श्री सुरेश पटवा
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ३९ ☆ श्री सुरेश पटवा
नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण
झाँसी घाट से बेलखेड़ी 06 नवम्बर 2019
हम सोमनाथ एक्सप्रेस से बैकपेक में एक पैंट, दो शर्ट, अण्डरवेयर तौलिया, स्लीपिंग बेग, वॉर्मर इनर, अतिरिक्त मोज़े व रुमाल, स्लीपर, तेल साबुन, कुछ नक़द राशि और सूखे मेवे खजूर रखकर भोपाल से श्रीधाम पहुँचने हेतु चल पड़े। अगले 08-09 दिन बस यही हमारी सम्पत्ति है। जीवन यात्रा में बहुत सारा सामान घर में, रक़म बैंक में, मकान शहर में रिश्ते दिलों में इकट्ठे किए है वह सब छोड़कर इतना थोड़ा सामान और नर्मदा से रिश्ता जीवन जीने के लिए काफ़ी है। रिश्तों को निभाने में बहुत सारे अच्छे-बुरे भाव मन में गाँठ बाँधकर रखे, आज न सिर्फ़ सारा सामान, आराम छोड़कर निकले अपितु अगले 08-09 दिन जब थके माँदे शरीरों को खुले आकाश के नीचे ऊबड़-खाबड़ ज़मीन पर फेंकेंगे तो मन की गाँठे भी ख़ूब खुलेंगी। भिक्षा से भोजन प्राप्ति में अहंकार की गाँठे भी अवचेतन से ढीली होकर चेतन पटल पर आएँगी, जिन्हें ध्यान लगाकर खोला जा सकेगा। आज सुबह ध्यान के बाद कवित्व जागा।
इसके पहले कि
लोग तुम्हें छोड़ दें
रिश्ते तुम्हें तोड़ दें
तुम सीख लो उन्हें छोड़ना।
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सुबह का सूरज सीखता
रोज़ पृथ्वी को घुमाकर
दिन-रात सजाकर
अपनी राह छोड़ना।
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पेड़ सिखाता नियम से
ख़ूब खिले
फूलों-फलों को
शाख़ से छोड़ना।
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रिश्ते-नाते,माया-मोह,
धन सम्मोहन, यश-यौवन
सीख लो दिल से
सब यहीं छोड़ना।
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पहले भी
करोड़ों-अरबों-खरबों को
निश्चित पड़ा था
ये जहाँ छोड़ना।
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छूटते सभी एक न एक दिन
आत्मा से देह, अपनो से नेह
भला-बुरा सब कुछ
यहीं है छोड़ना।
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नियति के सर्कस
का अटल नियम
समय पर झूला पकड़ना
समय पर छोड़ना।
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समय की दीवार में टंगे
कैलेण्डर हो तुम
खील को तुम्हें भी
पड़ेगा छोड़ना।
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मन में विचार आया कि आज से नौ दिन नर्मदा मैया के दामन में जीवन नैया खैबेंगे, वही पार लगाएगी-वही डुबाएगी, वही पलनहार, वही रुलाएगी-वही हँसाएगी। एक नारा मन में जागा, जय हो नर्मदा मैया, पार लगा दे नैया। यह सुबह से शाम तक ज़ुबान पर सज़ा रहा और यात्रा का नारा बन गया।
अरुण दनायक, जगमोहन अग्रवाल, मुंशीलाल और प्रयास जोशी के साथ सोमनाथ एक्सप्रेस में सुबह आठ बजे बैठकर दिन के दो बजे श्रीधाम पहुँचे। मुंशीलाल भाई को ख़बर मिली कि उनकी बेटी की सासु जी का निधन आमला में हो गया है जिनकी रसोई गंगाजली पूजन ग्यारह तारीख़ को रखी गई है उन्होंने निर्णय किया कि वे यात्रा जारी रखेंगे। वे दस तारीख़ को करेली पहुँच कर रेलगाड़ी से आमला जाएँगे। रसोई में सम्मिलित होकर वे आगे की यात्रा हेतु बारह तारीख़ को वापस आ जाएँगे। बाक़ी यात्री तब तक रुके रहेंगे लेकिन वे नर्मदा मैया की लगन में ऐसे डूबे कि ट्रेन में आरक्षण होने के बावजूद उन्होंने आमला जाना स्थगित कर यात्रा जारी रखी।
