को तलने के पश्चात चिवड़े के नाम से सेवन किया जाता था।

संचार माध्यमों की सुगमता, टीवी, फिल्मों आदि ने पोहे को संपूर्ण भारत में प्रचारित कर दिया। प्रत्येक क्षेत्र में अलग अलग खाद्य पदार्थ उपयोग किए जाते हैं।

हमारी आज के प्रातःकालीन उद्यान सभा में भी इस पर खूब चर्चा हुई। सभा में विभिन्न प्रांतों के रहने वाले सेवानिवृत साथी हैं। इन सब लोगों को अनर्गल विषयों पर घंटों चर्चा करने का शौक है।

पोहे के समर्थन में भी बहुत सारी दलीलें पेश की गई, हल्का खाद्य और फास्ट फूड की श्रेणी में आता है। एक और साथी ने तो सारी हदें पार कर, वर्षों से इंदौर के सफाई वर्चस्व के लिए पोहे को ही वज़ह बताया। क्या पोहा खाने से मन में सफ़ाई के विचार आते हैं ?

पंजाब राज्य के साथी बोले, सिर्फ पोहे का ही अंतरराष्ट्रीय वर्ष क्यों मनाया जाता हैं ? हमारी लस्सी किसी से कम हैं, क्या ? एक पटना निवासी बोले हमारे “लिट्टी चोखे” का भी दिवस मनाया जाना चाहिए।

त्रिवेन्द्रम निवासी बोले हमारी इडली तो वर्षों से पूरे भारत को भाती हैं। हम पोहा दिवस इस शर्त पर मनाएंगे, जब हमारी इडली को भी ऐसी ही मान्यता मिले।

जयपुर निवासी बोले, जिस जमीन पर बैठे हो, उसकी कचौरी को मत भूलना। हर नुक्कड़ पर मिलती है। मामला आगे बढ़ता, ये तय हुआ हर सात तारीख़ को अलग अलग प्रांतों के उपलब्ध खाद्य पदार्थों का दिवस मनाया जाएगा।

तय कार्यक्रम के अनुसार नजदीक के “इंदौर पोहा” वाले ठेले पर सबने कांदा पोहा, जिस में रतलामी नमकीन सेव भी था, का भरपूर सेवन किया।

पोहा काग़ज़ की प्लेट में परोसा गया था, लेकिन ठेले पर “कचरा पात्र” उपलब्ध नहीं था, इसलिए सब अपनी अपनी उपयोग की गई प्लेट को साथ ले कर आए और उचित स्थान पर फेंका। कुल मिला कर पोहा खाने के बाद “सफाई का कीड़ा” अपना असर दिखाता है।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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