सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ व्यंग्य ☆ लेडी जूँ का इंटरव्यू… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

लोक में बहुत दिनों से एक मुहावरा हलचल मचा रहा है. “कानों पर जूँ भी नहीं रेंगती.” अव्वल तो रेंगती शब्द से स्पष्ट है कि वह लेडी जूँ है। मर्द जूँ को कान पर रेंगने से परहेज क्यों है, यह एक यक्ष प्रश्न है। वैसे भी इन दिनों जूँ दुर्लभ प्रजाति हो गई है। आखिर वह आशियाना बनाये भी तो कहाँ! बढ़िया बढ़िया शैंपू से काले काले रेशमी लहराते हुये बाल स्वच्छ सिल्की सिल्की, धूल पसीने से चिपचिपे हों तो जूँ का काम बने।

खैर, एक पत्रकार ने इस दिशा में एक लेडी जूँ का इंटरव्यू लिया। पूछा– आप को आकाओं के कान क्यों पसंद नहीं?

रेंगना आपका संस्कार है, धर्म है, फिर ये बगावत कैसी?

जूँ का जवाब था— हम बहरे लोगों के कानों पर रेंग कर क्या करेंगे? यह तो खुद का अपमान ही हुआ ना, इसलिए हमने ठिकाना बदल लिया है। हम उनके कानों पर रेंगते हैं, जो हमारे रेंगने के मानी समझते हैं या उसका महत्व जानते हैं।

— देखिए जूँ जी, कभी कभी कुछ काम ऐसे भी करने पड़ते हैं जो पसंद नहीं होते। मुझे आपकी देशभक्ति पर सन्देह है।

— मैं जानती थी, तुम मुझे अर्बन नक्सल, देशद्रोही, आतंकवादी, पाक परस्त कहोगे है ना?

— मैंने ऐसा तो नहीं सोचा, पर आप से एक गुज़ारिश है। रेंगो तो सही। फल की चिंता मत करो। अगर रेंगते हुए शहीद भी हो गईं, तो यह राष्ट्र हित हेतु कुर्बानी होगी। आपका नाम इतिहास में लिखा जाएगा।

— मुझे अपने “मन की बात “सुना सुना कर मत पकाओ। भूलो मत यहां सभी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त है। मैं, कहाँ, किस हद तक अभिव्यक्त होऊं, ये मेरी मर्जी है। आप मुझे मजबूर नहीं कर सकते। मुझे संविधान की दुहाई न दें।

— जूँ जी! आप ना, बेहद अक्खड़, ढीठ और जिद्दी हैं। —– जब लोग अपनी खतरनाक जिद पाले हुए हैं, तो मुझे आत्मरक्षार्थ ऐसा सोचना ही पड़ेगा।

— इतना तो आपको पता है कि व्यक्ति से बड़ा देश है. सभी का कर्तव्य है कि हर हाल में उसकी रक्षा करें. बापू के तीनों बंदरों ने काया बदल कर माया इकट्ठी कर ली। मैंने तो ऐसा कुछ नहीं किया।

— आप बंदर युग तक ना पहुँचें तो अच्छा है। वर्तमान की बात कीजिये। आज बहरे कानों  को आपकी जरूरत है, जितनी कभी नहीं थी।

मैं कई बार रेंग आई पर देखा, नतीजा सिफ़र। फिर लगा, कि आत्मसम्मान भी कोई चीज है। जूँ हूँ तो क्या हुआ?

— देखिये, भगवान ने आपको किसी  खास प्रयोजन से बनाया है। संभवतः आप उसे जानती होंगी।

अंत में एक बार फिर कहूंगा कि प्रयास कीजिए। कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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