श्रीधाम उतरकर एक ऑटो से झाँसी घाट पहुँचे। वहाँ चाय-पानी करके नर्मदा मैया को नारियल चढ़ाया। एक व्यक्ति से घाट पर मोबाईल से फ़ोटो उतारने को कहा तो उसने कहा उसे फ़ोटो निकालना नहीं आता, हमने उसका नाम पूछा, उसने भैरव बताया। हमने कहा भैरव बाबा को दारू चढ़ती है तो उसकी आँखों में चमक आ गई। फिर वो फ़ोटो निकालने को झट तैयार हो गया, उसके बाद वह दारू के वास्ते सौ रुपए माँगने लगा तो हमने उसे दारू आचमन हेतु दस रुपए दिए। बेलखेडी की तरफ़ नर्मदा को दाहिनी किनारे रखकर पाँच किलोमीटर की यात्रा पर चल पड़े। किसान कछारी खेतों में मैथी, मिर्ची, गाजर और बेंगन उगा रहे थे जिसकी नक़द रक़म लेकर बाद में उन्ही खेतों में गेहूँ बो देंगे। तीन घंटों में 5.5 किलोमीटर की यात्रा करके बेलखेडी पहुँचे। बेलखेड़ी 250 घरों का गाँव है, 60 घर बर्मन यानि ढीमर के, चार-छः घरों के दीगर समाज और बाक़ी सब लोधियों के घर हैं। पूरा नरसिंहपुर का ग्रामीण इलाक़ा लोधियों से भरा है। जिनकी बसावट की अपनी कहानी है। नर्मदा यहाँ से सतपुड़ा का साथ छोड़कर विंध्य की हीरापुर रेंज से मिलने आगे बढ़ती है, हिरन नदी कुंडम से भागती आकर कुंड्डी खोलकर दरवाजे पर खड़ी मिलती है लेकिन नर्मदा का उसकी साँकल खटखटाना अभी थोड़ी दूर है।
बेलखेड़ी गाँव में घुसते ही गोविंद झारिया से मुलाक़ात हुई जो कि मंदिर के आश्रम में संतों की सेवा करते हैं। नर्मदा के किनारे बहुत ऊँची टेकरी पर एक शिव मंदिर है जिसके महा मंडलेश्वर गिरधारी लाल बर्मन हैं। परकम्मा वासियों के पहुँचने पर कई सेवक चाय, पानी भोजन की व्यवस्था में लग जाते है। आश्रम में जगह पाते ही हम लोगों में मोबाईल बैट्री चार्ज करने की होड़ सी लग जाती है लेकिन खो जाने का डर भी बना रहता है। हमने देखा कि बिजली के खम्भे से एक मोटा तार आँकड़ा बनाकर सीधी बिजली लाईन के नंगे तार से अटकाया गया है। उसी तार का दूसरा छोर एक दूसरे दो मुँहे तार से जुड़ा है, उसके एक छोर पर लट्टू सुलगा है दूसरा सीधा एक बोर्ड से जुड़ा है। डरते-डरते आई-फ़ोन का चार्जर बोर्ड में लगाया तो चार्जर ख़राब हो गया।
हम जैसे ही बेलखेडी आश्रम पहुँचे, वहाँ उपस्थित सेवक ने प्रश्न किया आप कितनी मूर्ति हैं? हमने चौंककर उसे देखा, उसकी आँखों में श्रद्धा भाव देखकर समझ गए कि हम मूर्ति हो गए, पूजनीय हो गए। सामने नर्मदा का लम्बा पाट देखते हुए सोचते रहे कि इस यात्रा में धार्मिकता और आध्यात्मिकता के भेद को समझ कर संस्मरण लिखेंगे। यात्रा के अंत तक हमारी बुद्धि इसी नज़रिए से लोक-व्यवहार और आस्था को परखती रही। सेवक ने एक कहावत कही “रमता जोगी बहता पानी जे रुकें तो गाद हो जाएँ” हमने कहा महाराज पूरी कहो, वे बोले इत्ति आत है। हमने पूरी कहावत इस तरह बताई :-
रमता-जोगी बहता-पानी
इनका कोई ठिकाना नाँय
ये जो रुकें तो गाद हो जाँय।
