श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१७ ☆
बाल कथा – समझ
श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
(सच्ची घटना , राम मंदिर के वर्तमान घटना क्रम के परिदृश्य पर )
सूरज की सुनहरी किरणें मंदिर के शिखर को चूम रही थीं। वातावरण में शंख की ध्वनि और धूप-बत्ती की मंद सुगंध घुली हुई थी।
मैं अपने सात वर्षीय बेटे अमित के साथ मंदिर गया था, जो अपनी मासूम आंखों से दुनिया समझने की कोशिश कर रहा था । मेरे हाथ का स्पर्श थामे हुए , मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते हुए मैने देखा कि वह पीछे मुड़कर कोने में भीख के लिए बैठी बूढ़ी अम्मा को देख रहा था।
दर्शन कर मैने उसके छोटे से हाथों में सौ का नोट देकर उसे दान पेटी में डालने के लिए कहा। वह धीमे कदमों से आगे दान पेटी के सामने झुका भी ।
फिर हम बाहर आ गए ।
बाहर निकल वह उसी बूढ़ी अम्मा के पास जा रुका । उसने अपनी जेब टटोली और वह सौ का नोट निकाल कर उस बूढ़ी अम्मा की हथेली पर रख दिया।
अम्मा की आंखों में कृतज्ञता के आंसू छलक आए और उन्होंने बेटे के सिर पर हाथ रखकर उसे आशीर्वाद दिया।
मैं स्तब्ध खड़ा यह सब देख रहा था। और उसकी बाल बुद्धि पर मन ही मन प्रसन्न भी था ।
(अब, जब भी समाचारों में बड़े-बड़े धार्मिक स्थलों के चंदे में हेराफेरी, भ्रष्टाचार या उन पेटियों के पैसों चोरी होने अथवा गलत हाथों में जाने की खबरें सुनता हूं, तो मुझे उस दिन सीढ़ियों पर बैठी उस बूढ़ी अम्मा के झुर्रीदार चेहरे और अमित की समझ की बरबस याद आ जाती है। दान किसी बड़े ताले वाली पेटी के भीतर कैद नहीं, बल्कि उस साक्षात ईश्वर के हाथों में सौंपना अधिक उचित है जो दीन बंधु है।)
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© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव
समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