पानी रुका तो जीवाणु पैदा हो जाते हैं और जोगी रुका तो स्थान और व्यक्ति का मोह रूपी जीवाणु उसे ग्रास में लेकर साधु नहीं रहने देता, इसलिए साधक का मंत्र चरैवेती-चरैवेती होता है। नर्मदा वैराग्य की देवी मानी जातीं हैं इसका पानी कहीं रुकते नहीं देखा, निरंतर प्रवाहमान प्रकृति है। मनुष्य का जीवन भी निरंतर प्रवाहित है, समय का पानी अच्छा हो या बुरा गुज़र ही जाता है। वह अच्छे समय को पकड़ कर रोकना और बुरे को परे धकेलना चाहता है, यही मोह है-यही आसक्ति है। नर्मदा न कहीं रुकती न रुकने देती, चरैवेती-चरैवेती मंत्र जाप से चले-चलो पग-पग नर्मदा तीरे-तीरे, धीरे-धीरे।
नर्मदा परिक्रमा के आध्यात्मिक पहलू को समझने के लिए हमें धार्मिकता (Religiosity) और आध्यात्मिकता (Spirituality) के मूलभूत अंतर को समझना होगा। धार्मिकता का अर्थ ईश्वर में आस्था+कर्मकांड है जिसमें तर्कबुद्धि का कोई काम नहीं है, अर्थात ब्राह्मण ग्रंथों में वर्णित कर्मकांड सम्पादित करना धार्मिकता है। आध्यात्मिकता का अर्थ आस्था+तर्कबुद्धि से तत्वज्ञान के प्रश्नों का अध्ययन, चिंतन, मनन और विश्लेषण करके निष्कर्ष निकालना, जैसे नर्मदा परिक्रमा के पौराणिक व ऐतिहासिक संदर्भ क्या हैं, उसकी परिपाटी कब से शुरू हुई। वेदों में नर्मदा का उल्लेख नहीं मिलता क्योंकि उस समय तक आर्य आज के पंजाब हरियाणा तक सीमित थे। बौद्ध काल के चरमोत्कर्ष के दौरान कुछ ऋषि-मुनि वेद उपनिषद लेकर गंगा-यमुना दोआब से विंध्याचल पार करके नर्मदा घाटी में आए तब उन्होंने नर्मदा की उद्गम से भड़ौच तक यात्रा की, जिसके प्रणेता कपिल मुनि थे जिनका सांख्य दर्शन गीता में जस का तस रख दिया है कि आत्मा अनादि-अनंत है। अमरकण्टक में अभी भी कपिल धारा है जहाँ कभी उनका आश्रम रहा होगा।
बेलखेडी के मंदिर के सामने से खुले प्रांगण में रात गुज़ारी जहाँ से चाँद की झिलमिल चाँदनी में नर्मदा का सौंदर्य लुभावना और मोहक था। वहाँ चार-पाँच सेवक चाय भोजन की व्यवस्था करते रहे। दाल चावल रोटी का सेवन किया। उसके बाद आठ-दस लोग प्रांगण में आकर बैठे, उनसे सनातन धर्म में दीपक की महत्ता पर चर्चा हुई कि हम रोज़ दीपक क्यों जलाते हैं। वे लोग बोले “सब जलात हैं सुई हम जलात हैं।” उन्हें दीपक का तात्त्विक अर्थ बताया। “हमारी देह पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश के पंचभूत से अस्तित्व में आती है और आत्मा की ज्योति जीव रूप में प्रतिष्ठित होती है। दीपक पृथ्वी की मिट्टी से बनता है, उसमें तेल रूप में जल, और वायु व आकाश के खुलेपन में अग्नि प्रज्वलित करके ज्योत जलाई जाती है। इस प्रकार दीपक जीवंत देह का प्रतीक है। पंचभूत और आत्मा के सम्मान स्वरुप दीपक जलाया जाता है। यह हिंदुओं का पंचभूत+आत्मा का मौलिक सिद्धांत है, जिस पर कर्म-अकर्म, स्वर्ग-नरक, पुनर्जन्म और मुक्ति की अवधारणा विकसित हुई।”
उसके बाद गांधी जी के जीवन पर बातचीत हुई स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी महत्वपूर्ण घटनाओं और गांधी जी की भूमिका पर संवाद हुआ। मौजूद लोगों को महात्मा गांधी के जीवन की कहानी पसंद आई, कुछ वार्तालाप महाभारत पर भी हुआ तब तक सामने आकाश में चन्दामामा पीला मुँह लिए आ गए, रात में एक चाँद है जिसे देखते हुए दूरस्त प्रेमी विरह की उदास रात में सपनों के रंग भरते हुए गीत, कविता ग़ज़ल रचते हैं। जैसे-जैसे वे आकाश में चढ़ते गए हम वैसे-वैसे उन्हें निहारते आँखें मूँदते गहन नींद के आग़ोश में चले गए।
क्रमशः…
© श्री सुरेश पटवा
भोपाल, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






